देश की रसोई पर विदेशी तेल का बढ़ता बोझ! आठ महीने में 20% बढ़ा बिल, ₹1.75 लाख करोड़ तक पहुँच सकता है आयात बिल

Gaon Connection | Jul 23, 2026, 11:21 IST
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भारत का खाद्य तेल आयात बिल चालू तेल वर्ष के पहले आठ महीनों में 20 प्रतिशत बढ़कर 1.19 लाख करोड़ रुपये पहुँच गया है। एसईए का अनुमान है कि वर्ष के अंत तक यह 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है। कमज़ोर मानसून, महँगा आयात और वैश्विक बाज़ार की परिस्थितियों के बीच संस्था ने आयात पर निर्भरता घटाकर घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर दिया।

रसोई के तेल पर विदेशी निर्भरता बढ़ी
रसोई के तेल पर विदेशी निर्भरता बढ़ी
भारत का खाद्य तेल आयात बिल लगातार बढ़ता जा रहा है। चालू तेल वर्ष 2025-26 (नवंबर-अक्टूबर) के पहले आठ महीनों में ही देश का खाद्य तेल आयात बिल 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) का अनुमान है कि तेल वर्ष के अंत तक यह बिल बढ़कर 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है। बढ़ती आयात लागत, कमज़ोर होता रुपया, मानसून की अनिश्चितता और वैश्विक बाज़ार में बढ़ती कीमतें इस बढ़ोतरी की प्रमुख वजहें मानी जा रही हैं।

एसईए के अध्यक्ष संजीव अस्थाना ने अपने मासिक पत्र में कहा कि भारत खाद्य तेल के मामले में एक अहम मोड़ पर खड़ा है और आयात पर बढ़ती निर्भरता अब चिंता का विषय बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि बढ़ता आयात बिल केवल एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा के बाहर जाने का संकेत है, जिसका उपयोग कृषि ढाँचे को मज़बूत करने में किया जा सकता था।

आठ महीने में 20 हज़ार करोड़ रुपये बढ़ा आयात बिल

एसईए के अनुसार, नवंबर से जून के बीच भारत ने 104 लाख टन से अधिक खाद्य तेल का आयात किया। इस दौरान आयात बिल 99 हज़ार करोड़ रुपये से बढ़कर 1.19 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी केवल आठ महीनों में लगभग 20 हज़ार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो 20.20 प्रतिशत की वृद्धि है। पिछले तेल वर्ष में देश का खाद्य तेल आयात बिल 1.61 लाख करोड़ रुपये था, जबकि इस वर्ष इसके 1.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुँचने का अनुमान है।

कमज़ोर मानसून और वैश्विक हालात ने बढ़ाई चिंता

संजीव अस्थाना ने कहा कि कमज़ोर रुपया आयात को महँगा बना रहा है। वहीं सामान्य से कम मानसून और तिलहन उत्पादक क्षेत्रों में बुवाई में देरी से घरेलू उत्पादन को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया के बढ़ते बायोडीज़ल कार्यक्रम के कारण पाम ऑयल का बड़ा हिस्सा खाद्य उपयोग के बजाय ईंधन में इस्तेमाल हो रहा है, जिससे वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके अलावा भू-राजनीतिक तनाव और माल ढुलाई व बीमा लागत में बढ़ोतरी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में खाद्य तेल की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। ऐसे में भारत को अधिक मात्रा में और अधिक क़ीमत पर खाद्य तेल आयात करना पड़ सकता है।

तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर

एसईए ने कहा कि भारत की दीर्घकालिक रणनीति अधिक आयात नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने की होनी चाहिए। 17 जुलाई तक खरीफ़ तिलहन की बुवाई 147 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 155.7 लाख हेक्टेयर थी। यानी इस बार बुवाई का रक़बा 8.6 लाख हेक्टेयर कम रहा। रिपोर्ट के अनुसार, मूँगफली, सोयाबीन और सूरजमुखी की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में धीमी रही है। अगस्त-सितंबर के दौरान यदि वर्षा कमज़ोर रहती है तो फूल आने के महत्वपूर्ण चरण में तिलहन फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जिसका असर रबी सीज़न पर भी पड़ सकता है।

एसईए ने कहा कि यदि आने वाले हफ़्तों में बारिश में सुधार होता है तो बुवाई की रफ़्तार बढ़ सकती है। साथ ही संस्था ने तिलहन और दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए बेहतर बाज़ार, गुणवत्तापूर्ण बीज, आधुनिक तकनीक, सुनिश्चित ख़रीद और प्रभावी विस्तार सेवाओं की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया।
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