बिहार में म्यूटेशन प्रक्रिया के नियम बदले, ज़मीन की दाखिल-खारिज से पहले होगी ये अनिवार्य जाँच, जानें पूरी खबर
Gaon Connection | Jun 22, 2026, 13:09 IST
बिहार सरकार ने दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की प्रक्रिया को और सख़्त बना दिया है। अब हर आवेदन की जाँच सरकारी भूमि रिकॉर्ड से मिलान के बाद ही होगी। इसका उद्देश्य सरकारी ज़मीन पर फर्जी जमाबंदी और अवैध दावों को रोकना है। साथ ही सरकारी भूमि हस्तांतरण के नियमों में भी बदलाव किया गया है, जिससे विकास परियोजनाओं के लिए ज़मीन उपलब्ध कराना आसान होगा।
ज़मीन विवाद कम करने की तैयारी
बिहार में ज़मीन खरीद-बिक्री और दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा बदलाव किया है। अब किसी भी ज़मीन के दाखिल-खारिज आवेदन पर फ़ैसला लेने से पहले यह अनिवार्य रूप से जाँचा जाएगा कि संबंधित भूमि कहीं सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तो नहीं है। सरकार का मानना है कि इससे सरकारी ज़मीन पर फर्जी दावे, गलत जमाबंदी और अवैध कब्ज़े जैसे मामलों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने इस संबंध में सभी ज़िलाधिकारियों, अनुमंडल पदाधिकारियों और अंचल अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। नई व्यवस्था के तहत दाखिल-खारिज के हर आवेदन का मिलान बिहार भूमि पोर्टल पर उपलब्ध सरकारी ज़मीन के रिकॉर्ड से किया जाएगा। सत्यापन पूरा होने के बाद ही आवेदन को मंज़ूरी या अस्वीकृति दी जाएगी। सरकार का कहना है कि यह कदम सरकारी भूमि की सुरक्षा के साथ-साथ आम लोगों को भविष्य के ज़मीन विवादों से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
राजस्व विभाग का कहना है कि कई मामलों में यह पाया गया कि दाखिल-खारिज के दौरान सरकारी भूमि से जुड़े रिकॉर्ड का सही ढंग से सत्यापन नहीं किया जा रहा था। इसके कारण कुछ जगहों पर सरकारी ज़मीन पर भी जमाबंदी कायम होने की आशंका बनी हुई थी। इसी को देखते हुए विभाग ने ऑनलाइन रिकॉर्ड और सरकारी भूमि के आँकड़ों के आधार पर ऐसी संभावित जमाबंदियों की सूची तैयार की है, जिनमें सरकारी भूमि शामिल होने का संदेह है। यह सूची अंचल अधिकारियों के लॉगिन पर उपलब्ध करा दी गई है ताकि जाँच प्रक्रिया और अधिक प्रभावी बनाई जा सके।
सरकार ने विकास परियोजनाओं के लिए सरकारी ज़मीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को भी आसान बनाया है। नए नियमों के तहत अब ज़िलाधिकारी (DM) 10 एकड़ तक सरकारी या गैरमजरूआ आम भूमि का निःशुल्क हस्तांतरण कर सकेंगे। वहीं 10 से 20 एकड़ तक भूमि हस्तांतरण का अधिकार प्रमंडलीय आयुक्त को दिया गया है। यदि ज़मीन का क्षेत्रफल 20 एकड़ से अधिक होगा, तो उसके लिए राज्य मंत्रिमंडल की मंज़ूरी आवश्यक होगी। सरकार का मानना है कि इससे स्कूल, अस्पताल, सड़क और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए ज़मीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज़ होगी।
दाखिल-खारिज वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से ज़मीन की रजिस्ट्री होने के बाद सरकारी रिकॉर्ड में नए मालिक का नाम दर्ज किया जाता है और पुराने मालिक का नाम हटाया जाता है।
दाखिल-खारिज नहीं होने पर सरकारी रिकॉर्ड में नए मालिक का नाम दर्ज नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में मालगुज़ारी जमा करने, बैंक से ऋण लेने, ज़मीन बेचने या स्वामित्व साबित करने में परेशानी आ सकती है। इसके अलावा भविष्य में भूमि विवाद की आशंका भी बढ़ जाती है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अनुसार, यह बदलाव वर्ष 2014 में बने नियमों में संशोधन के तहत किया गया है। सरकार को उम्मीद है कि नई व्यवस्था से सरकारी ज़मीन की हेराफेरी पर अंकुश लगेगा, फर्जी दावों पर रोक लगेगी और ज़मीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही विकास परियोजनाओं के लिए भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी पहले की तुलना में अधिक तेज़ और आसान हो सकेगी।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने इस संबंध में सभी ज़िलाधिकारियों, अनुमंडल पदाधिकारियों और अंचल अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। नई व्यवस्था के तहत दाखिल-खारिज के हर आवेदन का मिलान बिहार भूमि पोर्टल पर उपलब्ध सरकारी ज़मीन के रिकॉर्ड से किया जाएगा। सत्यापन पूरा होने के बाद ही आवेदन को मंज़ूरी या अस्वीकृति दी जाएगी। सरकार का कहना है कि यह कदम सरकारी भूमि की सुरक्षा के साथ-साथ आम लोगों को भविष्य के ज़मीन विवादों से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।