ग्राम सभाओं में कम भागीदारी की बड़ी वजह सामने आई, रोज़गार और समय की कमी सबसे बड़ी बाधा; राष्ट्रीय अध्ययन में खुलासा
Umang | Jun 30, 2026, 18:04 IST
ग्राम सभाओं में कम भागीदारी पर हुए राष्ट्रीय अध्ययन में रोज़गार और समय की कमी सबसे बड़ी वजह सामने आई है। 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुए इस अध्ययन में जागरूकता, पारदर्शिता, भरोसे की कमी और संवाद संबंधी समस्याओं को भी प्रमुख बाधाएँ बताया गया है। रिपोर्ट में जनजागरूकता, महिला सहभागिता, डिजिटल संचार और पारदर्शिता बढ़ाने समेत कई नीतिगत सुझाव दिए गए हैं।
राष्ट्रीय अध्ययन में ग्राम सभाओं को अधिक प्रभावी और सहभागी बनाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं।
देश में ग्राम सभाओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे अहम इकाई माना जाता है, लेकिन इनमें लोगों की कम भागीदारी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसी स्थिति को समझने के लिए किए गए एक राष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि ग्राम सभाओं में लोगों की कम मौजूदगी किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और व्यवहारगत कारणों का मिला-जुला असर है। अध्ययन के अनुसार रोज़गार और समय की कमी ग्राम सभा बैठकों में भागीदारी की सबसे बड़ी बाधा है, जबकि जागरूकता, संवाद, पारदर्शिता और स्थानीय स्तर पर भरोसे की कमी जैसी चुनौतियाँ भी लोगों की भागीदारी को प्रभावित कर रही हैं।
यह अध्ययन ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज के क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े फील्ड सर्वेक्षणों में से एक माना जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल ग्राम सभाओं में कम भागीदारी के कारणों की पहचान करना ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव देना भी है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि केवल ग्राम सभा की बैठक होने की जानकारी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों को ग्राम सभा के अधिकारों, निर्णय प्रक्रिया और उसकी भूमिका की स्पष्ट समझ भी होनी चाहिए।
पंचायती राज मंत्रालय ने ग्राम सभाओं में कम भागीदारी पर राष्ट्रीय अध्ययन का दायित्व राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (एनआईआरडीपीआर) को सौंपा था। अध्ययन का उद्देश्य ग्राम सभाओं में भागीदारी को प्रभावित करने वाले कारणों का विश्लेषण करना, विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी का आकलन करना, संस्थागत एवं प्रशासनिक चुनौतियों की पहचान करना, बेहतर सहभागिता के लिए अपनाए जा रहे नवाचारों का दस्तावेज़ तैयार करना तथा स्थानीय स्वशासन को मज़बूत करने के लिए सुझाव देना था।
यह अध्ययन 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 400 ग्राम पंचायतों में किया गया। इनमें 50 पेसा (PESA) ग्राम पंचायतें और 130 महिला-अनुकूल ग्राम पंचायतें भी शामिल थीं। अध्ययन में लगभग 7,800 लोगों ने भाग लिया, जिनमें ग्राम सभा के सदस्य, निर्वाचित प्रतिनिधि, पंचायत अधिकारी, स्वयं सहायता समूहों के सदस्य, सामुदायिक नेता और अन्य हितधारक शामिल रहे। जानकारी जुटाने के लिए संरचित प्रश्नावली, हितधारकों से परामर्श, फील्ड अवलोकन और सामुदायिक संवाद का सहारा लिया गया।
अध्ययन के अनुसार ग्राम सभाओं में कम भागीदारी की सबसे बड़ी वजह रोज़गार और समय से जुड़ी बाधाएँ (55.50 प्रतिशत) हैं। इसके बाद जागरूकता एवं संवाद संबंधी समस्याएँ (16.22 प्रतिशत), रुचि और प्रासंगिकता से जुड़े मुद्दे (9.93 प्रतिशत), भागीदारी एवं समावेशन की बाधाएँ (5.54 प्रतिशत), सेवा वितरण संबंधी समस्याएँ (4.92 प्रतिशत), प्रशासन और भरोसे से जुड़े मुद्दे (3.97 प्रतिशत) तथा आवागमन एवं पहुँच की समस्याएँ (2.92 प्रतिशत) प्रमुख कारण पाए गए।
रोज़गार संबंधी कारणों में व्यस्त कार्य-तालिका (41.74 प्रतिशत) और कृषि कार्य (30.26 प्रतिशत) सबसे बड़ी बाधाओं के रूप में सामने आए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रवासी परिवार (17.61 प्रतिशत), युवा (16.73 प्रतिशत), बुज़ुर्ग (15.80 प्रतिशत) और महिलाएँ (13.40 प्रतिशत) ग्राम सभा की प्रक्रियाओं में सबसे कम प्रतिनिधित्व वाले समूह हैं। इसके अलावा लोगों को ग्राम सभा की बैठकों की जानकारी तो रहती है, लेकिन नागरिक अधिकारों, कोरम, निर्णय प्रक्रिया और ग्राम सभा की संस्थागत भूमिका के बारे में उनकी जानकारी अपेक्षाकृत कम है।
अध्ययन में 'ग्राम सभा सहभागिता थकान' (Gram Sabha Participation Fatigue) का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार बार-बार बैठकें होने के बावजूद ठोस परिणाम नहीं दिखना, शिकायतों का समाधान न होना, एक जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा और निर्णयों पर प्रभावी अमल नहीं होने से लोगों का उत्साह धीरे-धीरे कम हो जाता है। इस स्थिति के पीछे पारदर्शिता की कमी (45.5 प्रतिशत), चर्चाओं की प्रासंगिकता का अभाव (42.0 प्रतिशत), बार-बार एक जैसी चर्चा (33.4 प्रतिशत), भरोसे की कमी (32.7 प्रतिशत), राजनीतिक हस्तक्षेप (27.9 प्रतिशत) और शिकायत निवारण की कमज़ोर व्यवस्था (16.2 प्रतिशत) प्रमुख कारण बताए गए हैं।
अध्ययन के अनुसार लोगों ने ग्राम सभाओं में भागीदारी बढ़ाने के लिए सबसे प्रभावी उपाय जागरूकता और जनसंपर्क अभियान (48.2 प्रतिशत) को माना। इसके बाद घर-घर संपर्क अभियान (22.2 प्रतिशत), सुविधाजनक समय पर बैठकें (10.6 प्रतिशत), बैठकों को अधिक संवादात्मक और नागरिक-केंद्रित बनाना (7.0 प्रतिशत), बेहतर सुविधाएँ और पहुँच (6.2 प्रतिशत), निर्णयों का प्रभावी क्रियान्वयन (5.0 प्रतिशत), पारदर्शिता और जवाबदेही (5.3 प्रतिशत), महिलाओं की अधिक भागीदारी (4.7 प्रतिशत), प्रभावी शिकायत निवारण (4.2 प्रतिशत) तथा वार्ड सभाओं और अधिकारियों की नियमित भागीदारी (3.4-3.4 प्रतिशत) जैसे सुझाव दिए गए।
रिपोर्ट में स्वयं सहायता समूहों के नेतृत्व में जनजागरण, विषय-आधारित ग्राम सभाएँ, बाल सभाएँ, महिला-केंद्रित पहल और तकनीक आधारित संचार प्रणाली जैसी नवाचारी पहलों का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर ग्राम सभा जागरूकता, प्रक्रियात्मक साक्षरता और जनभागीदारी अभियान शुरू करने, कृषि कार्य और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बैठकों का समय तय करने, महिला सभा, वार्ड सभा और युवा सभा जैसी व्यवस्थाओं को मज़बूत करने, कार्रवाई प्रतिवेदन (ATR), शिकायत ट्रैकिंग प्रणाली, सार्वजनिक समीक्षा व्यवस्था, एजेंडा और बजट की अग्रिम सार्वजनिक जानकारी तथा डिजिटल संचार माध्यमों के व्यापक उपयोग की सिफ़ारिश की गई है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि ग्राम सभाओं को केवल बैठक आयोजित करने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें पारदर्शी, जवाबदेह, समावेशी और परिणामोन्मुख बनाना होगा, तभी स्थानीय लोकतंत्र और सामुदायिक विकास को मज़बूती मिल सकेगी।
यह अध्ययन ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज के क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े फील्ड सर्वेक्षणों में से एक माना जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल ग्राम सभाओं में कम भागीदारी के कारणों की पहचान करना ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव देना भी है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि केवल ग्राम सभा की बैठक होने की जानकारी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों को ग्राम सभा के अधिकारों, निर्णय प्रक्रिया और उसकी भूमिका की स्पष्ट समझ भी होनी चाहिए।
26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुआ सर्वे
यह अध्ययन 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 400 ग्राम पंचायतों में किया गया। इनमें 50 पेसा (PESA) ग्राम पंचायतें और 130 महिला-अनुकूल ग्राम पंचायतें भी शामिल थीं। अध्ययन में लगभग 7,800 लोगों ने भाग लिया, जिनमें ग्राम सभा के सदस्य, निर्वाचित प्रतिनिधि, पंचायत अधिकारी, स्वयं सहायता समूहों के सदस्य, सामुदायिक नेता और अन्य हितधारक शामिल रहे। जानकारी जुटाने के लिए संरचित प्रश्नावली, हितधारकों से परामर्श, फील्ड अवलोकन और सामुदायिक संवाद का सहारा लिया गया।
रोज़गार और समय की कमी सबसे बड़ी बाधा
रोज़गार संबंधी कारणों में व्यस्त कार्य-तालिका (41.74 प्रतिशत) और कृषि कार्य (30.26 प्रतिशत) सबसे बड़ी बाधाओं के रूप में सामने आए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रवासी परिवार (17.61 प्रतिशत), युवा (16.73 प्रतिशत), बुज़ुर्ग (15.80 प्रतिशत) और महिलाएँ (13.40 प्रतिशत) ग्राम सभा की प्रक्रियाओं में सबसे कम प्रतिनिधित्व वाले समूह हैं। इसके अलावा लोगों को ग्राम सभा की बैठकों की जानकारी तो रहती है, लेकिन नागरिक अधिकारों, कोरम, निर्णय प्रक्रिया और ग्राम सभा की संस्थागत भूमिका के बारे में उनकी जानकारी अपेक्षाकृत कम है।
अध्ययन में 'ग्राम सभा सहभागिता थकान' (Gram Sabha Participation Fatigue) का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार बार-बार बैठकें होने के बावजूद ठोस परिणाम नहीं दिखना, शिकायतों का समाधान न होना, एक जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा और निर्णयों पर प्रभावी अमल नहीं होने से लोगों का उत्साह धीरे-धीरे कम हो जाता है। इस स्थिति के पीछे पारदर्शिता की कमी (45.5 प्रतिशत), चर्चाओं की प्रासंगिकता का अभाव (42.0 प्रतिशत), बार-बार एक जैसी चर्चा (33.4 प्रतिशत), भरोसे की कमी (32.7 प्रतिशत), राजनीतिक हस्तक्षेप (27.9 प्रतिशत) और शिकायत निवारण की कमज़ोर व्यवस्था (16.2 प्रतिशत) प्रमुख कारण बताए गए हैं।
जागरूकता अभियान, महिला सहभागिता और डिजिटल व्यवस्था पर ज़ोर
रिपोर्ट में स्वयं सहायता समूहों के नेतृत्व में जनजागरण, विषय-आधारित ग्राम सभाएँ, बाल सभाएँ, महिला-केंद्रित पहल और तकनीक आधारित संचार प्रणाली जैसी नवाचारी पहलों का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर ग्राम सभा जागरूकता, प्रक्रियात्मक साक्षरता और जनभागीदारी अभियान शुरू करने, कृषि कार्य और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बैठकों का समय तय करने, महिला सभा, वार्ड सभा और युवा सभा जैसी व्यवस्थाओं को मज़बूत करने, कार्रवाई प्रतिवेदन (ATR), शिकायत ट्रैकिंग प्रणाली, सार्वजनिक समीक्षा व्यवस्था, एजेंडा और बजट की अग्रिम सार्वजनिक जानकारी तथा डिजिटल संचार माध्यमों के व्यापक उपयोग की सिफ़ारिश की गई है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि ग्राम सभाओं को केवल बैठक आयोजित करने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें पारदर्शी, जवाबदेह, समावेशी और परिणामोन्मुख बनाना होगा, तभी स्थानीय लोकतंत्र और सामुदायिक विकास को मज़बूती मिल सकेगी।