मानसून का बदला मिज़ाज बढ़ा रहा चिंता! कभी सूखा तो कभी मूसलाधार बारिश से खेती, महँगाई और बिजली पर पड़ सकता है बड़ा असर
Gaon Connection | Jul 20, 2026, 11:36 IST
भारत में इस वर्ष मानसून बेहद अस्थिर बना हुआ है। जून में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि जुलाई की शुरुआत में कई क्षेत्रों में भारी वर्षा दर्ज की गई। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो और वैश्विक तापमान वृद्धि इसके प्रमुख कारण हैं। बदलते मानसून का असर खरीफ़ फसलों, किसानों की आय, खाद्य महँगाई और बिजली की मांग पर पड़ने की आशंका है। मौसम के इस बदले स्वरूप ने मानसून के पूर्वानुमान को भी पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
भारत में बदल रहा है मानसून का पैटर्न
भारत में इस वर्ष मानसून का मिज़ाज लगातार बदल रहा है। कहीं लंबे समय तक बारिश नहीं हो रही, तो कहीं कुछ ही दिनों में पूरे महीने जितनी वर्षा दर्ज हो रही है। मौसम का यह असंतुलित पैटर्न खरीफ़ फसलों की बुआई, सिंचाई और उत्पादन पर असर डालने लगा है। बारिश के लंबे अंतराल के बाद अचानक होने वाली भारी वर्षा से खेतों में जलभराव की स्थिति बन रही है, जबकि लगातार शुष्क दौर फसलों की बढ़वार को प्रभावित कर रहा है। दूसरी ओर, उमस और बढ़ते तापमान के कारण बिजली की मांग भी तेज़ी से बढ़ रही है, जिससे कृषि और ऊर्जा दोनों क्षेत्रों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अल नीनो और वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि ने भारत के मानसून के स्वरूप को पहले की तुलना में कहीं अधिक अस्थिर बना दिया है। इस वर्ष मानसून की शुरुआत रिकॉर्ड के पाँचवें सबसे शुष्क जून के साथ हुई, जब देशभर में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इसके बाद जुलाई की शुरुआत में अचानक हालात बदल गए और मुंबई जैसे शहरों में महज़ एक सप्ताह के भीतर लगभग पूरे महीने के बराबर वर्षा हो गई। इसके बाद मानसून फिर धीमा पड़ गया और 19 जुलाई तक देशभर में सामान्य से लगभग 24 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई।
पहले मानसून के दौरान वर्षा अपेक्षाकृत समान रूप से होती थी, जिससे किसानों ने वर्षों के अनुभव के आधार पर फसल चक्र और बुआई का कैलेंडर तैयार किया था। अब यह संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि और अल नीनो के संयुक्त प्रभाव से वातावरण पहले बड़ी मात्रा में नमी सोख लेता है और फिर उसे सीमित क्षेत्रों में अचानक अत्यधिक बारिश के रूप में छोड़ देता है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि अब भी वर्षा आधारित सिंचाई पर निर्भर है। ऐसे में लंबे शुष्क दौर और अचानक होने वाली तेज़ बारिश खरीफ़ फसलों की बुआई को प्रभावित कर रही है। इसका असर किसानों की आमदनी के साथ-साथ खाद्यान्न उत्पादन और खाद्य महँगाई पर भी पड़ सकता है।
इस बार मानसून सामान्य मार्ग पर आगे बढ़ने के बजाय बार-बार रुक रहा है और दिशा बदल रहा है। समुद्र तल से लगभग 20,000 से 25,000 फ़ीट की ऊँचाई पर बनने वाले वायुमंडलीय अवरोध मानसूनी तंत्र को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। इसके कारण कई क्षेत्रों में बारिश की लंबी कमी बनी हुई है, जबकि कुछ इलाक़ों में कम समय में अत्यधिक वर्षा दर्ज की जा रही है। अल नीनो के प्रभाव से भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर हवा ऊपर उठने के बजाय नीचे की ओर दब रही है। इससे अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी के बावजूद वर्षा वाले बादल पूरी तरह विकसित नहीं हो पा रहे। नतीजतन बारिश कम हो रही है, लेकिन वातावरण में नमी बनी रहने से उमस और गर्मी दोनों बढ़ रही हैं। इसी वजह से एयर कंडीशनर और अन्य कूलिंग उपकरणों का उपयोग बढ़ने से बिजली की मांग में भी तेज़ इज़ाफ़ा देखा जा रहा है।
मौजूदा मौसम प्रणाली पहले की तुलना में कहीं अधिक अनिश्चित होती जा रही है, जिससे लंबे समय का सटीक पूर्वानुमान लगाना मुश्किल हो गया है। तापमान बढ़ने के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में अचानक मौसम की तीव्र घटनाएँ सामने आ रही हैं, जिससे यह तय करना कठिन हो गया है कि कब और कहाँ कितनी बारिश होगी। पिछले सप्ताह बेंगलुरु में जुलाई का 112 वर्षों का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया। वहीं भारत मौसम विभाग (IMD) ने कई क्षेत्रों में दिन का तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने की चेतावनी दी है। विभाग का अनुमान है कि पूरे मानसून सीज़न के दौरान कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 94 प्रतिशत रह सकती है, जबकि निजी मौसम एजेंसियों का आकलन है कि मानसून के दूसरे हिस्से में वर्षा की कमी और अधिक बढ़ सकती है। ऐसे में आने वाले सप्ताह कृषि उत्पादन, खाद्य महँगाई और बिजली की मांगतीनों के लिहाज़ से काफ़ी अहम माने जा रहे हैं।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अल नीनो और वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि ने भारत के मानसून के स्वरूप को पहले की तुलना में कहीं अधिक अस्थिर बना दिया है। इस वर्ष मानसून की शुरुआत रिकॉर्ड के पाँचवें सबसे शुष्क जून के साथ हुई, जब देशभर में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इसके बाद जुलाई की शुरुआत में अचानक हालात बदल गए और मुंबई जैसे शहरों में महज़ एक सप्ताह के भीतर लगभग पूरे महीने के बराबर वर्षा हो गई। इसके बाद मानसून फिर धीमा पड़ गया और 19 जुलाई तक देशभर में सामान्य से लगभग 24 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई।