भारत और यूरोप के बीच व्यापार समझौता: किसानों और व्यापारियों को क्या फायदा होगा?
Lata Mishra | Jan 29, 2026, 19:24 IST
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए समझौता के जरिए यूरोप के 27 देशों में भारत की चाय, मसाले, फल और समुद्री उत्पादों पर टैक्स कम लगेगा, जिससे वहां भारतीय सामान सस्ता होगा और ज्यादा बिकेगा। खास बात यह है कि सरकार ने दूध (डेयरी) और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस लिस्ट से बाहर रखा है ताकि छोटे किसानों की कमाई पर कोई आंच न आए।
भारत से यूरोप जाने वाले कृषि और समुद्री उत्पादों पर लगने वाले टैक्स को कम किया गया है
भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक समझौते के बाद ये जानना ज़रूरी है कि मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement - FTA) क्या है और इससे किसको फायदा पहुँचेगा? चलिए इसे आसान शब्दों में समझते हैं। मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement - FTA) दो या दो से अधिक देशों के बीच होने वाला एक रणनीतिक आर्थिक समझौता है। इसके ज़रिए व्यापार को आसान बनाना और देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को हटाना होता है। जब दो देश FTA पर हस्ताक्षर करते हैं, तो वे आपस में आयात (Import) और निर्यात (Export) होने वाली उत्पादों और सेवाओं पर सीमा शुल्क (Customs Duty) या तो बिल्कुल खत्म कर देते हैं या बहुत कम कर देते हैं। इससे एक देश का सामान दूसरे देश में सस्ता बिकता है और व्यापार बढ़ता है। यूरोपीय संघ 27 विकसित देशों का एक समूह है। भारत के लिए यह एक बहुत बड़ा बाज़ार है।
चलिए समझते हैं कि इस नए समझौते से क्या आसान होगा:बाज़ार तक आसान पहुँच: भारत से यूरोप जाने वाले कृषि और समुद्री उत्पादों पर लगने वाले टैक्स को कम किया गया है। इससे 'मेड इन इंडिया' उत्पादों की यूरोप के सुपरमार्केट्स में माँग बढ़ेगी। व्यापार से जुड़ी कागजी कार्यवाहियों को सरल बनाया गया है। अब भारतीय व्यापारी खुद अपनी वस्तुओं की गुणवत्ता को प्रमाणित कर सकते हैं, जिससे समय और पैसा बचेगा।
आर्थिक सुरक्षा (Safeguards): भारत ने अपने उन क्षेत्रों को इस समझौते से सुरक्षित रखा है, जहाँ छोटे किसानों का हित जुड़ा है। उदाहरण के लिए, डेयरी और अनाज को इस समझौते में शामिल नहीं किया गया है ताकि विदेशी कंपनियों से भारतीय किसानों को खतरा न हो। आधुनिक और डिजिटल व्यापार: इस समझौते में व्यापार को पारदर्शी बनाने के लिए डिजिटल तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने पर जोर दिया गया है।
यह समझौता क्यों खास है?
आमतौर पर व्यापार समझौते केवल वस्तुओं के लेनदेन तक सीमित होते हैं, लेकिन भारत-EU का यह समझौता सेवाओं (जैसे आयुष चिकित्सा) और MSMEs (छोटे उद्योगों) के हितों को भी ध्यान में रखता है। यह न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाएगा, बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार और बेहतर आय के अवसर भी पैदा करेगा। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुआ यह समझौता भारत के कृषि (Agriculture), समुद्री (Marine) और सेवा (Services) क्षेत्रों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय उत्पादों को यूरोप के 27 देशों में सस्ता बनाना और वहां के बाजारों में उनकी पहुंच को आसान बनाना है।
कृषि क्षेत्र में बड़ी राहत
यूरोप के बाजारों में भारतीय सामान पर अब तक भारी टैक्स (Import Duty) लगता था, जिससे हमारा सामान वहाँ महँगा हो जाता था। इस समझौते के बाद:
प्रमुख उत्पाद: चाय, कॉफी, मसाले, प्रसंस्कृत भोजन, ताजे अंगूर और मांस जैसे उत्पादों पर लगने वाले टैक्स में कटौती की गई है।
सब्ज़ियाँ: छोटे खीरे, स्वीट कॉर्न और सूखी प्याज जैसे उत्पादों को भी 'पसंदीदा' दर्जा दिया गया है, जिससे इनका निर्यात बढ़ेगा।
प्रतिस्पर्धा: टैक्स कम होने से भारतीय सामान अब यूरोपीय बाज़ारों में अन्य देशों के मुकाबले सस्ता और आकर्षक होगा।
भारतीय किसानों की सुरक्षा
भारत सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि व्यापार बढ़ाने के चक्कर में हमारे अपने किसानों का नुकसान न हो। इसके लिए एक 'सुरक्षा कवच' तैयार किया गया है:
डेयरी और अनाज: दूध से बने उत्पाद, गेहूं, चावल और पोल्ट्री (मुर्गी पालन) को इस समझौते से बाहर रखा गया है।
भारत में करोड़ों छोटे किसान डेयरी और अनाज पर निर्भर हैं। अगर यूरोप से सस्ता दूध या अनाज भारत आने लगता, तो हमारे किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाती। इसलिए इन पर आयात शुल्क में कोई रियायत नहीं दी गई है।
समुद्री क्षेत्र (Marine Sector ) के लिए वरदान
यूरोप दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री खाद्य बाजार है (लगभग ₹4.67 लाख करोड़)। भारत अभी वहाँ बहुत कम निर्यात करता है।
टैक्स में कमी: समुद्री उत्पादों पर वर्तमान में 0% से 26% तक टैक्स लगता है। समझौते के तहत इसे कम किया जाएगा।
किसे लाभ होगा?
इससे मुख्य रूप से झींगा (Shrimp) और जमी हुई मछली का व्यापार बढ़ेगा, जिससे गुजरात, केरल और आंध्र प्रदेश के तटीय समुदायों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी।
नियमों का सरलीकरण और MSME को सहारा
व्यापार को आसान बनाने के लिए प्रक्रिया में बदलाव किए गए हैं:
सेल्फ-सर्टिफिकेशन: अब निर्यातकों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर कम काटने होंगे। वे खुद प्रमाणित कर सकेंगे कि उनका उत्पाद भारत में बना है।
MSME कोटा: छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) के लिए झींगा और एल्युमीनियम उत्पादों का विशेष कोटा तय किया गया है, ताकि छोटे व्यापारी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार का हिस्सा बन सकें।
डिजिटलीकरण: सारा डेटा और जानकारी अब डिजिटल होगी, जिससे काम पारदर्शी और तेज होगा।
आयुष (AYUSH) और पारंपरिक चिकित्सा
यह समझौता सिर्फ सामान तक सीमित नहीं है। भारतीय आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के लिए यूरोप में नए रास्ते खुले हैं:
भारतीय आयुष चिकित्सक अब अपनी भारतीय योग्यता (Degrees) के आधार पर उन यूरोपीय देशों में सेवा दे सकेंगे जहाँ कड़े नियम नहीं हैं। इससे भारतीय ज्ञान को वैश्विक पहचान मिलेगी।
यह समझौता "संतुलन" का एक बेहतरीन उदाहरण है। एक तरफ जहाँ यह भारत के लिए यूरोप के अमीर बाज़ारों के दरवाज़े खोलता है, वहीं दूसरी तरफ यह डेयरी और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखकर भारतीय किसानों के हितों की रक्षा भी करता है। यह इसी साल (2026) लागू होने की उम्मीद है, जिससे भारतीय निर्यात की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
छोटे खीरे, स्वीट कॉर्न और सूखी प्याज जैसे उत्पादों को भी 'पसंदीदा' दर्जा दिया गया है, जिससे इनका निर्यात बढ़ेगा
चलिए समझते हैं कि इस नए समझौते से क्या आसान होगा:बाज़ार तक आसान पहुँच: भारत से यूरोप जाने वाले कृषि और समुद्री उत्पादों पर लगने वाले टैक्स को कम किया गया है। इससे 'मेड इन इंडिया' उत्पादों की यूरोप के सुपरमार्केट्स में माँग बढ़ेगी। व्यापार से जुड़ी कागजी कार्यवाहियों को सरल बनाया गया है। अब भारतीय व्यापारी खुद अपनी वस्तुओं की गुणवत्ता को प्रमाणित कर सकते हैं, जिससे समय और पैसा बचेगा।
आर्थिक सुरक्षा (Safeguards): भारत ने अपने उन क्षेत्रों को इस समझौते से सुरक्षित रखा है, जहाँ छोटे किसानों का हित जुड़ा है। उदाहरण के लिए, डेयरी और अनाज को इस समझौते में शामिल नहीं किया गया है ताकि विदेशी कंपनियों से भारतीय किसानों को खतरा न हो। आधुनिक और डिजिटल व्यापार: इस समझौते में व्यापार को पारदर्शी बनाने के लिए डिजिटल तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने पर जोर दिया गया है।
यह समझौता क्यों खास है?
आमतौर पर व्यापार समझौते केवल वस्तुओं के लेनदेन तक सीमित होते हैं, लेकिन भारत-EU का यह समझौता सेवाओं (जैसे आयुष चिकित्सा) और MSMEs (छोटे उद्योगों) के हितों को भी ध्यान में रखता है। यह न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाएगा, बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार और बेहतर आय के अवसर भी पैदा करेगा। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुआ यह समझौता भारत के कृषि (Agriculture), समुद्री (Marine) और सेवा (Services) क्षेत्रों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय उत्पादों को यूरोप के 27 देशों में सस्ता बनाना और वहां के बाजारों में उनकी पहुंच को आसान बनाना है।
कृषि क्षेत्र में बड़ी राहत
यूरोप के बाजारों में भारतीय सामान पर अब तक भारी टैक्स (Import Duty) लगता था, जिससे हमारा सामान वहाँ महँगा हो जाता था। इस समझौते के बाद:
प्रमुख उत्पाद: चाय, कॉफी, मसाले, प्रसंस्कृत भोजन, ताजे अंगूर और मांस जैसे उत्पादों पर लगने वाले टैक्स में कटौती की गई है।
सब्ज़ियाँ: छोटे खीरे, स्वीट कॉर्न और सूखी प्याज जैसे उत्पादों को भी 'पसंदीदा' दर्जा दिया गया है, जिससे इनका निर्यात बढ़ेगा।
प्रतिस्पर्धा: टैक्स कम होने से भारतीय सामान अब यूरोपीय बाज़ारों में अन्य देशों के मुकाबले सस्ता और आकर्षक होगा।
भारतीय किसानों की सुरक्षा
भारत सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि व्यापार बढ़ाने के चक्कर में हमारे अपने किसानों का नुकसान न हो। इसके लिए एक 'सुरक्षा कवच' तैयार किया गया है:
डेयरी और अनाज: दूध से बने उत्पाद, गेहूं, चावल और पोल्ट्री (मुर्गी पालन) को इस समझौते से बाहर रखा गया है।
भारत में करोड़ों छोटे किसान डेयरी और अनाज पर निर्भर हैं। अगर यूरोप से सस्ता दूध या अनाज भारत आने लगता, तो हमारे किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाती। इसलिए इन पर आयात शुल्क में कोई रियायत नहीं दी गई है।
समुद्री क्षेत्र (
यूरोप दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री खाद्य बाजार है (लगभग ₹4.67 लाख करोड़)। भारत अभी वहाँ बहुत कम निर्यात करता है।
टैक्स में कमी: समुद्री उत्पादों पर वर्तमान में 0% से 26% तक टैक्स लगता है। समझौते के तहत इसे कम किया जाएगा।
किसे लाभ होगा?
इससे मुख्य रूप से झींगा (Shrimp) और जमी हुई मछली का व्यापार बढ़ेगा, जिससे गुजरात, केरल और आंध्र प्रदेश के तटीय समुदायों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी।
नियमों का सरलीकरण और MSME को सहारा
व्यापार को आसान बनाने के लिए प्रक्रिया में बदलाव किए गए हैं:
सेल्फ-सर्टिफिकेशन: अब निर्यातकों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर कम काटने होंगे। वे खुद प्रमाणित कर सकेंगे कि उनका उत्पाद भारत में बना है।
MSME कोटा: छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) के लिए झींगा और एल्युमीनियम उत्पादों का विशेष कोटा तय किया गया है, ताकि छोटे व्यापारी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार का हिस्सा बन सकें।
डिजिटलीकरण: सारा डेटा और जानकारी अब डिजिटल होगी, जिससे काम पारदर्शी और तेज होगा।
आयुष (AYUSH) और पारंपरिक चिकित्सा
यह समझौता सिर्फ सामान तक सीमित नहीं है। भारतीय आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के लिए यूरोप में नए रास्ते खुले हैं:
भारतीय आयुष चिकित्सक अब अपनी भारतीय योग्यता (Degrees) के आधार पर उन यूरोपीय देशों में सेवा दे सकेंगे जहाँ कड़े नियम नहीं हैं। इससे भारतीय ज्ञान को वैश्विक पहचान मिलेगी।
यह समझौता "संतुलन" का एक बेहतरीन उदाहरण है। एक तरफ जहाँ यह भारत के लिए यूरोप के अमीर बाज़ारों के दरवाज़े खोलता है, वहीं दूसरी तरफ यह डेयरी और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखकर भारतीय किसानों के हितों की रक्षा भी करता है। यह इसी साल (2026) लागू होने की उम्मीद है, जिससे भारतीय निर्यात की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।