मानसून अभी नहीं लेगा विदाई! IMD ने बताया क्यों सितंबर में भी जारी रह सकती है बारिश
Gaon Connection | Sept 02, 2026, 16:20 IST
सितंबर शुरू होने के बावजूद दक्षिण-पश्चिम मानसून की जल्द विदाई के संकेत नहीं हैं। IMD के मुताबिक, उत्तर और मध्य भारत में कई मौसम प्रणालियाँ सक्रिय हैं, जिनसे आने वाले दिनों में बारिश जारी रह सकती है। उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश का निम्न दबाव क्षेत्र कमजोर होने के बाद मानसून की दिशा तय करने में अहम होगा। ECMWF के अनुमान के अनुसार, गुजरात, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी तट और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में 12 सितंबर तक मानसून सक्रिय रह सकता है। सामान्य वापसी की तारीख 17 सितंबर है।
आ12 सितंबर तक कई राज्यों में बारिश का अनुमान
सितंबर शुरू हो चुका है, लेकिन दक्षिण-पश्चिम मानसून के जल्द विदा होने के संकेत फिलहाल साफ़ नहीं दिख रहे हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताज़ा आकलन के मुताबिक, उत्तर और मध्य भारत में बना मौसमी सिस्टम अभी बारिश के लिए अनुकूल माहौल बनाए हुए है। ऐसे में मानसून की अचानक वापसी के बजाय आने वाले दिनों में अलग-अलग इलाकों में बारिश के कुछ और दौर देखने को मिल सकते हैं। यूरोपीय मध्यम-अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (ECMWF) के अनुमान के मुताबिक, गुजरात, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, आसपास के पश्चिमी तट और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में 12 सितंबर तक मानसून सक्रिय रह सकता है।
IMD के मुताबिक, बुधवार को उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश के ऊपर एक स्पष्ट निम्न दबाव क्षेत्र बना हुआ था। इसके बुधवार शाम तक कमजोर होने और गुरुवार को पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में दक्षिणी उत्तर प्रदेश और उत्तरी मध्य प्रदेश की ओर बढ़ने का अनुमान था। हालांकि, इस सिस्टम के कमजोर होने का मतलब यह नहीं है कि मानसून भी कमजोर पड़ जाएगा। उत्तर भारत के ऊपर मानसूनी द्रोणी अभी सक्रिय है और अरब सागर से भी नमी मिल रही है। ऐसे में मानसून की वापसी धीरे-धीरे और अलग-अलग इलाकों से हो सकती है। सामान्य तौर पर मानसून की वापसी की शुरुआत की तारीख 17 सितंबर मानी जाती है।
IMD के अनुसार, एक व्यापक मानसूनी द्रोणी भटिंडा और रोहतक से होते हुए हरदोई और कानपुर तक फैली हुई है। इसके बाद यह मध्य भारत में बने निम्न दबाव क्षेत्र से होते हुए दीघा और फिर दक्षिण-पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी के मध्य हिस्से तक जा रही है। मानसूनी द्रोणी बारिश के लिए नमी पहुँचाने वाली प्रमुख मौसम प्रणाली है।
इसके अलावा, उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बांग्लादेश तक एक दूसरी द्रोणी भी बनी हुई है, जो निम्न दबाव क्षेत्र, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजर रही है। उत्तर-पूर्वी अरब सागर और उससे लगे सौराष्ट्र के ऊपर ऊपरी वायुमंडल में चक्रवाती परिसंचरण भी बना हुआ है। इससे दक्षिण गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश तक फैली एक द्रोणी जुड़ी है, जो अरब सागर की नमी को मध्य भारत तक पहुँचा रही है। इस बीच, पाकिस्तान की ओर से एक पश्चिमी विक्षोभ भी पश्चिमी गुजरात की ओर बढ़ रहा है। इन सभी मौसम प्रणालियों के कारण मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से में बारिश के लिए पर्याप्त नमी और ऊपर उठती हवा का माहौल बना हुआ है।
मौसम विभाग के मुताबिक, आने वाले दिनों में सबसे अहम सवाल यह होगा कि मध्य प्रदेश के ऊपर बना निम्न दबाव क्षेत्र कमजोर होने के बाद मानसूनी द्रोणी किस दिशा में जाती है। अगर द्रोणी दक्षिण-पूर्व की ओर खिसकती है और राजस्थान तथा उत्तर-पश्चिम भारत में शुष्क महाद्वीपीय हवा का असर बढ़ने लगता है, तो मानसून की वापसी तेज़ हो सकती है।
लेकिन अगर द्रोणी उत्तर भारत के ऊपर बनी रहती है या बंगाल की खाड़ी में एक नया निम्न दबाव क्षेत्र बन जाता है, तो मानसून की वापसी में और देरी हो सकती है। IMD के मॉडल अनुमान के मुताबिक, मौजूदा निम्न दबाव क्षेत्र कमजोर होने के बाद पश्चिमी हवाओं के असर से विपरीत दिशा में बढ़ सकता है और अंत में ओडिशा-पश्चिम बंगाल तट के पास पहुँच सकता है। इसी दौरान पश्चिमी विक्षोभ दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान के ऊपर खुद एक निम्न दबाव क्षेत्र में बदल सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह उस मौसमी उच्च दबाव वाले सिस्टम की जगह ले सकता है, जो आमतौर पर मानसून की वापसी के समय बनता है। ऐसे हालात में मानसून की जल्दी विदाई की संभावना कम हो सकती है।
अब मौसम वैज्ञानिकों की नज़र खास तौर पर उत्तर-पश्चिम भारत पर रहेगी। मध्य प्रदेश का सिस्टम कमजोर होने के बाद अगर मानसूनी द्रोणी दक्षिण-पूर्व की ओर खिसकती है, तो मानसून की वापसी के संकेत मिलने शुरू हो सकते हैं। लेकिन अगर द्रोणी उत्तर भारत में ही बनी रहती है या बंगाल की खाड़ी में नया निम्न दबाव क्षेत्र बनता है, तो बारिश का दौर आगे भी जारी रह सकता है।
अरब सागर की ओर बने ऊपरी वायुमंडलीय चक्रवाती परिसंचरण की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। अगर यह पश्चिम और मध्य भारत की ओर नमी पहुँचाता रहता है, तो सितंबर आगे बढ़ने के बावजूद कई इलाकों में बारिश जारी रह सकती है। मानसून की वापसी का सबसे साफ़ संकेत तब मिलेगा, जब राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और आसपास के इलाकों में शुष्क महाद्वीपीय हवा और उच्च दबाव का क्षेत्र बन जाए और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश लंबे समय तक काफी कम हो जाए। मौसम विभाग के मुताबिक, सिर्फ कुछ दिनों के लिए बारिश रुक जाना मानसून की वापसी का पक्का संकेत नहीं माना जाएगा।
IMD के मुताबिक, बुधवार को उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश के ऊपर एक स्पष्ट निम्न दबाव क्षेत्र बना हुआ था। इसके बुधवार शाम तक कमजोर होने और गुरुवार को पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में दक्षिणी उत्तर प्रदेश और उत्तरी मध्य प्रदेश की ओर बढ़ने का अनुमान था। हालांकि, इस सिस्टम के कमजोर होने का मतलब यह नहीं है कि मानसून भी कमजोर पड़ जाएगा। उत्तर भारत के ऊपर मानसूनी द्रोणी अभी सक्रिय है और अरब सागर से भी नमी मिल रही है। ऐसे में मानसून की वापसी धीरे-धीरे और अलग-अलग इलाकों से हो सकती है। सामान्य तौर पर मानसून की वापसी की शुरुआत की तारीख 17 सितंबर मानी जाती है।
उत्तर भारत से मध्य और पूर्वी भारत तक बारिश के लिए बना माहौल
इसके अलावा, उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बांग्लादेश तक एक दूसरी द्रोणी भी बनी हुई है, जो निम्न दबाव क्षेत्र, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजर रही है। उत्तर-पूर्वी अरब सागर और उससे लगे सौराष्ट्र के ऊपर ऊपरी वायुमंडल में चक्रवाती परिसंचरण भी बना हुआ है। इससे दक्षिण गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश तक फैली एक द्रोणी जुड़ी है, जो अरब सागर की नमी को मध्य भारत तक पहुँचा रही है। इस बीच, पाकिस्तान की ओर से एक पश्चिमी विक्षोभ भी पश्चिमी गुजरात की ओर बढ़ रहा है। इन सभी मौसम प्रणालियों के कारण मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से में बारिश के लिए पर्याप्त नमी और ऊपर उठती हवा का माहौल बना हुआ है।
मध्य प्रदेश का निम्न दबाव कमजोर हुआ तो बदल सकता है मानसून का रुख
लेकिन अगर द्रोणी उत्तर भारत के ऊपर बनी रहती है या बंगाल की खाड़ी में एक नया निम्न दबाव क्षेत्र बन जाता है, तो मानसून की वापसी में और देरी हो सकती है। IMD के मॉडल अनुमान के मुताबिक, मौजूदा निम्न दबाव क्षेत्र कमजोर होने के बाद पश्चिमी हवाओं के असर से विपरीत दिशा में बढ़ सकता है और अंत में ओडिशा-पश्चिम बंगाल तट के पास पहुँच सकता है। इसी दौरान पश्चिमी विक्षोभ दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान के ऊपर खुद एक निम्न दबाव क्षेत्र में बदल सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह उस मौसमी उच्च दबाव वाले सिस्टम की जगह ले सकता है, जो आमतौर पर मानसून की वापसी के समय बनता है। ऐसे हालात में मानसून की जल्दी विदाई की संभावना कम हो सकती है।
राजस्थान और उत्तर-पश्चिम भारत में इन संकेतों पर रहेगी नज़र
अरब सागर की ओर बने ऊपरी वायुमंडलीय चक्रवाती परिसंचरण की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। अगर यह पश्चिम और मध्य भारत की ओर नमी पहुँचाता रहता है, तो सितंबर आगे बढ़ने के बावजूद कई इलाकों में बारिश जारी रह सकती है। मानसून की वापसी का सबसे साफ़ संकेत तब मिलेगा, जब राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और आसपास के इलाकों में शुष्क महाद्वीपीय हवा और उच्च दबाव का क्षेत्र बन जाए और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश लंबे समय तक काफी कम हो जाए। मौसम विभाग के मुताबिक, सिर्फ कुछ दिनों के लिए बारिश रुक जाना मानसून की वापसी का पक्का संकेत नहीं माना जाएगा।