भारत में हर साल 15-40 दिन बढ़ेगी भीषण गर्मी, आने वाले 20 साल में बढ़ेंगी ‘उमस भरी रातें’, AI रिपोर्ट ने दी बड़ी चेतावनी
Gaon Connection | Apr 30, 2026, 12:37 IST
भारत में जलवायु परिवर्तन की बड़ी चेतावनी सामने आई है। एक नया एआई प्लेटफॉर्म CRAVIS बताता है कि अगले 20 सालों में हर साल 15 से 40 अतिरिक्त गर्म दिन और भारी बारिश की घटनाएं बढ़ेंगी। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों पर इसका ज्यादा असर दिखेगा। यह डेटा नीति निर्माण और आपदा प्रबंधन में मदद करेगा।
हीटवेव का खतरा कई गुना बढ़ेगा!
देश में तेजी से बदलते जलवायु पैटर्न को लेकर एक बड़ी चेतावनी सामने आई है। एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित क्लाइमेट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म के अनुसार, अगले दो दशकों में भारत में हर साल 15 से 40 अतिरिक्त असामान्य गर्म दिन देखने को मिल सकते हैं। यह अनुमान 1981-2010 के जलवायु आधार स्तर की तुलना में लगाया गया है। साथ ही, भारी बारिश की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी की आशंका जताई गई है।
यह प्लेटफॉर्म ‘क्लाइमेट रेजिलिएंस एनालिटिक्स एंड विजुअलाइजेशन इंटेलिजेंस सिस्टम’ (CRAVIS) के नाम से जाना जाता है, जिसे दिल्ली स्थित जलवायु थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) ने विकसित किया है। इसे बुधवार को लॉन्च किया गया। CRAVIS 40 वर्षों के ऐतिहासिक जलवायु डेटा को जोड़कर भविष्य के अनुमान तैयार करता है और 2030-50 तथा 2051-70 तक के प्रोजेक्शन देने में सक्षम है।
CRAVIS के अनुसार देश के कई हिस्सों में हर साल 20 से 40 गर्म रातों की संख्या भी बढ़ सकती है। इसके अलावा भारी वर्षा की घटनाओं में भी लगातार वृद्धि होगी और कई जिलों में हर साल 10 से 30 अतिरिक्त भारी बारिश वाले दिन दर्ज किए जा सकते हैं। यह बदलाव आने वाले समय में जलवायु जोखिम को और बढ़ा सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे मध्य और दक्षिणी राज्यों में गर्म दिनों और बारिश दोनों में ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। इससे इन क्षेत्रों में मौसम से जुड़ी चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
CRAVIS प्लेटफॉर्म 279 संकेतकों के आधार पर जिला, राज्य और ग्रिड स्तर पर तापमान, वर्षा और आर्द्रता से जुड़े 20 से अधिक विश्लेषण योग्य आंकड़े उपलब्ध कराता है। CEEW के CEO अरुणाभ घोष ने कहा कि यह प्लेटफॉर्म जलवायु डेटा को सिर्फ मॉडल तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे नीति निर्माताओं और प्रशासन के लिए उपयोगी बनाता है, ताकि रोजमर्रा की योजना और आपदा प्रबंधन में इसका इस्तेमाल किया जा सके। यह सिस्टम भविष्य में भारत के साथ-साथ ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के लिए भी मददगार साबित हो सकता है।