ग्लेशियर टूटने से फ्लैश फ्लड तक, नेपाल की तबाही की पूरी कहानी; जानें कैसे टूटा बर्फ़ का पहाड़
Umang | Aug 28, 2026, 18:28 IST
नेपाल में 26 अगस्त को चीन सीमा के पास ग्लेशियर का एक हिस्सा अचानक ढह गया। करीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से गिरा बर्फ़, पानी और चट्टानों का मलबा लगभग 100 किलोमीटर तक बहा और इससे ट्रिशूली व भोटेकोशी नदियों के आसपास भारी तबाही हुई। USGS के मुताबिक़, घटना से 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर कंपन पैदा हुआ, लेकिन इसका कारण भूकंप नहीं बल्कि ग्लेशियर का ढहना था।
ग्लेशियर टूटा तो नदी का रास्ता रुका, फिर आया मलबे-पानी का सैलाब
नेपाल में 26 अगस्त 2026 की सुबह चीन सीमा के पास हुई भीषण तबाही का मुख्य कारण ग्लेशियर का अचानक ढहना और उसके बाद पैदा हुआ तेज़ मलबे का बहाव और बाढ़ बताया जा रहा है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक़, लैंगटांग लिरुंग के उत्तर की ओर स्थित बर्फ़ से ढकी एक पहाड़ी चट्टान से ग्लेशियर का हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिरा। इस ग्लेशियर के मलबे में बर्फ़ और पानी भी शामिल था। ढलान से तेज़ी से नीचे आते हुए इस मलबे ने रास्ते में मौजूद चट्टानों और पानी को अपने साथ मिला लिया और आगे बढ़ते हुए एक तेज़ बहाव वाली मलबा-बाढ़ का रूप ले लिया। यह बहाव क़रीब 100 किलोमीटर तक गया और ट्रिशूली तथा भोटेकोशी नदियों के किनारे बसे इलाक़ों को प्रभावित किया। इस घटना में मरने वालों की संख्या 500 के पार पहुंच गयी है जबकि 1500 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। चीन-नेपाल सीमा पर स्थित जिरोंग पोर्ट भी इसकी चपेट में आया।
इस घटना को शुरुआत में भूकंप से जोड़कर देखा गया था, क्योंकि ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुआ कंपन भूकंप जैसी गतिविधि के रूप में दर्ज हुआ लेकिन USGS की 27 अगस्त तक की जाँच के अनुसार, कंपन के विश्लेषण से इसका स्रोत लैंगटांग लिरुंग के उत्तर की ओर स्थित ग्लेशियर वाली पहाड़ी चट्टान में मिला। ग्लेशियर के ढहने से पैदा ऊर्जा करीब 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी। इसके क़रीब तीन घंटे बाद एक दूसरा भूकंपीय संकेत भी दर्ज किया गया, जिसकी ऊर्जा करीब 4.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी। सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण में संकेत मिला कि क़रीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा। इसके बाद ल्हेन्दे खोला नदी का बहाव कुछ समय के लिए रुक गया और पानी, मिट्टी तथा चट्टानों का दबाव बढ़ने के बाद भारी मलबा और पानी भोटेकोशी नदी की ओर तेज़ी से बह निकला।
आम बोलचाल में ग्लेशियर के ‘फटने’ की बात कही जाती है, लेकिन इस घटना को ग्लेशियर का अचानक ढहना या ग्लेशियल कोलैप्स कहा जा रहा है। इसमें ग्लेशियर या उससे जुड़ा बर्फ़ और चट्टान का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर ढलान से नीचे गिरता है।
USGS के अनुसार, नेपाल की इस घटना में ग्लेशियर का मलबा पानी और बर्फ़ से भरा था। नीचे आते समय बर्फ़ तेज़ी से पिघली और मलबे ने रास्ते में मौजूद अतिरिक्त सामग्री तथा पानी को भी अपने साथ मिला लिया। इससे तेज़ गति से आगे बढ़ने वाला मलबे और पानी का बहाव बना, जो मौजूदा नाले और नदी के रास्तों से होते हुए बहुत दूर तक पहुँचा।
लैंगटांग लिरुंग के पास ग्लेशियर का निचला हिस्सा ध्वस्त होने के बाद भारी मात्रा में बर्फ़ और मलबा घाटी की ओर गिरा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह इलाका बाढ़ प्रभावित स्थान से लगभग 15 किलोमीटर पश्चिम में है। ग्लेशियर का हिस्सा उत्तर-पश्चिम दिशा में गिरने के बाद पश्चिम की तरफ़ नदी के साथ आगे बढ़ा।ग्लेशियर के घाटी में गिरने से पैदा हुआ कंपन इतना तेज़ था कि उसे भूकंप जैसी गतिविधि के रूप में दर्ज किया गया। इसी वजह से शुरुआती रिपोर्टों में इसे भूकंप समझे जाने की बात सामने आई।
सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिला कि ग्लेशियर का हिस्सा क़रीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा। इसके बाद ल्हेन्दे खोला नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए रुक गया। पानी, मिट्टी और चट्टानों का दबाव बढ़ने के बाद मलबे और पानी का तेज़ बहाव भोटेकोशी नदी की तरफ़ चला गया। USGS के मुताबिक़, मलबे का बहाव और बाढ़ लगभग 100 किलोमीटर तक पहुँची। इससे कई इमारतों और बुनियादी ढाँचे के दबने या नष्ट होने की आशंका है। चीन और नेपाल को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण राजमार्ग भी प्रभावित हुआ।
नेपाल की घटना के संदर्भ में उपलब्ध जानकारी में ग्लेशियर के अचानक ढहने को मुख्य घटना बताया गया है। इसके साथ ही ग्लेशियरों के कमज़ोर होने और पहाड़ी ढलानों के अस्थिर होने से जुड़े कई कारण बताए गए हैं।
ग्लेशियर के अचानक ढहने और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF को एक ही घटना नहीं माना जाता। ग्लेशियर के ढहने में ग्लेशियर का हिस्सा, बर्फ़ और चट्टानी मलबा अचानक नीचे की ओर गिरता है। वहीं GLOF में ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील का प्राकृतिक बाँध, जिसे मोरेन कहा जाता है, पानी के दबाव या भूस्खलन जैसी घटना से टूट सकता है और झील का पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है। नेपाल की इस घटना में USGS के विश्लेषण के अनुसार, ग्लेशियर का हिस्सा ढहने के बाद बर्फ़, पानी और मलबा तेज़ी से नीचे आया और रास्ते में अधिक पानी तथा मलबे को अपने साथ मिलाता गया। इसी प्रक्रिया ने दूर तक पहुँचने वाले तेज़ मलबा-बहाव और बाढ़ को जन्म दिया। घटना के दिन रसुवा इलाक़े में बारिश बहुत कम होने की बात भी उपलब्ध जानकारी में कही गई है, इसलिए सामान्य मानसूनी बारिश को तत्काल कारण नहीं माना गया है।
इस घटना को शुरुआत में भूकंप से जोड़कर देखा गया था, क्योंकि ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुआ कंपन भूकंप जैसी गतिविधि के रूप में दर्ज हुआ लेकिन USGS की 27 अगस्त तक की जाँच के अनुसार, कंपन के विश्लेषण से इसका स्रोत लैंगटांग लिरुंग के उत्तर की ओर स्थित ग्लेशियर वाली पहाड़ी चट्टान में मिला। ग्लेशियर के ढहने से पैदा ऊर्जा करीब 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी। इसके क़रीब तीन घंटे बाद एक दूसरा भूकंपीय संकेत भी दर्ज किया गया, जिसकी ऊर्जा करीब 4.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी। सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण में संकेत मिला कि क़रीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा। इसके बाद ल्हेन्दे खोला नदी का बहाव कुछ समय के लिए रुक गया और पानी, मिट्टी तथा चट्टानों का दबाव बढ़ने के बाद भारी मलबा और पानी भोटेकोशी नदी की ओर तेज़ी से बह निकला।
ग्लेशियर कैसे ‘फटता’ या अचानक टूटता है?
USGS के अनुसार, नेपाल की इस घटना में ग्लेशियर का मलबा पानी और बर्फ़ से भरा था। नीचे आते समय बर्फ़ तेज़ी से पिघली और मलबे ने रास्ते में मौजूद अतिरिक्त सामग्री तथा पानी को भी अपने साथ मिला लिया। इससे तेज़ गति से आगे बढ़ने वाला मलबे और पानी का बहाव बना, जो मौजूदा नाले और नदी के रास्तों से होते हुए बहुत दूर तक पहुँचा।
ग्लेशियर के अचानक ढहने की प्रक्रिया
- ग्लेशियर का एक हिस्सा अचानक टूटकर ढलान से नीचे गिरता है।
- बर्फ़ और मलबे के साथ पानी भी तेज़ी से नीचे आता है।
- रास्ते में चट्टान, मिट्टी और दूसरी सामग्री बहाव में शामिल हो जाती है।
- पानी और मलबे का दबाव बढ़ने के साथ बहाव और शक्तिशाली हो जाता है।
- यह बहाव नदी और नालों के रास्ते आगे बढ़ते हुए दूर तक तबाही मचा सकता है।
नेपाल में तबाही कैसे बढ़ती गई?
सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिला कि ग्लेशियर का हिस्सा क़रीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा। इसके बाद ल्हेन्दे खोला नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए रुक गया। पानी, मिट्टी और चट्टानों का दबाव बढ़ने के बाद मलबे और पानी का तेज़ बहाव भोटेकोशी नदी की तरफ़ चला गया। USGS के मुताबिक़, मलबे का बहाव और बाढ़ लगभग 100 किलोमीटर तक पहुँची। इससे कई इमारतों और बुनियादी ढाँचे के दबने या नष्ट होने की आशंका है। चीन और नेपाल को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण राजमार्ग भी प्रभावित हुआ।
ग्लेशियर टूटने के मुख्य कारण क्या हैं?
- ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ता तापमान: बढ़ते तापमान से ग्लेशियर तेज़ी से पिघल और कमज़ोर हो सकते हैं।
- पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना: पहाड़ों को थामे रखने वाली लंबे समय से जमी मिट्टी के पिघलने से ढलान अस्थिर हो सकती है।
- विवर्तनिक हलचल: हिमालयी क्षेत्र में लगातार जारी भूगर्भीय हलचल पहाड़ी ढलानों को प्रभावित कर सकती है।
- भूस्खलन और हिमस्खलन: अचानक हुए भूस्खलन या बर्फ़ के खिसकने से ग्लेशियर का कमज़ोर हिस्सा एक साथ ढह सकता है।
- ग्लेशियल झील का टूटना: ग्लेशियर से पिघलकर बनी झील के प्राकृतिक बाँध टूटने पर बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे आ सकता है।