क्या होता है नौतपा? जानिए कब से होगी शुरुआत और खेती-किसानी के लिए क्यों माना जाता है अहम

Preeti Nahar | May 22, 2026, 19:27 IST
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हर साल मई-जून की भीषण गर्मी के बीच “नौतपा” शब्द सबसे ज्यादा सुनाई देता है। मौसम वैज्ञानिक इसे सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि सूर्य की स्थिति और गर्म हवाओं से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जलवायु प्रक्रिया मानते हैं। माना जाता है कि नौतपा जितना प्रभावी होता है, मानसून और खेती के लिए परिस्थितियां उतनी ही बेहतर बनती हैं।
नौतपा और मानसून कनेक्शन
नौतपा और मानसून कनेक्शन
Monsoon and Nautapa Relation: उत्तर भारत में जैसे-जैसे गर्मी अपने चरम पर पहुंचती है, वैसे-वैसे “नौतपा” की चर्चा शुरू हो जाती है। गाँवों और किसानों के बीच इसे लेकर कई मान्यताएं हैं। कोई कहता है कि नौतपा जितना तपेगा, उतनी अच्छी बारिश होगी, तो कोई इसे आने वाले मानसून का संकेत मानता है। लेकिन मौसम विज्ञान के नजरिए से देखें तो नौतपा सिर्फ पारंपरिक मान्यता नहीं, बल्कि सूर्य की स्थिति, गर्म हवाओं और धरती के ताप संतुलन से जुड़ा एक अहम दौर होता है। आमतौर पर यह हर साल 25 मई से 2 जून के आसपास पड़ता है।

क्या होता है नौतपा?

नौतपा वह अवधि होती है जब लगातार नौ दिनों तक धरती पर तीखी गर्मी पड़ती है। इसी कारण इसे “नौतपा” कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार समझें तो जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब नौतपा की शुरुआत होती है। इस दौरान उत्तर और मध्य भारत के कई हिस्सों में तापमान तेजी से बढ़ता है और लू का असर सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। आमतौर पर नौतपा मई के अंतिम सप्ताह में शुरू होता है और जून की शुरुआत तक चलता है। इस दौरान दिन सबसे ज्यादा गर्म महसूस होते हैं और कई इलाकों में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच जाता है।

जलवायु और मौसम से क्या है संबंध?

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार नौतपा के दौरान पड़ने वाली तीखी गर्मी मानसून प्रणाली को मजबूत करने में मदद करती है। जब उत्तर भारत और जमीन का तापमान तेजी से बढ़ता है, तब कम दबाव का क्षेत्र बनता है। यही कम दबाव अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी वाली हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर खींचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यानी सरल भाषा में कहें तो नौतपा की गर्मी मानसून की “भूमिका” तैयार करती है। अगर इस दौरान बादल, बारिश या पश्चिमी विक्षोभ ज्यादा सक्रिय रहें तो गर्मी का असर कम हो जाता है, जिसका असर मानसून की गति और तीव्रता पर भी पड़ सकता है।

खेती-किसानी के लिए क्यों जरूरी माना जाता है नौतपा?

किसानों के बीच एक पुरानी कहावत है “नौतपा तपे, तो बरखा छप्पर फाड़ के बरसे।” इसके पीछे वैज्ञानिक आधार भी माना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि नौतपा की तेज गर्मी-मिट्टी में मौजूद कई हानिकारक कीट और फफूंद को कम करती है, खरीफ फसलों की तैयारी के लिए जमीन को अनुकूल बनाती है, मानसून पूर्व वातावरण तैयार करती है, धान, सोयाबीन, मक्का जैसी फसलों की बुवाई के लिए जरूरी ताप संतुलन बनाती है। अगर नौतपा कमजोर पड़ जाए और बीच-बीच में बारिश होती रहे, तो कई बार कीटों और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

इस बार कितना असर दिख सकता है?

मौसम विभाग के अनुसार इस साल उत्तर भारत, मध्य भारत और बुंदेलखंड क्षेत्र में पहले से ही भीषण गर्मी दर्ज की जा रही है। कई जिलों में तापमान 46°C के पार पहुंच चुका है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार नौतपा का असर काफी तेज रह सकता है। हालांकि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। कई बार नौतपा के दौरान भी आंधी, बारिश या पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो जाते हैं, जिससे पारंपरिक मौसम चक्र प्रभावित होता है।

क्या सिर्फ मान्यता है नौतपा?

नौतपा को लेकर धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं जरूर हैं, लेकिन इसका सीधा संबंध मौसम विज्ञान और कृषि चक्र से भी माना जाता है। यही वजह है कि किसान, मौसम वैज्ञानिक और ग्रामीण समाज आज भी नौतपा को बेहद अहम मानते हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहाँ करोड़ों किसानों की उम्मीदें मानसून पर टिकी होती हैं, वहाँ नौतपा सिर्फ गर्मी का दौर नहीं, बल्कि आने वाले मौसम और खेती की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण समय माना जाता है।
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