कमज़ोर मानसून से मूंग की बुवाई 11% घटी, ताज़ा बारिश से रक़बा बढ़ने की उम्मीद
Gaon Connection | Jul 22, 2026, 12:28 IST
कमज़ोर मानसून के कारण देश में मूंग की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में 11 प्रतिशत कम रही है। हालांकि हाल की बारिश से किसानों को राहत मिली है और बुवाई में तेज़ी आने की उम्मीद है। कम दाम मिलने के बावजूद कम लागत और कम अवधि में तैयार होने के कारण किसान मूंग की खेती जारी रखे हुए हैं।
कमज़ोर मानसून से सिमटा मूंग का रक़बा
खरीफ़ सीज़न में देश की प्रमुख दलहनी फ़सल मूंग की बुवाई इस बार कमज़ोर मानसून की मार झेल रही है। प्रमुख उत्पादक राज्यों में सामान्य से कम बारिश होने के कारण अब तक मूंग का रक़बा पिछले साल की तुलना में 11 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है। हालाँकि, लक्ष्य का 62 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पहले ही बोया जा चुका है और हाल के दिनों में हुई बारिश से किसानों की उम्मीदें फिर बढ़ गई हैं।
देश में मूंग एकमात्र ऐसी दलहनी फ़सल है, जिसमें भारत आत्मनिर्भरता हासिल करने का दावा करता है। इसके बावजूद किसानों को बाज़ार में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम मिल रहे हैं। फिर भी कम लागत, कम अवधि और सीमित विकल्पों के चलते किसान मूंग की खेती से दूरी नहीं बना पा रहे हैं। कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि मानसून का मौजूदा दौर जारी रहा तो मूंग की बुवाई पिछले वर्ष के स्तर तक पहुँच सकती है।
कृषि आँकड़ों के अनुसार, देश में अब तक मूंग की बुवाई निर्धारित लक्ष्य के 62 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में हो चुकी है। हालांकि राजस्थान, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में सामान्य से कम वर्षा के कारण कुल रक़बा पिछले वर्ष की तुलना में 11 प्रतिशत कम है। हाल में हुई बारिश से खेतों में नमी बढ़ी है, जिससे आने वाले दिनों में बुवाई तेज़ होने की संभावना है।
राजस्थान के डूडू क्षेत्र के किसान जगदीश चंद सौ ने बताया कि उन्होंने 27 जून को मूंग की बुवाई की थी और बारिश नहीं होने से फ़सल को लेकर चिंता बढ़ गई थी। सोमवार को हुई बारिश से फ़सल को राहत मिली है। उन्होंने कहा कि 55 बीघा ज़मीन में से 35 बीघा में मूंग बोई गई है। क्षेत्र में मूंग, बाजरा और ज्वार के अलावा किसानों के पास अधिक विकल्प नहीं हैं। उनका कहना है कि कृषि वैज्ञानिकों या सरकारी अधिकारियों की ओर से भी वैकल्पिक फ़सल की कोई ठोस सलाह नहीं मिली।
राजस्थान में पिछले खरीफ़ सीज़न के दौरान किसानों को मूंग का औसत भाव एमएसपी 8,768 रुपये प्रति क्विंटल से लगभग 26 प्रतिशत कम मिला। इसके बावजूद किसान इसकी खेती जारी रखे हुए हैं। इसकी बड़ी वजह कम उत्पादन लागत और 60 से 75 दिनों में तैयार होने वाली फ़सल है। एक बीघा में खेती पर लगभग 6,000 से 7,000 रुपये का ख़र्च आता है, जबकि मौजूदा बाज़ार भाव पर तीन क्विंटल तक उत्पादन बेचकर 18,000 से 20,000 रुपये की आय हो जाती है। यही कारण है कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में सीमित विकल्प होने के बावजूद किसान मूंग की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं।
देश में मूंग एकमात्र ऐसी दलहनी फ़सल है, जिसमें भारत आत्मनिर्भरता हासिल करने का दावा करता है। इसके बावजूद किसानों को बाज़ार में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम मिल रहे हैं। फिर भी कम लागत, कम अवधि और सीमित विकल्पों के चलते किसान मूंग की खेती से दूरी नहीं बना पा रहे हैं। कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि मानसून का मौजूदा दौर जारी रहा तो मूंग की बुवाई पिछले वर्ष के स्तर तक पहुँच सकती है।