अब कम खर्च में बनेंगी दवाएं और खेती के रसायन! भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित की नई ‘लाइट टेक्नोलॉजी’

Preeti Nahar | May 29, 2026, 18:02 IST
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भारत के वैज्ञानिकों ने एक नई प्रकाश-संचालित नैनो उत्प्रेरक (Nano Catalyst) तकनीक विकसित की है, जिससे दवाओं और औद्योगिक रसायनों का निर्माण कम ऊर्जा, कम लागत और बिना जहरीले रसायनों के किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह तकनीक भविष्य में खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायनों, जैविक उत्पादों और कृषि आधारित उद्योगों को भी सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल बना सकती है।
प्रकाश की मदद से रासायनिक प्रक्रिया का परीक्षण करते वैज्ञानिकों का प्रयोगात्मक सेटअप।
प्रकाश की मदद से रासायनिक प्रक्रिया का परीक्षण करते वैज्ञानिकों का प्रयोगात्मक सेटअप।
दवाओं और रासायनिक उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली भारी ऊर्जा, जहरीले केमिकल और महंगी प्रक्रियाओं को बदलने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा “प्रकाश-संचालित नैनो उत्प्रेरक” विकसित किया है, जो सिर्फ रोशनी की मदद से रासायनिक प्रक्रियाओं को तेज और ज्यादा प्रभावी बना सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में खेती-किसानी, खाद निर्माण, बायो-केमिकल उद्योग और पर्यावरण संरक्षण में बड़ा बदलाव ला सकती है।

क्या है यह नई तकनीक?

वैज्ञानिकों ने सोने (Gold), पैलेडियम (Palladium) और प्रकाश अवशोषित करने वाले बीओडीपीआई (BODIPY) अणु को मिलाकर एक खास नैनो-कंपोजिट तैयार किया है। यह पदार्थ प्रकाश ऊर्जा को पकड़कर रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेज करता है। आसान भाषा में समझें तो यह तकनीक “गर्मी” की जगह “रोशनी” का इस्तेमाल करके रसायन बनाने की प्रक्रिया को आसान और कम खर्चीला बनाती है। इससे फैक्ट्रियों में बिजली और ईंधन की खपत घट सकती है।

किसानों को इससे क्या फायदा होगा?

खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायन सस्ते हो सकते हैं- विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल शुरू होता है, तो कीटनाशक, जैविक उत्पाद, माइक्रोन्यूट्रिएंट और कृषि रसायनों के निर्माण की लागत कम हो सकती है। इसका सीधा फायदा किसानों को सस्ते कृषि उत्पादों के रूप में मिल सकता है।

पर्यावरण को कम नुकसान- मौजूदा रासायनिक उद्योगों में जहरीले सॉल्वेंट और भारी तापमान का इस्तेमाल होता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है। नई तकनीक में पानी और प्रकाश का इस्तेमाल होने से पर्यावरण पर असर कम पड़ेगा। इससे मिट्टी और जल स्रोतों में रासायनिक प्रदूषण घटाने में मदद मिल सकती है।

जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा- कम प्रदूषण और ऊर्जा आधारित यह तकनीक भविष्य में जैविक खेती से जुड़े उत्पादों के निर्माण में भी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे प्राकृतिक खेती के लिए जरूरी इनपुट अधिक किफायती हो सकते हैं।

छोटे कृषि उद्योगों को फायदा- गाँवों में चलने वाले छोटे फूड प्रोसेसिंग, हर्बल और बायो-प्रोडक्ट उद्योगों के लिए कम ऊर्जा वाली तकनीक फायदेमंद मानी जा रही है। इससे उत्पादन लागत घट सकती है।

कैसे काम करती है यह तकनीक?

शोधकर्ताओं के अनुसार सोने के नैनोकण प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करते हैं। यह ऊर्जा बीओडीपीआई अणुओं के जरिए पैलेडियम तक पहुंचती है, जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेजी से पूरा करता है। इस पूरी प्रक्रिया में पारंपरिक तकनीकों की तुलना में कम ऊर्जा लगती है और प्रतिक्रिया ज्यादा प्रभावी होती है।

क्या कह रहे हैं वैज्ञानिक?

यह तकनीक वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश पी. नीलकंदन और उनकी टीम ने विकसित की है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में यह तकनीक “ग्रीन केमिस्ट्री” यानी पर्यावरण अनुकूल रासायनिक उद्योग को बढ़ावा दे सकती है। उनका दावा है कि इससे दवाओं और औद्योगिक रसायनों का उत्पादन अधिक टिकाऊ, सस्ता और ऊर्जा-कुशल बनाया जा सकेगा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के बीच अब ऐसी तकनीकों की जरूरत बढ़ रही है जो कम ऊर्जा में उत्पादन कर सकें। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ऐसी तकनीकें खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यदि इस तकनीक को कृषि रसायनों और ग्रामीण उद्योगों से जोड़ा गया, तो किसानों की लागत घटाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
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