Soil Health: क्या रासायनिक उर्वरक भारत की खेती को बर्बाद कर रहे हैं? मिट्टी की सेहत पर बढ़ता खतरा!
Preeti Nahar | Apr 30, 2026, 12:37 IST
कृषि की नींव भारत की उर्वर जमीन पर है। हालांकि, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जमीन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि हमें संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाना चाहिए और हरी खाद जैसे जैविक विकल्पों का उपयोग करना चाहिए।
रयासनों के अधिक इस्तेमाल से बढ़ती है लागत
भारत की कृषि व्यवस्था की नींव उसकी उपजाऊ मिट्टी है। यही धरती किसानों की आजीविका का आधार है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी पूंजी भी। लेकिन हाल के वर्षों में अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक उर्वरकों विशेषकर यूरिया और डीएपी का अत्यधिक उपयोग तेजी से बढ़ा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, खेती में रसायनों के अधिक इस्तेमाल पर अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन लंबे समय में मिट्टी की सेहत और खेती की स्थिरता दोनों के लिए खतरा बन रही है।
Indian Council of Agricultural Research (ICAR) के अनुसार, रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही है। मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जिंक, आयरन और सल्फर तेजी से कम हो रहे हैं, जिससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो रहा है। इसके साथ ही, उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल भूजल और अन्य जल स्रोतों को भी प्रदूषित कर रहा है। परिणामस्वरूप खेती की लागत बढ़ती जा रही है और किसानों की आय पर भी असर पड़ रहा है।
इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान संतुलित उर्वरक प्रबंधन को अपनाना है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसान रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैव उर्वरकों का भी उपयोग करें। हरी खाद (ग्रीन मैन्योर) जैसे मूंग, ढैंचा या सनई की खेती करके मिट्टी में प्राकृतिक पोषण बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, वर्मी कंपोस्ट के उपयोग से मिट्टी की संरचना सुधरती है और उसकी जलधारण क्षमता भी बढ़ती है। लखनऊ के CIMAP संस्थान, के वैज्ञानिक राजेश वर्मा से गाँव कनेक्शन ने मिट्टी की सेहत को लेकर बात की।
ICAR और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) किसानों को मिट्टी परीक्षण के महत्व के बारे में जागरूक कर रहे हैं।
राजेश वर्मा बताते हैं, किसी भी खेत की मिट्टी की उर्वरता जानने के लिए मिट्टी की जाँच कराना सबसे जरूरी होता है। इसमें सबसे पहले मिट्टी का पीएच यानी उसका स्वभाव देखा जाता है कि वह अम्लीय है, क्षारीय है या सामान्य है। इसके बाद मिट्टी में मौजूद जीवांश पदार्थ, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा की जाँच की जाती है। साथ ही जिंक, आयरन, मैंगनीज और कॉपर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी जाँच की जाती है। इन सभी परीक्षणों के आधार पर खेत का सोइल हेल्थ कार्ड तैयार किया जाता है। अगर किसान मिट्टी की जाँच के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें और इसके साथ जैविक खाद जैसे गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और बायोफर्टिलाइजर का उपयोग करें तो मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनाए रखी जा सकती है।
कई किसानों ने कृषि विज्ञान केंद्रों के मार्गदर्शन में संतुलित उर्वरक उपयोग और जैविक विकल्प अपनाए हैं। उनका कहना है कि यूरिया पर निर्भरता कम करने और हरी खाद व जैविक उर्वरकों के इस्तेमाल से खेती की लागत में कमी आई है। साथ ही, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है और फसल उत्पादन भी स्थिर बना हुआ है, जिससे आर्थिक लाभ बढ़ा है।
देशभर में ICAR के संस्थान और कृषि विज्ञान केंद्र मिलकर किसानों के बीच जागरूकता अभियान चला रहे हैं। इसमें संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती और वैज्ञानिक सलाह को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस दिशा में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी किसानों से अपील की है कि वे धरती माता की सेहत का ध्यान रखें और उर्वरकों का संतुलित उपयोग करें, क्योंकि अत्यधिक यूरिया का उपयोग मिट्टी और भविष्य दोनों के लिए हानिकारक है।
मिट्टी की सेहत को बचाए बिना कृषि का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी परीक्षण और जैविक विकल्पों को अपनाकर ही टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। “मिट्टी है तो भविष्य है”- इस सोच के साथ किसानों और नीति-निर्माताओं को मिलकर काम करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ जमीन सुरक्षित रह सके।
अत्यधिक उर्वरक उपयोग के दुष्प्रभाव
रयासनों के अधिक इस्तेमाल से बढ़ती है लागत
समाधान: संतुलित उर्वरक प्रबंधन
ज्यादा से ज्यादा करें हरी खाद का इस्तेमाल
मिट्टी परीक्षण और वैज्ञानिक सलाह की भूमिका
राजीव वर्मा, वैज्ञानिक, CIMAP, लखनऊ
- लखनऊ के CIMAP संस्थान, के वैज्ञानिक राजेश वर्मा गाँव कनेक्शन को बताते हैं, मिट्टी की जाँच से यह पता चलता है कि किस खेत में कौन-से पोषक तत्वों की कमी है, जिससे किसान जरूरत के अनुसार ही उर्वरक का उपयोग कर सकते हैं। इससे न केवल लागत कम होती है, बल्कि फसल उत्पादन भी बेहतर होता है।
- पहले किसान फसल कटाई के बाद बचा हुआ अवशेष खेत में ही सड़ा देते थे। इससे मिट्टी में जीवांश पदार्थ बना रहता था। लेकिन अब अधिक उत्पादन लेने की होड़ और लगातार खेती करने की वजह से फसल अवशेषों को खेत में सड़ने का समय नहीं मिल पाता।
- इसके अलावा देश में पशुओं की संख्या भी धीरे-धीरे कम हो रही है, जिससे गोबर की खाद जैसी प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल भी कम हो गया है।
- इसके साथ-साथ किसान ज्यादा उत्पादन के लिए रासायनिक उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल करने लगे हैं। कई बार ये खाद असंतुलित मात्रा में डाली जाती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।
क्यों ज़रूरी है मिट्टी की जाँच कराना?
मिट्टी की उर्वरता जानने के लिए मिट्टी की जाँच कराना सबसे जरूरी
किसानों के अनुभव: लागत में कमी, मुनाफे में वृद्धि
जागरूकता और सरकारी पहल
मिट्टी की जाँच के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें