NEPAL FLOODS: पिछले साल भी आई थी बाढ़ फिर Early Warning क्यों नहीं, EXPERT ने बताया कहाँ हुई चूक?

Lata Mishra | Aug 27, 2026, 18:33 IST
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नेपाल -तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर का एक हिस्सा ढहने के बाद आई फ्लैश फ्लड नेरासुवा और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। 165 लोगों की मौत और 826 लोगों के लापता होने के बाद हिमालयी क्षेत्रों में Early Warning System और आपदा -पूर्व तैयारी पर सवाल उठ रहे हैं।

रासुवा जिले के तिमुरे और स्याफ्रुबेसी जैसे इलाकों में हुआ। इसके बाद बाढ़ का पानी भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के जरिए नीचे की ओर बढ़ा और नुवाकोट तथा धादिंग समेत कई इलाकों को प्रभावित किया।
रासुवा जिले के तिमुरे और स्याफ्रुबेसी जैसे इलाकों में हुआ। इसके बाद बाढ़ का पानी भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के जरिए नीचे की ओर बढ़ा और नुवाकोट तथा धादिंग समेत कई इलाकों को प्रभावित किया।
नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने हिमालय में तेजी से बदलते आपदा जोखिम की गंभीर तस्वीर सामने रख दी है। शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, तिब्बत की ओर एक ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूटकर करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा। इसके साथ बर्फ़, चट्टान और मलबे का बड़ा हिस्सा नीचे आया और ल्हेंदे खोला नदी में तेज़ बहाव पैदा हुआ। इसी घटनाक्रम के बाद पानी और मलबे का सैलाब नेपाल की ओर बढ़ा और रासुवा से लेकर नुवाकोट, धादिंग और आगे के इलाकों तक तबाही मच गई।

27 अगस्त तक नेपाल में 165 शव बरामद किए जा चुके थे और 826 लोग अब भी लापता थे। इनमें 579 पर्यटक शामिल हैं। वहीं नेपाल और तिब्बत को मिलाकर लापता लोगों की संख्या 1,300 से ज्यादा बताई जा रही है। आंकड़े अभी बदल रहे हैं और अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में अंतर भी है।

आखिर इतनी भयावह बाढ़ आई कैसे?
यह घटना सामान्य बारिश से आई बाढ़ से अलग थी। शुरुआती वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार, हिमालयी सीमा क्षेत्र में ग्लेशियर का निचला हिस्सा अचानक टूटकर घाटी में गिरा। इससे बर्फ़, चट्टान और तलछट का भारी मलबा नीचे की ओर आया और ल्हेंदे खोला नदी के रास्ते में बड़े पैमाने पर अवरोध पैदा हुआ। इसके बाद पानी और मलबे का तेज़ बहाव नीचे की ओर बढ़ा और फ्लैश फ्लड में बदल गया।

उपलब्ध सैटेलाइट विश्लेषण के मुताबिक, ग्लेशियर का करीब 0.2 वर्ग किलोमीटर हिस्सा लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई से टूटकर करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा। शुरुआती तौर पर जिस भूकंपीय गतिविधि को भूकंप समझा गया था, US Geological Survey ने बाद में उसे ग्लेशियर और चट्टान के ढहने से पैदा हुई seismic energy बताया।यानी इस घटना को सिर्फ़ ‘भारी बारिश से आई बाढ़’ कहना सही नहीं होगा। यहां ग्लेशियर का टूटना, बर्फ़ और चट्टानों का मलबा, नदी का बाधित होना और उसके बाद आया तेज़ जल-मलबा प्रवाह-इन सभी प्रक्रियाओं ने मिलकर आपदा को इतना विनाशकारी बनाया।

सबसे ज्यादा नुकसान कहां हुआ?
फ्लैश फ्लड का शुरुआती असर नेपाल के रासुवा जिले के तिमुरे और आसपास के इलाकों में दिखाई दिया। इसके बाद पानी और मलबा भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र के साथ नीचे की ओर बढ़ा और नुवाकोट, धादिंग समेत कई इलाकों को प्रभावित किया। तिब्बत की ओर भी जिरोंग पोर्ट क्षेत्र में भारी नुकसान हुआ। सड़कों, पुलों, घरों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। नेपाल के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक करीब 40 किलोमीटर सड़कें, 35 मोटरेबल पुल और 45 सस्पेंशन ब्रिज क्षतिग्रस्त हुए हैं।

826 लोग नेपाल में लापता, 579 पर्यटक
नेपाल के NDRRMA के मुताबिक 27 अगस्त तक 826 लोग लापता थे। इनमें 579 पर्यटक शामिल हैं-113 नेपाली और 466 विदेशी नागरिक। नेपाल टूरिज्म बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक लापता विदेशी पर्यटकों में 177 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। इसके अलावा अमेरिका, यूक्रेन, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, मलेशिया और कनाडा समेत कई देशों के नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। नेपाल और तिब्बत दोनों को मिलाकर लापता लोगों की संख्या 1,300 से अधिक बताई जा रही है। इसलिए दोनों आंकड़ों को एक ही संख्या की तरह इस्तेमाल करना सही नहीं होगा।

क्या यह GLOF था?
इस घटना को सीधे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहना फिलहाल सही नहीं होगा। GLOF तब होता है जब ग्लेशियल झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी निकलता है, अक्सर झील के प्राकृतिक बर्फ़ या मलबे वाले बांध के टूटने के बाद। लेकिन 26 अगस्त की घटना के शुरुआती वैज्ञानिक आकलन में ग्लेशियर का हिस्सा टूटना और उसके साथ बर्फ़-चट्टान का avalanche/debris flow प्रमुख ट्रिगर बताया गया है।

क्या जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है?
तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ-साथ बर्फ़, चट्टान और permafrost की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है। इससे कुछ इलाकों में ग्लेशियर collapse, avalanche, landslide और अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन इस खास घटना को सीधे और पूरी तरह जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिकों को यह समझने के लिए ग्लेशियर की स्थिति, तापमान, बर्फ़ के पिघलने, ढलान की स्थिरता और स्थानीय परिस्थितियों का विस्तृत अध्ययन करना होगा।

South Asia Network on Dams, Rivers & People (SANDRP) Coordinator हिमांशु ठक्कर के मुताबिक, "8 जुलाई 2025 को इसी नदी में एक गंभीर ग्लेशियल फ्लड आया था। उस समय तिब्बत के Purepu Glacier पर बनी एक supraglacial lake से अचानक पानी निकलने के कारण ल्हेंदे नदी में फ्लैश फ्लड आया था। 10 जुलाई 2025 की सरकारी स्थिति रिपोर्ट में कम से कम 9 मौतों और 19 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई थी। इस घटना में पुल, सड़क, हाइड्रोपावर परियोजनाएं, वाहन और अन्य बुनियादी ढांचा भी प्रभावित हुआ था। अगर ऐसा प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो पानी और मलबे का बहुत तेज़ बहाव डाउनस्ट्रीम इलाकों में पहुंच सकता है। उनका सवाल यह है कि जब रासुवा जैसे इलाके में पिछले साल भी गंभीर ग्लेशियल फ्लड हो चुका था, तो क्या उस पूरे क्षेत्र को उसके बाद लगातार high-risk zone की तरह मॉनिटर किया गया?"

हिमालय के लिए चेतावनी
रासुवा की यह आपदा दिखाती है कि हिमालय में खतरा सिर्फ़ नदी में बढ़ते पानी तक सीमित नहीं है। एक घटना हजारों मीटर ऊपर ग्लेशियर में शुरू हो सकती है और कुछ ही समय में नीचे बसे गांवों, सड़कों, पुलों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं तक पहुंच सकती है। इसलिए हिमालयी इलाकों में आपदा प्रबंधन का फोकस सिर्फ़ disaster response पर नहीं रह सकता। जरूरत है disaster prediction, continuous monitoring और early warning की।

पिछले साल जिस इलाके में ग्लेशियल फ्लड आया था, वहां इस साल फिर ऐसी विनाशकारी घटना हुई है। यही बताता है कि किसी इलाके में एक बार ऐसी आपदा हो जाने के बाद उसे सिर्फ़ हादसे की तरह नहीं, बल्कि भविष्य के संभावित खतरे के संकेत के तौर पर देखना होगा। हिमालय को ‘रडार पर’ रखने का मतलब यही है-ग्लेशियर से लेकर नदी तक पूरे कैचमेंट की निगरानी, जोखिम वाले इलाकों की पहचान और खतरा पैदा होते ही नीचे बसे लोगों तक चेतावनी पहुंचाना। यही तरीका जान-माल के नुकसान को कम करने में सबसे अहम हो सकता है।
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