Sugarcane Farming: गन्ना खेती में बढ़ेगा नैनो उर्वरकों का इस्तेमाल, किसानों को अनुदान पर मिलेंगे 15 हजार स्प्रेयर

Gaon Connection | Jun 05, 2026, 19:27 IST
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उत्तर प्रदेश में गन्ना खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। गन्ना विकास विभाग और इफको की तरफ से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाकर नैनो और जैव उर्वरकों के उपयोग पर जोर दिया गया। साथ ही किसानों को सस्ते स्प्रेयर, प्रदर्शन प्लॉट और वैज्ञानिक सलाह के जरिए नई तकनीकों से जोड़ने की योजना बनाई गई है।

गन्ना खेती में बढ़ेगा नैनो उर्वरकों का इस्तेमाल
गन्ना खेती में बढ़ेगा नैनो उर्वरकों का इस्तेमाल
गन्ने की खेती में बढ़ते खर्च और रासायनिक उर्वरकों के लगातार इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत पर पड़ रहे असर को देखते हुए उत्तर प्रदेश में किसानों को नई और बेहतर खेती तकनीकों से जोड़ने की कोशिश शुरू की गई है। इसी कड़ी में गन्ना विकास विभाग और इफको (IFFCO) ने एक ऑनलाइन कार्यशाला आयोजित की, जिसमें खेती को अधिक लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर चर्चा हुई।

कार्यशाला में किसानों को नैनो यूरिया, नैनो डीएपी और जैव उर्वरकों जैसे स्मार्ट विकल्पों के बारे में जानकारी दी गई। साथ ही अधिकारियों ने कहा कि अब जरूरत केवल ज्यादा उत्पादन की नहीं, बल्कि ऐसी खेती की है जो मिट्टी की ताकत बनाए रखे, लागत कम करे और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को भी सुरक्षित रखे। इसी उद्देश्य से किसानों को नई तकनीकों, प्रदर्शन प्लॉट और अनुदान पर स्प्रेयर जैसी सुविधाएं देने की योजना बनाई गई है।

रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने पर जोर

कार्यशाला में बताया गया कि लगातार बढ़ते रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। इसके अलावा पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है। इसी को देखते हुए किसानों को नैनो उर्वरक, जैव उर्वरक और अन्य वैज्ञानिक विकल्प अपनाने की सलाह दी गई।

केवल स्वीकृत खाद और दवाएं ही बेचें चीनी मिलें

कार्यशाला में अधिकारियों ने साफ कहा कि किसानों तक सिर्फ वही खाद और कीटनाशक पहुंचने चाहिए, जिन्हें सरकार और कृषि विशेषज्ञों ने मंजूरी दी है। किसी भी हालत में घटिया या बिना मंजूरी वाली दवाएं किसानों को न दी जाएं। ऐसा पाए जाने पर संबंधित संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।

नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के इस्तेमाल पर जोर

कार्यशाला में इफको के विशेषज्ञों ने नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, सागरिका, जैव उर्वरक और दूसरे आधुनिक उत्पादों के बारे में जानकारी दी। उनका कहना था कि ये उर्वरक कम मात्रा में इस्तेमाल होकर भी बेहतर परिणाम देते हैं और मिट्टी की सेहत पर भी कम असर डालते हैं।

क्योंकि नैनो यूरिया पौधों को जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, जिससे फसल की बढ़वार अच्छी होती है। वहीं नैनो डीएपी के इस्तेमाल से बीज जल्दी अंकुरित होते हैं, जड़ें मजबूत बनती हैं और पौधों का विकास बेहतर होता है।

हर चीनी मिल क्षेत्र में होंगे खेतों पर ट्रायल

नई तकनीक का फायदा किसानों तक पहुंचाने के लिए हर चीनी मिल क्षेत्र में स्मार्ट उर्वरकों के पांच-पांच प्रदर्शन प्लॉट लगाए जाएंगे। इन खेतों में किसानों को सीधे दिखाया जाएगा कि नए उर्वरकों से फसल पर क्या असर पड़ता है। फसल तैयार होने के बाद इन प्लॉटों पर किसान गोष्ठियां भी आयोजित की जाएंगी, ताकि किसान खुद नतीजे देख सकें और अपने अनुभव साझा कर सकें।

किसानों को आधी कीमत पर मिलेंगे स्प्रेयर

स्मार्ट उर्वरकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए किसानों को बड़ी राहत देने की भी घोषणा की गई है। प्रदेश की गन्ना समितियों के माध्यम से 5,000 पावर स्प्रेयर और 10,000 बैटरी स्प्रेयर 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराए जाएंगे। इससे किसानों को छिड़काव करने में आसानी होगी, मजदूरी का खर्च कम होगा और समय की भी बचत होगी।

लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने पर फोकस

वैज्ञानिकों ने बताया कि स्मार्ट उर्वरकों के इस्तेमाल से खेती की लागत कम की जा सकती है। साथ ही फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार देखने को मिलता है। उनका कहना है कि अगर किसान संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से खाद और कृषि रसायनों का इस्तेमाल करें, तो मिट्टी की ताकत लंबे समय तक बनी रह सकती है और फसल भी बेहतर मिल सकती है।

किसानों को जागरूक करने के लिए चलेगा अभियान

कार्यशाला में यह भी तय किया गया कि प्रदेश की सभी गन्ना समितियों और कार्यालयों में स्मार्ट उर्वरकों, जैव उर्वरकों और बायोपेस्टिसाइड से जुड़ी जानकारी वाले पोस्टर, बैनर और प्रचार सामग्री लगाई जाएगी। इसका मकसद किसानों तक सही जानकारी पहुँचाना है, ताकि वे सही मात्रा और सही तरीके से इन उत्पादों का इस्तेमाल कर सकें।

'एक पेड़ मां के नाम' अभियान को मिला समर्थन

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कार्यशाला में पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया। सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को "एक पेड़ मां के नाम" अभियान के तहत पौधा लगाने का संकल्प दिलाया गया।

साथ ही गन्ना समितियों, चीनी मिलों और क्षेत्रीय कार्यालयों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करने की अपील की गई। अधिकारियों ने कहा कि खेती और पर्यावरण दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोनों का संरक्षण जरूरी है।

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