महिला किसानों के लिए बकरी पालन बनेगा कमाई का बड़ा ज़रिया? विशेषज्ञों ने बताया क्या करना होगा बदलाव
Gaon Connection | Jun 27, 2026, 17:42 IST
मथुरा में आयोजित महिलाओं के नेतृत्व वाले बकरी उद्यमों पर राष्ट्रीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने भारत के बकरी पालन क्षेत्र में वैज्ञानिक नवाचार, महिला नेतृत्व वाले उद्यमों और एकीकृत वैल्यू चेन विकसित करने पर ज़ोर दिया। बेहतर नस्ल, गुणवत्तापूर्ण चारा, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, वित्तीय सहायता और संगठित बाज़ार को किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण रोज़गार सृजित करने और महिला सशक्तिकरण के लिए अहम बताया गया।
महिला पशुपालकों की कमाई बढ़ाने के लिए तैयार हुआ नया रोडमैप
भारत में बकरी पालन को केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने वाले संगठित व्यवसाय के रूप में विकसित करने की ज़रूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैज्ञानिक तकनीक, बेहतर नस्ल, गुणवत्तापूर्ण चारा, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, वित्तीय सहायता और संगठित बाज़ार को एकीकृत वैल्यू चेन से जोड़ा जाए, तो विशेष रूप से महिला पशुपालकों की आय और आर्थिक भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। यह सुझाव मथुरा में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में सामने आए, जहाँ देशभर से आए वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, महिला किसानों और विकास क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने बकरी पालन क्षेत्र की संभावनाओं पर चर्चा की।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026 के अवसर पर आईसीएआर-केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी), मथुरा और हीफ़र इंटरनेशनल की सहयोगी संस्था पासिंग गिफ्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (पीजीपीएल) ने महिलाओं के नेतृत्व वाले बकरी उद्यमों पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इसमें छह राज्यों की महिला लघु पशुपालकों सहित 150 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला में वैज्ञानिक नवाचार, उद्यमिता, एकीकृत वैल्यू चेन, बाज़ार तक पहुँच और महिला नेतृत्व वाले बकरी उद्यमों को बढ़ावा देने के उपायों पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।
कार्यशाला का उद्घाटन उत्तर प्रदेश पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो अनुसंधान संस्थान (डुवासू) के कुलपति डॉ. अभिजीत मित्रा ने किया, जबकि अध्यक्षता आईसीएआर-सीआईआरजी के निदेशक डॉ. मनीष कुमार चाटली ने की। आईसीएआर के सहायक महानिदेशक (पशु विज्ञान) डॉ. पी. के. मिश्रा मुख्य अतिथि रहे। आईसीएआर के सहायक महानिदेशक (पशु उत्पादन एवं प्रजनन) डॉ. एच. के. नरूला और पीजीपीएल की कार्यकारी निदेशक रीना सोनी वर्चुअल माध्यम से शामिल हुईं। इसके अलावा हीफ़र इंटरनेशनल की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. चंचल भट्टाचार्य तथा निम्बकर एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट एवं महाराष्ट्र गोट एंड शीप रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट की निदेशक डॉ. चंदा निम्बकर ने भी भाग लिया। उद्घाटन सत्र में आईसीएआर-सीआईआरजी सक्सेस स्टोरीज़, सीआईआरजी एट अ ग्लांस और सीआईआरजी टेक्नोलॉजी इन्वेंटरी का विमोचन किया गया, जिनमें बकरी पालन से जुड़े शोध, तकनीकों और नवाचारों को प्रदर्शित किया गया।
विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक प्रजनन, पोषण, पशु स्वास्थ्य, चारा विकास, उद्यमिता, उत्पादक स्वामित्व वाले उद्यम, वैल्यू एडिशन, बाज़ार संपर्क और सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर बल देते हुए कहा कि बकरी पालन को परंपरागत आजीविका से आगे बढ़ाकर व्यावसायिक उद्यम बनाया जाना चाहिए। इसके लिए किसानों को गुणवत्तापूर्ण नस्ल, चारा, बीमा, वित्त और संगठित बाज़ार उपलब्ध कराने के साथ ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो उन्हें बड़े और उत्पादक झुंड विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करें। विशेषज्ञों ने पोल्ट्री क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि एकीकृत वैल्यू चेन ने वहाँ किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है और यही मॉडल बकरी पालन में भी अपनाया जा सकता है।
कार्यशाला में कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) और विकास साझेदारी पर विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसका नेतृत्व पासिंग गिफ्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के एसोसिएट डायरेक्टर (बिज़नेस डेवलपमेंट एंड पार्टनरशिप) नवाज़ आलम ने किया। इसमें उत्पादक स्वामित्व वाले उद्यमों, वैल्यू एडिशन, बाज़ार संपर्क और महिला नेतृत्व वाले बकरी उद्यमों में निवेश की संभावनाओं पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण 'वीमेन फ़ार्मर वॉइसेज़' सत्र रहा, जिसमें छह राज्यों की महिला पशुपालकों ने अपने अनुभव साझा किए और वित्त, बेहतर नस्ल, पशु चिकित्सा सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण चारे तथा संगठित बाज़ार तक पहुँच में आने वाली चुनौतियों को सामने रखा। साझेदार संस्थाओं से जुड़ी उत्कृष्ट महिला बकरी उद्यमियों को सम्मानित भी किया गया।
कार्यशाला के समापन पर शोध संस्थानों, सरकारी एजेंसियों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), नागरिक समाज संगठनों, विकास साझेदारों, वित्तीय संस्थानों, सीएसआर और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। प्रतिभागियों ने कहा कि वैज्ञानिक नवाचार और एकीकृत वैल्यू चेन के माध्यम से भारत के बकरी पालन क्षेत्र की पूरी आर्थिक क्षमता का उपयोग किया जा सकता है, जिससे किसानों की आय, ग्रामीण रोज़गार और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को गति मिलेगी। भारत में 14.8 करोड़ से अधिक बकरियाँ हैं और लगभग 3.3 करोड़ ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका के लिए बकरी पालन पर निर्भर हैं, इसलिए यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026 के अवसर पर आईसीएआर-केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी), मथुरा और हीफ़र इंटरनेशनल की सहयोगी संस्था पासिंग गिफ्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (पीजीपीएल) ने महिलाओं के नेतृत्व वाले बकरी उद्यमों पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इसमें छह राज्यों की महिला लघु पशुपालकों सहित 150 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला में वैज्ञानिक नवाचार, उद्यमिता, एकीकृत वैल्यू चेन, बाज़ार तक पहुँच और महिला नेतृत्व वाले बकरी उद्यमों को बढ़ावा देने के उपायों पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।
बकरी पालन को व्यावसायिक मॉडल बनाने पर ज़ोर
विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक प्रजनन, पोषण, पशु स्वास्थ्य, चारा विकास, उद्यमिता, उत्पादक स्वामित्व वाले उद्यम, वैल्यू एडिशन, बाज़ार संपर्क और सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर बल देते हुए कहा कि बकरी पालन को परंपरागत आजीविका से आगे बढ़ाकर व्यावसायिक उद्यम बनाया जाना चाहिए। इसके लिए किसानों को गुणवत्तापूर्ण नस्ल, चारा, बीमा, वित्त और संगठित बाज़ार उपलब्ध कराने के साथ ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो उन्हें बड़े और उत्पादक झुंड विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करें। विशेषज्ञों ने पोल्ट्री क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि एकीकृत वैल्यू चेन ने वहाँ किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है और यही मॉडल बकरी पालन में भी अपनाया जा सकता है।
महिला पशुपालकों ने रखीं चुनौतियाँ
कार्यशाला के समापन पर शोध संस्थानों, सरकारी एजेंसियों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), नागरिक समाज संगठनों, विकास साझेदारों, वित्तीय संस्थानों, सीएसआर और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। प्रतिभागियों ने कहा कि वैज्ञानिक नवाचार और एकीकृत वैल्यू चेन के माध्यम से भारत के बकरी पालन क्षेत्र की पूरी आर्थिक क्षमता का उपयोग किया जा सकता है, जिससे किसानों की आय, ग्रामीण रोज़गार और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को गति मिलेगी। भारत में 14.8 करोड़ से अधिक बकरियाँ हैं और लगभग 3.3 करोड़ ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका के लिए बकरी पालन पर निर्भर हैं, इसलिए यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।