मिज़ोरम में रबर मिशन का दूसरा चरण शुरू: 11.92 लाख पौधों से बदलेगी खेती की तस्वीर
Lata Mishra | Jul 18, 2026, 15:28 IST
मिज़ोरम सरकार का चीफ मिनिस्टर रबर मिशन फिर चर्चा में है। दूसरे चरण में 2,649 हेक्टेयर में नए रबर बाग़, 2,580 किसान और 11.92 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य है। सरकार रबर पर ज़ोर क्यों दे रही है, झूम खेती से क्या संबंध है, किसानों को क्या लाभ होगा, यह सब जानिए।
खेती योग्य ज़मीन सीमित है, आबादी बढ़ी है और झूम का चक्र छोटा हो गया है। इसका असर मिट्टी, जंगल और किसानों की आमदनी—तीनों पर पड़ रहा है।
मिज़ोरम में इन दिनों 11.92 लाख रबर के पौधे लगाने की तैयारी चल रही है। 2,580 किसानों को इस अभियान से जोड़ा जाएगा और 2,649 हेक्टेयर में नए रबर बाग़ विकसित किए जाएँगे। सवाल यह है कि आख़िर एक पहाड़ी राज्य अचानक रबर की खेती पर इतना ज़ोर क्यों दे रहा है? क्या यह सिर्फ़ एक सरकारी योजना है, या फिर खेती की एक ऐसी नई सोच, जो आने वाले वर्षों में किसानों की ज़िंदगी बदल सकती है? दरअसल, इसकी शुरुआत आज से नहीं, बल्कि उस चुनौती से हुई थी जिससे मिज़ोरम दशकों से जूझ रहा है।
मिज़ोरम की सबसे बड़ी कृषि चुनौती क्या है?
भारत के ज़्यादातर राज्यों में किसान हर मौसम में नई फसल बोते हैं। लेकिन मिज़ोरम के पहाड़ी इलाक़ों में खेती का तरीका अलग है।यहाँ वर्षों से झूम खेती की परंपरा चली आ रही है। इसमें किसान किसी पहाड़ी ढलान पर पेड़-पौधों को साफ़ कर कुछ वर्षों तक खेती करते हैं। जब ज़मीन की उपज कम होने लगती है, तो वे दूसरी जगह जाकर खेती शुरू कर देते हैं और पुरानी ज़मीन को कुछ वर्षों के लिए छोड़ देते हैं, ताकि वह फिर से उपजाऊ बन सके।
पहले जब आबादी कम थी, तब यह तरीका टिकाऊ माना जाता था क्योंकि ज़मीन को दोबारा तैयार होने के लिए काफ़ी समय मिल जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। खेती योग्य ज़मीन सीमित है, आबादी बढ़ी है और झूम का चक्र छोटा हो गया है। इसका असर मिट्टी, जंगल और किसानों की आमदनी—तीनों पर पड़ रहा है। यहीं से सरकार ने विकल्प तलाशना शुरू किया।
फिर रबर की खेती ही क्यों?
सरकार को ऐसी फसल चाहिए थी जो-
क्या है Chief Minister's Rubber Mission?
इसी सोच के साथ 2024 में मिज़ोरम सरकार ने Chief Minister's Rubber Mission (CMRM) शुरू किया। इस मिशन का लक्ष्य अगले पाँच वर्षों में 11,500 हेक्टेयर क्षेत्र में रबर की खेती का विस्तार करना है। योजना में राज्य सरकार के साथ रबर बोर्ड ऑफ़ इंडिया भी तकनीकी सहयोग दे रहा है। सरकार का दावा है कि इससे किसानों को स्थायी नक़दी फसल मिलेगी और राज्य में प्राकृतिक रबर उत्पादन भी बढ़ेगा।
अब यह योजना फिर चर्चा में क्यों है?
क्योंकि सरकार ने मिशन के दूसरे चरण (Phase-II) की शुरुआत कर दी है। इस चरण में-
पहले चरण में सरकार ने किसानों को रबर की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, पौधे उपलब्ध कराए और तकनीकी सहायता दी। अब तक पहले चरण में किसी बड़े घोटाले या अनियमितता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। हालाँकि सरकार ने यह महसूस किया कि केवल पौधे लगाने से किसानों की आय नहीं बढ़ेगी। अगर किसान कच्चा लेटेक्स बेचेंगे, तो उन्हें सीमित दाम मिलेंगे। लेकिन अगर वे रबर शीट या दूसरे उत्पाद तैयार करेंगे, तो कमाई बढ़ सकती है। इसीलिए दूसरे चरण में वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है।
किसानों को क्या मिलेगा?
रबर की खेती में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कमाई शुरू होने में कई साल लगते हैं। इसीलिए सरकार किसानों को शुरुआती दौर में सहायता दे रही है। योजना के तहत-
मिज़ोरम सरकार का कहना है कि राज्य में लगभग 50,000 हेक्टेयर भूमि रबर की खेती के लिए उपयुक्त है। फिलहाल केवल करीब 7,000 हेक्टेयर में ही रबर उगाया जा रहा है। अगर यह मिशन सफल रहता है, तो इससे-
मिज़ोरम की सबसे बड़ी कृषि चुनौती क्या है?
भारत के ज़्यादातर राज्यों में किसान हर मौसम में नई फसल बोते हैं। लेकिन मिज़ोरम के पहाड़ी इलाक़ों में खेती का तरीका अलग है।यहाँ वर्षों से झूम खेती की परंपरा चली आ रही है। इसमें किसान किसी पहाड़ी ढलान पर पेड़-पौधों को साफ़ कर कुछ वर्षों तक खेती करते हैं। जब ज़मीन की उपज कम होने लगती है, तो वे दूसरी जगह जाकर खेती शुरू कर देते हैं और पुरानी ज़मीन को कुछ वर्षों के लिए छोड़ देते हैं, ताकि वह फिर से उपजाऊ बन सके।
पहले जब आबादी कम थी, तब यह तरीका टिकाऊ माना जाता था क्योंकि ज़मीन को दोबारा तैयार होने के लिए काफ़ी समय मिल जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। खेती योग्य ज़मीन सीमित है, आबादी बढ़ी है और झूम का चक्र छोटा हो गया है। इसका असर मिट्टी, जंगल और किसानों की आमदनी—तीनों पर पड़ रहा है। यहीं से सरकार ने विकल्प तलाशना शुरू किया।
फिर रबर की खेती ही क्यों?
सरकार को ऐसी फसल चाहिए थी जो-
- पहाड़ी इलाक़ों में उग सके
- बार-बार बुवाई की ज़रूरत न पड़े
- और किसानों को कई वर्षों तक नियमित आय देती रहे।
क्या है Chief Minister's Rubber Mission?
इसी सोच के साथ 2024 में मिज़ोरम सरकार ने Chief Minister's Rubber Mission (CMRM) शुरू किया। इस मिशन का लक्ष्य अगले पाँच वर्षों में 11,500 हेक्टेयर क्षेत्र में रबर की खेती का विस्तार करना है। योजना में राज्य सरकार के साथ रबर बोर्ड ऑफ़ इंडिया भी तकनीकी सहयोग दे रहा है। सरकार का दावा है कि इससे किसानों को स्थायी नक़दी फसल मिलेगी और राज्य में प्राकृतिक रबर उत्पादन भी बढ़ेगा।
अब यह योजना फिर चर्चा में क्यों है?
क्योंकि सरकार ने मिशन के दूसरे चरण (Phase-II) की शुरुआत कर दी है। इस चरण में-
- 2,649 हेक्टेयर में नए रबर बाग़ लगाए जाएँगे।
- 8 जिलों के 117 क्लस्टरों को शामिल किया गया है।
- करीब 2,580 किसान इस योजना से जुड़ेंगे।
- लगभग 11.92 लाख प्रमाणित रबर पौधे लगाए जाएँगे।
पहले चरण में सरकार ने किसानों को रबर की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, पौधे उपलब्ध कराए और तकनीकी सहायता दी। अब तक पहले चरण में किसी बड़े घोटाले या अनियमितता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। हालाँकि सरकार ने यह महसूस किया कि केवल पौधे लगाने से किसानों की आय नहीं बढ़ेगी। अगर किसान कच्चा लेटेक्स बेचेंगे, तो उन्हें सीमित दाम मिलेंगे। लेकिन अगर वे रबर शीट या दूसरे उत्पाद तैयार करेंगे, तो कमाई बढ़ सकती है। इसीलिए दूसरे चरण में वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है।
किसानों को क्या मिलेगा?
रबर की खेती में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कमाई शुरू होने में कई साल लगते हैं। इसीलिए सरकार किसानों को शुरुआती दौर में सहायता दे रही है। योजना के तहत-
- मुफ़्त रबर पौधे
- उर्वरक
- पौध संरक्षण सामग्री
- खराब पौधों की दोबारा रोपाई
- डीबीटी के माध्यम से आर्थिक सहायता
- बाड़बंदी और रखरखाव
- और 100 रबर शीट प्रोसेसिंग मशीनों पर सब्सिडी दी जाएगीइसका मक़सद है कि किसान केवल कच्चा रबर न बेचें, बल्कि उसे प्रोसेस करके बेहतर दाम हासिल करें।
मिज़ोरम सरकार का कहना है कि राज्य में लगभग 50,000 हेक्टेयर भूमि रबर की खेती के लिए उपयुक्त है। फिलहाल केवल करीब 7,000 हेक्टेयर में ही रबर उगाया जा रहा है। अगर यह मिशन सफल रहता है, तो इससे-
- झूम खेती पर निर्भरता कम हो सकती है
- किसानों को लंबी अवधि की नियमित आय मिल सकती है
- रबर आधारित उद्योग विकसित हो सकते हैं
- ग्रामीण इलाक़ों में रोज़गार बढ़ सकता है
- और पूर्वोत्तर भारत प्राकृतिक रबर उत्पादन का बड़ा केंद्र बन सकता है।