भारत में पहली ओपन-सी फिश फार्मिंग की शुरुआत, जानिए क्या है ये तकनीक
Gaon Connection | Jan 19, 2026, 16:23 IST
अंडमान सागर के नॉर्थ बे में भारत की पहली ओपन-सी यानी खुले समुद्र में मछली पालन परियोजना की शुरुआत हो गई है। यह पहल ब्लू इकोनॉमी को मजबूत करने, मछुआरों की आमदनी बढ़ाने और समुद्री संसाधनों का टिकाऊ उपयोग करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
भारत के समुद्र अब सिर्फ लहरों और जहाज़ों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि रोज़गार, आमदनी और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते भी खोलेंगे। अंडमान सागर के नॉर्थ बे इलाके में भारत की पहली ओपन-सी यानी खुले समुद्र में समुद्री मछली पालन परियोजना की शुरुआत इसी बदलाव का संकेत है।
इस परियोजना का शुभारंभ केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने किया, नॉर्थ बे, श्री विजयापुरम के खुले समुद्री क्षेत्र में जब इस परियोजना की शुरुआत हुई, तो यह सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं था, बल्कि उन हजारों मछुआरों के लिए उम्मीद की नई किरण थी, जिनकी आजीविका समुद्र पर निर्भर है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के समुद्रों में उतनी ही बड़ी आर्थिक ताकत छुपी है जितनी हिमालय और मुख्य भूमि के संसाधनों में है, लेकिन आज़ादी के बाद दशकों तक इस क्षमता को नजरअंदाज किया गया। अब सरकार इस सोच को बदल रही है और समुद्र को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ रही है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले लगभग सत्तर वर्षों तक समुद्री संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं हुआ।
ओपन-सी फिश फार्मिंग का मतलब है समुद्र के खुले और गहरे पानी में वैज्ञानिक तरीके से मछलियों को पालना। इसमें मछलियों को पकड़ने के लिए जाल फैलाने के बजाय समुद्र के अंदर मजबूत तैरते हुए पिंजरे (केज) लगाए जाते हैं, जिनमें मछलियों के बच्चे डाले जाते हैं और उन्हें नियंत्रित वातावरण में बड़ा किया जाता है। ये पिंजरे खास तकनीक से बनाए जाते हैं ताकि तेज लहरों, तूफान और समुद्री धाराओं का सामना कर सकें। इन्हें समुद्र की सतह के नीचे एंकर से मजबूती से बांधा जाता है, जिससे वे अपनी जगह पर स्थिर रहें। मछलियों को तय मात्रा में पौष्टिक चारा दिया जाता है, उनकी सेहत पर नजर रखी जाती है और बीमारी से बचाने के लिए समय-समय पर जांच की जाती है। आमतौर पर 4 से 8 महीने में मछलियां बाजार में बेचने लायक हो जाती हैं।
इसे ओपन-सी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह नदी, तालाब या तट के पास नहीं, बल्कि खुले समुद्र में होती है, जहां पानी ज्यादा साफ होता है, ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है और मछलियों की बढ़वार तेजी से होती है। इस तकनीक से मछुआरों को साल भर स्थायी आमदनी मिल सकती है, समुद्र से जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने का दबाव कम होता है और प्राकृतिक मछली संसाधनों की रक्षा भी होती है। भारत जैसे देश के लिए यह बहुत अहम है क्योंकि हमारे पास हजारों किलोमीटर लंबा समुद्री तट और करोड़ों लोगों की आजीविका समुद्र पर निर्भर है।
ये भी पढ़ें: मछली पालन का भविष्य: स्वदेशी प्रजातियाँ बन सकती हैं सबसे बड़ा सहारा
ओपन-सी फिश फार्मिंग से अब सिर्फ मछली पकड़ने पर निर्भर रहने की बजाय समुद्र में मछली “उगाने” की नई व्यवस्था बन रही है, जिससे ब्लू इकोनॉमी को मजबूती मिलती है, निर्यात बढ़ता है और तटीय इलाकों में रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। यह तकनीक आने वाले समय में भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और मछुआरों की जिंदगी को सुरक्षित बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
यह परियोजना पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान यानी एनआईओटी और अंडमान-निकोबार प्रशासन के सहयोग से शुरू की गई है। इसका मकसद सिर्फ मछली उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि स्थानीय मछुआरा समुदायों को नई तकनीक से जोड़कर उनकी आमदनी को स्थायी बनाना है। इस पायलट परियोजना में खुले समुद्र में पिंजरे लगाकर फिनफिश पालन किया जा रहा है और साथ ही समुद्री शैवाल की खेती भी शुरू की गई है, जिससे भविष्य में खाद्य, दवा और उद्योगों के लिए कच्चा माल मिल सकेगा।
सरकार का मानना है कि इस परियोजना से मिले अनुभव आगे चलकर बड़े स्तर पर विस्तार का रास्ता खोलेंगे। डॉ. जितेंद्र सिंह ने संकेत दिया कि भविष्य में सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत इस तरह की परियोजनाओं को देश के दूसरे तटीय इलाकों में भी शुरू किया जा सकता है। इससे तकनीक तेजी से फैलेगी, निवेश बढ़ेगा और तटीय अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी
नॉर्थ बे में शुरू हुई यह ओपन-सी मछली पालन परियोजना सरकार की उस सोच को दिखाती है, जिसमें विज्ञान और तकनीक को सिर्फ लैब तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि सीधे समुद्र और गांवों तक पहुंचाया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि द्वीपीय और तटीय समुदाय विकास की प्रक्रिया में सिर्फ दर्शक नहीं रहेंगे, बल्कि भागीदार बनेंगे।
आज जब जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब ब्लू इकोनॉमी भारत के लिए एक नया रास्ता खोल रही है। अंडमान सागर से शुरू हुई यह पहल आने वाले वर्षों में देश के समुद्री तटों पर हजारों परिवारों की किस्मत बदल सकती है और भारत को समुद्र आधारित अर्थव्यवस्था में वैश्विक स्तर पर मजबूत बना सकती है।
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इस परियोजना का शुभारंभ केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने किया, नॉर्थ बे, श्री विजयापुरम के खुले समुद्री क्षेत्र में जब इस परियोजना की शुरुआत हुई, तो यह सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं था, बल्कि उन हजारों मछुआरों के लिए उम्मीद की नई किरण थी, जिनकी आजीविका समुद्र पर निर्भर है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के समुद्रों में उतनी ही बड़ी आर्थिक ताकत छुपी है जितनी हिमालय और मुख्य भूमि के संसाधनों में है, लेकिन आज़ादी के बाद दशकों तक इस क्षमता को नजरअंदाज किया गया। अब सरकार इस सोच को बदल रही है और समुद्र को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ रही है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले लगभग सत्तर वर्षों तक समुद्री संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं हुआ।
क्या है ओपन-सी फिश फार्मिंग
नॉर्थ बे, श्री विजयापुरम के खुले समुद्री क्षेत्र में जब इस परियोजना की शुरुआत हुई।
इसे ओपन-सी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह नदी, तालाब या तट के पास नहीं, बल्कि खुले समुद्र में होती है, जहां पानी ज्यादा साफ होता है, ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है और मछलियों की बढ़वार तेजी से होती है। इस तकनीक से मछुआरों को साल भर स्थायी आमदनी मिल सकती है, समुद्र से जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने का दबाव कम होता है और प्राकृतिक मछली संसाधनों की रक्षा भी होती है। भारत जैसे देश के लिए यह बहुत अहम है क्योंकि हमारे पास हजारों किलोमीटर लंबा समुद्री तट और करोड़ों लोगों की आजीविका समुद्र पर निर्भर है।
ये भी पढ़ें: मछली पालन का भविष्य: स्वदेशी प्रजातियाँ बन सकती हैं सबसे बड़ा सहारा
ओपन-सी फिश फार्मिंग से अब सिर्फ मछली पकड़ने पर निर्भर रहने की बजाय समुद्र में मछली “उगाने” की नई व्यवस्था बन रही है, जिससे ब्लू इकोनॉमी को मजबूती मिलती है, निर्यात बढ़ता है और तटीय इलाकों में रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। यह तकनीक आने वाले समय में भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और मछुआरों की जिंदगी को सुरक्षित बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
किसने शुरू की ये परियोजना
सरकार का मानना है कि इस परियोजना से मिले अनुभव आगे चलकर बड़े स्तर पर विस्तार का रास्ता खोलेंगे। डॉ. जितेंद्र सिंह ने संकेत दिया कि भविष्य में सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत इस तरह की परियोजनाओं को देश के दूसरे तटीय इलाकों में भी शुरू किया जा सकता है। इससे तकनीक तेजी से फैलेगी, निवेश बढ़ेगा और तटीय अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी
नॉर्थ बे में शुरू हुई यह ओपन-सी मछली पालन परियोजना सरकार की उस सोच को दिखाती है, जिसमें विज्ञान और तकनीक को सिर्फ लैब तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि सीधे समुद्र और गांवों तक पहुंचाया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि द्वीपीय और तटीय समुदाय विकास की प्रक्रिया में सिर्फ दर्शक नहीं रहेंगे, बल्कि भागीदार बनेंगे।
आज जब जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब ब्लू इकोनॉमी भारत के लिए एक नया रास्ता खोल रही है। अंडमान सागर से शुरू हुई यह पहल आने वाले वर्षों में देश के समुद्री तटों पर हजारों परिवारों की किस्मत बदल सकती है और भारत को समुद्र आधारित अर्थव्यवस्था में वैश्विक स्तर पर मजबूत बना सकती है।
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