ग्राम सभाओं में लोगों की घटती भागीदारी पर देश की 400 पंचायतों में हुआ सर्वे, 30 जून को जारी होगी रिपोर्ट
Gaon Connection | Jun 29, 2026, 13:34 IST
ग्राम सभाओं में घटती जनभागीदारी के कारणों और समाधान तलाशने के लिए तैयार राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट 30 जून को जारी होगी। 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 400 ग्राम पंचायतों तथा करीब 7,790 लोगों के सर्वे पर आधारित इस रिपोर्ट में जागरूकता, समावेशिता, पंचायतों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही जैसे पहलुओं का विश्लेषण कर स्थानीय लोकतंत्र को मज़बूत करने के सुझाव दिए गए हैं।
ग्राम सभा की बैठक में स्थानीय मुद्दों पर चर्चा करते ग्रामीण (सांकेतिक तस्वीर)
ग्रामीण लोकतंत्र की मज़बूती काफी हद तक ग्राम सभाओं की सक्रियता पर निर्भर करती है, लेकिन देश के कई हिस्सों में इन बैठकों में लोगों की भागीदारी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। इसी स्थिति को समझने और इसके पीछे के कारणों की पहचान करने के लिए तैयार राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट 30 जून को नई दिल्ली में जारी की जाएगी। रिपोर्ट में यह जानने का प्रयास किया गया है कि ग्रामीण नागरिक ग्राम सभाओं से क्यों दूर हो रहे हैं और उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए किन व्यावहारिक कदमों की ज़रूरत है।
पंचायती राज मंत्रालय के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (एनआईआरडी एंड पीआर) द्वारा तैयार इस अध्ययन को स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को अधिक सहभागी, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। रिपोर्ट में जमीनी स्तर पर एकत्र किए गए आँकड़ों के आधार पर ऐसे सुझाव दिए गए हैं, जो ग्राम सभाओं को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ नीति निर्माण और पंचायती राज संस्थाओं को मज़बूत करने में भी सहायक हो सकते हैं।
राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट का विमोचन 30 जून को नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम करेंगे। कार्यक्रम में पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान के प्रतिनिधि, शिक्षाविद, शोधकर्ता तथा पंचायती राज से जुड़े विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। अध्ययन के लिए 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की लगभग 400 ग्राम पंचायतों में व्यापक फील्ड सर्वे किया गया। इसमें करीब 7,790 लोगों की राय ली गई, जबकि अध्ययन में पेसा क्षेत्रों और महिला नेतृत्व वाली ग्राम पंचायतों को भी शामिल किया गया, ताकि विभिन्न सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों में ग्राम सभाओं की वास्तविक स्थिति का समग्र आकलन किया जा सके।
रिपोर्ट में यह परखा गया है कि ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी किन कारणों से प्रभावित होती है। इसके लिए ग्रामीणों में जागरूकता का स्तर, सूचना और संचार व्यवस्था, महिलाओं एवं वंचित वर्गों की भागीदारी, पंचायतों की कार्यप्रणाली, स्थानीय संस्थाओं की जवाबदेही, बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और नागरिकों के अनुभव जैसे विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य केवल समस्याओं की पहचान करना नहीं, बल्कि ग्राम सभाओं को अधिक सक्रिय, समावेशी और प्रभावी बनाने के लिए साक्ष्य आधारित सुझाव देना भी है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243A के तहत ग्राम सभा को स्थानीय स्वशासन की आधारशिला माना गया है। ग्रामीण विकास योजनाओं की योजना बनाने, उनके क्रियान्वयन की निगरानी करने और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय करने में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्राम सभाओं में नागरिकों की भागीदारी बढ़ती है तो पंचायतों की कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी होगी, सरकारी योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा और गाँवों में लोकतांत्रिक भागीदारी को नई मज़बूती मिलेगी।
पंचायती राज मंत्रालय के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (एनआईआरडी एंड पीआर) द्वारा तैयार इस अध्ययन को स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को अधिक सहभागी, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। रिपोर्ट में जमीनी स्तर पर एकत्र किए गए आँकड़ों के आधार पर ऐसे सुझाव दिए गए हैं, जो ग्राम सभाओं को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ नीति निर्माण और पंचायती राज संस्थाओं को मज़बूत करने में भी सहायक हो सकते हैं।
26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 400 ग्राम पंचायतों में हुआ अध्ययन
रिपोर्ट में यह परखा गया है कि ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी किन कारणों से प्रभावित होती है। इसके लिए ग्रामीणों में जागरूकता का स्तर, सूचना और संचार व्यवस्था, महिलाओं एवं वंचित वर्गों की भागीदारी, पंचायतों की कार्यप्रणाली, स्थानीय संस्थाओं की जवाबदेही, बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और नागरिकों के अनुभव जैसे विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य केवल समस्याओं की पहचान करना नहीं, बल्कि ग्राम सभाओं को अधिक सक्रिय, समावेशी और प्रभावी बनाने के लिए साक्ष्य आधारित सुझाव देना भी है।