गन्ने का रस, मक्का और FCI का अतिरिक्त अनाज...कैसे बदल रही है भारत की एथेनॉल क्रांति? किसानों के लिए क्या हैं नए मौके
Lata Mishra | Jul 08, 2026, 14:24 IST
भारत का इथेनॉल अब सिर्फ गन्ने के शीरे से नहीं, बल्कि मक्का, गन्ने के रस, बी-हैवी शीरा और FCI के अतिरिक्त चावल से भी बन रहा है। इससे पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य पूरा हो रहा है और किसानों को नए बाज़ार मिल रहे हैं, पर खाद्य सुरक्षा और जल उपयोग जैसी चुनौतियाँ भी हैं।
भारत का एथेनॉल कार्यक्रम अब केवल चीनी उद्योग तक सीमित नहीं है। गन्ने के रस, मक्का और FCI के अतिरिक्त अनाज के उपयोग ने इसे एक बहु-स्रोत (Multi-feedstock) मॉडल में बदल दिया है।
कुछ साल पहले तक भारत में अधिकांश एथेनॉल चीनी मिलों में बनने वाले शीरे (Molasses) से तैयार होता था। लेकिन पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने और ऊर्जा आयात कम करने की रणनीति के तहत सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए कई नए कच्चे माल को अनुमति दी। आज एथेनॉल बनाने के प्रमुख स्रोत हैं-
FCI का अतिरिक्त अनाज कैसे बनता है एथेनॉल?
भारतीय खाद्य निगम (FCI) किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर धान और गेहूं खरीदता है। कई बार सरकारी गोदामों में आवश्यकता से अधिक अनाज जमा हो जाता है। ऐसे अधिशेष या एथेनॉल के लिए स्वीकृत चावल को डिस्टिलरी को उपलब्ध कराया जाता है, जहाँ उससे एथेनॉल तैयार किया जाता है। इससे दो फायदे होते हैं-
गन्ने का रस क्यों बन रहा है महत्वपूर्ण?
पहले चीनी मिलें गन्ने से चीनी बनाकर बचने वाले शीरे से एथेनॉल तैयार करती थीं। अब कई मिलें सीधे गन्ने के रस या बी-हैवी शीरे से भी एथेनॉल बना रही हैं। इसके फायदे-
हाल के वर्षों में सरकार ने मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन को भी बढ़ावा दिया है। इसके कारण-
पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण क्यों बढ़ाया जा रहा है?
भारत हर साल बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने से-
किसानों के लिए क्या बदल सकता है?
यदि एथेनॉल उद्योग लगातार विस्तार करता है, तो-
क्या हैं चुनौतियाँ?
एथेनॉल कार्यक्रम के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ भी हैं-
- सी-हैवी और बी-हैवी शीरा
- गन्ने का रस
- मक्का
- FCI का अतिरिक्त चावल
- क्षतिग्रस्त या अधिशेष खाद्यान्न
FCI का अतिरिक्त अनाज कैसे बनता है एथेनॉल?
भारतीय खाद्य निगम (FCI) किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर धान और गेहूं खरीदता है। कई बार सरकारी गोदामों में आवश्यकता से अधिक अनाज जमा हो जाता है। ऐसे अधिशेष या एथेनॉल के लिए स्वीकृत चावल को डिस्टिलरी को उपलब्ध कराया जाता है, जहाँ उससे एथेनॉल तैयार किया जाता है। इससे दो फायदे होते हैं-
- अतिरिक्त अनाज का बेहतर उपयोग होता है।
- सरकार के भंडारण और रखरखाव का खर्च कम हो सकता है।
गन्ने का रस क्यों बन रहा है महत्वपूर्ण?
पहले चीनी मिलें गन्ने से चीनी बनाकर बचने वाले शीरे से एथेनॉल तैयार करती थीं। अब कई मिलें सीधे गन्ने के रस या बी-हैवी शीरे से भी एथेनॉल बना रही हैं। इसके फायदे-
- मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है।
- किसानों का भुगतान अपेक्षाकृत तेज़ हो सकता है।
- चीनी के अधिक उत्पादन को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
हाल के वर्षों में सरकार ने मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन को भी बढ़ावा दिया है। इसके कारण-
- मक्का उत्पादक किसानों को नई मांग मिल रही है।
- एथेनॉल उद्योग केवल गन्ने पर निर्भर नहीं रहता।
- फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन मिलता है।
पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण क्यों बढ़ाया जा रहा है?
भारत हर साल बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने से-
- पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम होती है।
- विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
- कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलती है।
- किसानों को अतिरिक्त बाज़ार मिलता है।
किसानों के लिए क्या बदल सकता है?
यदि एथेनॉल उद्योग लगातार विस्तार करता है, तो-
- गन्ना उत्पादकों की मांग बनी रह सकती है।
- मक्का किसानों को बेहतर बाज़ार मिल सकता है।
- प्रसंस्करण उद्योगों में निवेश बढ़ सकता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
क्या हैं चुनौतियाँ?
एथेनॉल कार्यक्रम के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ भी हैं-
- खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक उपयोग के बीच संतुलन
- गन्ने जैसी अधिक पानी वाली फसलों पर निर्भरता
- जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव
- डिस्टिलरी के पर्यावरणीय मानकों का पालन
- विभिन्न फीडस्टॉक की स्थिर उपलब्धता