देश में बारिश तेज़ हुई, फिर भी खेती वाले इलाक़ों में नहीं बरसे उतने बादल, खरीफ़ फसलों पर चिंता बरक़रार
Gaon Connection | Jul 10, 2026, 13:02 IST
देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के सक्रिय होने से कुल वर्षा घाटा घटकर 15 प्रतिशत रह गया है, लेकिन कई कृषि प्रधान ज़िलों में अब भी सामान्य से कम बारिश दर्ज की जा रही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई वर्षा आधारित क्षेत्रों में मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है। यदि आने वाले महीनों में बारिश का समान वितरण नहीं हुआ, तो खरीफ़ फसलों के उत्पादन, कृषि विकास और खाद्य महँगाई पर असर पड़ सकता है।
कम बारिश से खरीफ़ खेती पर संकट!
देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून ने जून की कमज़ोर शुरुआत के बाद जुलाई में तेज़ी पकड़ी है, जिससे कुल वर्षा घाटे में काफ़ी कमी आई है। हालाँकि बारिश के आँकड़ों में सुधार के बावजूद इसकी असमान भौगोलिक वितरण व्यवस्था कृषि क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। कई प्रमुख कृषि ज़िलों में अब भी सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे खरीफ़ फसलों की बुवाई और शुरुआती वृद्धि पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आँकड़ों के अनुसार, देश में कुल वर्षा घाटा जून के 38 प्रतिशत से घटकर 9 जुलाई तक 15 प्रतिशत रह गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कुल वर्षा के आँकड़े कृषि की वास्तविक स्थिति नहीं बताते। खेती के लिए यह ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि किस क्षेत्र में, कब और कितनी बारिश हुई। कई वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में अब भी मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है, जिससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
आईएमडी के अनुसार, 1 जून से 8 जुलाई के बीच निगरानी किए गए 738 ज़िलों में से 280 ज़िलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई, जबकि 97 ज़िलों में वर्षा की स्थिति अत्यधिक कम रही। इन प्रभावित ज़िलों में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रमुख कृषि राज्य शामिल हैं, जहाँ दालें, तिलहन, कपास, धान और मक्का जैसी खरीफ़ फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।
इनमें से कई क्षेत्रों की खेती वर्षा पर निर्भर है और सिंचाई की सुविधा सीमित है। ऐसे में समय पर पर्याप्त बारिश नहीं होने से मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है, जिससे फसलों की शुरुआती वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
'इकोनॉमिक टाइम्स' ने आर्थिक विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि हाल के दिनों में हुई बारिश से तत्काल राहत ज़रूर मिली है, लेकिन इससे सामान्य मानसून की गारंटी नहीं मानी जा सकती। यदि आने वाले दिनों में वर्षा का वितरण समान नहीं रहा, तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। वर्षा आधारित लगभग 100 कृषि ज़िलों में मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के सोयाबीन एवं कपास उत्पादक क्षेत्र तथा कर्नाटक और गुजरात के दाल और मूँगफली उत्पादक इलाक़े अब भी नमी की कमी का सामना कर रहे हैं।
उनका कहना है कि यदि आगामी महीनों में वर्षा का वितरण संतुलित रहा, तो खरीफ़ फसलों की स्थिति में सुधार संभव है। लेकिन यदि असमान बारिश का सिलसिला जारी रहा, तो कृषि विकास की रफ़्तार धीमी पड़ सकती है और खाद्य महँगाई बढ़ने का जोखिम भी बना रहेगा।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आँकड़ों के अनुसार, देश में कुल वर्षा घाटा जून के 38 प्रतिशत से घटकर 9 जुलाई तक 15 प्रतिशत रह गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कुल वर्षा के आँकड़े कृषि की वास्तविक स्थिति नहीं बताते। खेती के लिए यह ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि किस क्षेत्र में, कब और कितनी बारिश हुई। कई वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में अब भी मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है, जिससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
कई कृषि ज़िलों में अब भी कम बारिश, खरीफ़ फसलों पर बढ़ी चिंता
इनमें से कई क्षेत्रों की खेती वर्षा पर निर्भर है और सिंचाई की सुविधा सीमित है। ऐसे में समय पर पर्याप्त बारिश नहीं होने से मिट्टी में नमी की कमी बनी हुई है, जिससे फसलों की शुरुआती वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों ने जताई उत्पादन और महँगाई को लेकर चिंता
उनका कहना है कि यदि आगामी महीनों में वर्षा का वितरण संतुलित रहा, तो खरीफ़ फसलों की स्थिति में सुधार संभव है। लेकिन यदि असमान बारिश का सिलसिला जारी रहा, तो कृषि विकास की रफ़्तार धीमी पड़ सकती है और खाद्य महँगाई बढ़ने का जोखिम भी बना रहेगा।