अल नीनो और एथेनॉल की बढ़ती माँग से चीनी निर्यात पर संकट, भारत कई वर्षों तक नहीं कर पाएगा निर्यात: रिपोर्ट
Gaon Connection | Jun 22, 2026, 11:52 IST
अल नीनो और एथेनॉल की बढ़ती माँग के कारण भारत में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अगले कम से कम तीन सीज़न तक भारत के पास निर्यात के लिए पर्याप्त अतिरिक्त चीनी नहीं होगी। कम बारिश से गन्ने की बुवाई प्रभावित हो रही है, जबकि एथेनॉल उत्पादन के लिए भी अधिक गन्ने की आवश्यकता बढ़ रही है। भविष्य में चीनी आयात की नौबत भी आ सकती है।
भारत के चीनी निर्यात को लग सकता है लंबा झटका
कभी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक रहा भारत आने वाले कई वर्षों तक वैश्विक चीनी बाज़ार में सीमित भूमिका निभा सकता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो के कारण गन्ना उत्पादन पर मंडरा रहे ख़तरे और एथेनॉल की बढ़ती माँग के चलते देश में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ रहा है। उद्योग से जुड़े अधिकारियों, व्यापारियों और किसानों का मानना है कि अगले कम से कम तीन सीज़न तक भारत के पास निर्यात के लिए पर्याप्त अतिरिक्त चीनी उपलब्ध नहीं होगी।
यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के उन देशों को भी प्रभावित कर सकती है जो भारतीय चीनी पर निर्भर रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत लंबे समय तक निर्यात बाज़ार से बाहर रहता है तो वैश्विक आपूर्ति और माँग का संतुलन प्रभावित हो सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की क़ीमतों को सहारा मिल सकता है। साथ ही, मौसम से जुड़े जोखिम और जैव ईंधन नीतियाँ वैश्विक चीनी व्यापार की दिशा बदल सकती हैं।
मुंबई स्थित कमोडिटी ट्रेडिंग कंपनी MEIR Commodities India के प्रबंध निदेशक राहिल शेख ने कहा, "भारत में पहले से ही चीनी की आपूर्ति दबाव में है और अब अल नीनो एक बड़ा जोखिम बनकर उभर रहा है। यदि अनुमान के मुताबिक बारिश कम रहती है तो गन्ने की बुवाई प्रभावित होगी और भारत कम से कम तीन वर्षों तक चीनी निर्यात बाज़ार से बाहर रह सकता है।" उन्होंने कहा कि एल नीनो का असर ब्राज़ील और थाईलैंड जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक देशों की फसलों पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चीनी एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील वस्तु मानी जाती है क्योंकि देश में इसकी खपत बहुत अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार आने वाले वर्षों में बहुवर्षीय प्रतिबंध लगाने के बजाय हर सीज़न में चीनी निर्यात की अनुमति पर अलग-अलग फ़ैसला ले सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल ही में केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने चीनी मिलों से घरेलू उपलब्धता को प्राथमिकता देने और निर्यात के लिए दबाव नहीं बनाने को कहा था।
रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष एल नीनो के कारण मानसून पिछले 11 वर्षों के सबसे कमज़ोर स्तर पर रह सकता है। जून में सामान्य से 40 प्रतिशत से अधिक कम बारिश दर्ज होने के कारण कई किसानों ने गन्ने की बुवाई टाल दी है। महाराष्ट्र के सांगली ज़िले के किसान संभाजी पाटिल ने कहा, "मैं जून में लंबी अवधि वाली गन्ने की किस्में लगाने की योजना बना रहा था, लेकिन कम बारिश की आशंका को देखते हुए मैंने वह योजना फिलहाल रोक दी और दो एकड़ क्षेत्र में सोयाबीन लगाने का फ़ैसला किया।"
राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे ने कहा कि किसान कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। इससे 2027-28 सीज़न में गन्ने का रकबा और उपलब्धता दोनों प्रभावित हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कई चीनी उत्पादक क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन किसानों को सोयाबीन, अरहर और अन्य दलहनी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। साथ ही सिंचाई के लिए पानी की आपूर्ति पर भी कुछ स्थानों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं।
उद्योग के अनुमान के मुताबिक, चालू सीज़न में भारत का चीनी उत्पादन 30.95 मिलियन टन रहने की उम्मीद थी, लेकिन अब इसे घटाकर 27.9 मिलियन टन आँका जा रहा है। यह देश की वार्षिक खपत 28.5 मिलियन टन से कम है। 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीज़न में चीनी मिलों के पास शुरुआती स्टॉक घटकर लगभग 35 लाख टन रह सकता है, जो तीन दशक से अधिक समय का सबसे निचला स्तर होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा दे रहा है। उद्योग के अनुमान बताते हैं कि 2039-40 तक एथेनॉल की माँग मौजूदा 12 से 13 अरब लीटर से बढ़कर लगभग 30 अरब लीटर तक पहुँच सकती है। गोदावरी बायोरिफाइनरीज़ के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक समीर सोमैया ने कहा, "एथेनॉल की माँग में वृद्धि का रुझान बेहद मज़बूत है। माँग में अगला बड़ा उछाल फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के व्यावसायिक विस्तार से आएगा।"
रिपोर्ट के अनुसार, यदि अल नीनो के कारण गन्ना उत्पादन और बुवाई क्षेत्र में बड़ी गिरावट आती है तो आने वाले वर्षों में भारत को चीनी आयात करने की ज़रूरत भी पड़ सकती है। नई दिल्ली स्थित ट्रेडिंग कंपनी K.S. Commodities के निदेशक मोहन नारंग ने कहा, "गंभीर एल नीनो और एथेनॉल की बढ़ती माँग के कारण न केवल भारत का चीनी निर्यात समाप्त हो सकता है, बल्कि आने वाले वर्षों में देश को चीनी आयात करने की आवश्यकता भी पड़ सकती है।" भारत ने आख़िरी बार 2016-17 और 2017-18 में चीनी आयात की थी, जब 2015 के अल नीनो से जुड़े सूखे ने गन्ने की खेती को प्रभावित किया था।
यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के उन देशों को भी प्रभावित कर सकती है जो भारतीय चीनी पर निर्भर रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत लंबे समय तक निर्यात बाज़ार से बाहर रहता है तो वैश्विक आपूर्ति और माँग का संतुलन प्रभावित हो सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की क़ीमतों को सहारा मिल सकता है। साथ ही, मौसम से जुड़े जोखिम और जैव ईंधन नीतियाँ वैश्विक चीनी व्यापार की दिशा बदल सकती हैं।