2025-26 के दौरान देश में जांचे गए दूध और डेयरी उत्पादों के 37% नमूने हुए फेल, सरकार ने संसद में दी जानकारी
Gaon Connection | Jul 25, 2026, 17:18 IST
देश में दूध और डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल उठा है। जांच में लगभग 37.3 फीसदी नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे। सरकार ने मिलावट खोरों के खिलाफ 11 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए। पिछले साल की तुलना में इस बार अधिक नमूनों में गड़बड़ी पाई गई।सरकार छोटे पशुपालकों को सहकारी समितियों से जोड़ने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
दूध और डेयरी उत्पादों के 37% नमूने हुए फेल
देश के हर घर में रोज़ सुबह पहुँचने वाले दूध और उससे बने उत्पादों की शुद्धता पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा देशभर में चलाए गए विशेष जांच अभियान के आंकड़ों ने उपभोक्ताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से जांचे गए कुल 39,351 दूध और डेयरी उत्पादों के नमूनों में से 14,668 नमूने गुणवत्ता के तय मानकों पर पूरी तरह फेल पाए गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि बाजार में बिकने वाला लगभग 37.3 % दूध और डेयरी सामान मिलावटी या मानक से कम गुणवत्ता का था।
यह चौंकाने वाली जानकारी केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में साझा की। उन्होंने एफएसएसएआई और राज्य खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा चलाए गए राष्ट्रव्यापी सर्वे के शुरुआती नतीजे सदन के सामने रखे।
खाद्य सुरक्षा के नियमों को ताक पर रखकर घटिया और असुरक्षित दूध बेचने वाले कारोबारियों के खिलाफ केंद्र और राज्य सरकारों ने कड़ा रुख अपनाया है। मानकों का उल्लंघन करने वाले डेयरियों और विक्रेताओं पर 10,714 सिविल केस और 1,054 क्पराधिक मामले दर्ज किए गए। अदालती सुनवाई के बाद 9,783 सिविल मामलों और 204 आपराधिक मामलों में आरोपियों को दोषी ठहराया गया। सिविल मुकदमों में दोषी पाए गए कारोबारियों पर कुल 34.37 करोड़ रुपये और आपराधिक मामलों में 34.51 लाख रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया गया। सरकार ने यह भी साफ किया है कि ये आंकड़े अभी शुरुआती हैं, क्योंकि कई नमूनों की दोबारा प्रयोगशाला जांच, अपील और न्यायिक प्रक्रियाएं अभी लंबित हैं।
संसदीय रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल की तुलना में इस बार न केवल जांचे गए नमूनों की संख्या बढ़ी है, बल्कि मानकों पर फेल होने वाले सैंपलों का ग्राफ भी ऊपर गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में एफएसएसआई ने 33,405 नमूनों का परीक्षण किया था, जिनमें से 12,780 (लगभग 38.2%) नमूने खराब मिले थे और 12,057 कानूनी मामले दर्ज हुए थे। हालांकि इस साल जाँच की रफ्तार तेज़ हुई है, लेकिन बाजारों में बिक रहे दूध की शुद्धता में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है।
संसद में पेश रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि भारत लगातार दुनिया में सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना हुआ है। बीते एक दशक में देश का दूध उत्पादन 14.6 करोड़ टन (2014-15) से 69% की ज़ोरदार बढ़त के साथ 24.8 करोड़ टन (2024-25) तक पहुँच गया है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उत्पादित दूध का एक बड़ा हिस्सा आज भी किसी सरकारी या वैज्ञानिक जाँच व्यवस्था के दायरे में नहीं आता। देश में पैदा होने वाले कुल दूध का लगभग 37 % हिस्सा पशुपालक किसान और उनके परिवार खुद इस्तेमाल करते हैं। बाकी बचा 63 % दूध बाजार में सप्लाई होता है। केवल 32 प्रतिशत दूध ही संगठित क्षेत्र के जरिए प्रोसेस और पैक होकर बिकता है।
केंद्रीय मंत्रालय का मानना है कि असंगठित क्षेत्र में गुणवत्ता जांचने की आधुनिक लैब और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी ही मिलावट की मुख्य वजह है। इसे रोकने के लिए सरकार का पूरा ध्यान अब ज्यादा से ज्यादा छोटे पशुपालकों और दुग्ध उत्पादकों को 'डेयरी सहकारी समितियों' और संगठित नेटवर्क से जोड़ने पर है। इससे ग्रामीण किसानों को दूध के सही दाम मिलेंगे और आम लोगों को जांचा-परखा, शुद्ध और सुरक्षित दूध मिल सकेगा।
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से जांचे गए कुल 39,351 दूध और डेयरी उत्पादों के नमूनों में से 14,668 नमूने गुणवत्ता के तय मानकों पर पूरी तरह फेल पाए गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि बाजार में बिकने वाला लगभग 37.3 % दूध और डेयरी सामान मिलावटी या मानक से कम गुणवत्ता का था।
यह चौंकाने वाली जानकारी केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में साझा की। उन्होंने एफएसएसएआई और राज्य खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा चलाए गए राष्ट्रव्यापी सर्वे के शुरुआती नतीजे सदन के सामने रखे।
11 हजार से ज्यादा दर्ज हुए केस
पिछले साल के मुकाबले इस बार ज्यादा नमूनों में मिली गड़बड़ी
भारत बना नंबर-1 उत्पादक
केंद्रीय मंत्रालय का मानना है कि असंगठित क्षेत्र में गुणवत्ता जांचने की आधुनिक लैब और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी ही मिलावट की मुख्य वजह है। इसे रोकने के लिए सरकार का पूरा ध्यान अब ज्यादा से ज्यादा छोटे पशुपालकों और दुग्ध उत्पादकों को 'डेयरी सहकारी समितियों' और संगठित नेटवर्क से जोड़ने पर है। इससे ग्रामीण किसानों को दूध के सही दाम मिलेंगे और आम लोगों को जांचा-परखा, शुद्ध और सुरक्षित दूध मिल सकेगा।