Seafood Export: सिर्फ मछली बेचकर नहीं बढ़ेगी कमाई! प्रोसेस्ड और रेडी-टू-कुक प्रोडक्ट्स में छिपा है ज्यादा मुनाफा

Preeti Nahar | Jun 08, 2026, 11:36 IST
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भारत सरकार समुद्री खाद्य निर्यात को 1 लाख करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंचाने की तैयारी में है। ऐसे में मछली पालकों के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन, गुणवत्ता और निर्यात मानकों को समझना भी जरूरी हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में सबसे ज्यादा कमाई रेडी-टू-कुक और रेडी-टू-ईट उत्पादों से होगी।

Seafood export
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अगर आप मछली पालन करते हैं और अपनी उपज सीधे मंडी या व्यापारियों को बेच देते हैं, तो आने वाले समय में यह तरीका बदलना पड़ सकता है। अब सरकार का कहना है कि मछली पालक सिर्फ उत्पादन तक सीमित न रहें, बल्कि अपनी उपज को प्रोसेस करके ज्यादा कीमत वाले बाजारों तक पहुंचाएं।

मछली निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने विशाखापत्तनम में राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की, जिसमें मछली पालकों को सलाह दी कि वे केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि अच्छी गुणवत्ता, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और निर्यात मानकों पर भी ध्यान दें। कार्यशाला में बताया गया कि अगर किसान वैल्यू एडेड उत्पादों और आधुनिक तकनीकों को अपनाते हैं, तो उन्हें घरेलू बाजार के मुकाबले निर्यात में बेहतर दाम मिल सकते हैं। इस आर्टिकल में आगे पढ़िए कि किन-किन क्षेत्रों से मछली पालक बेहतर कमाई कर सकते हैं।

1- सिर्फ कच्ची मछली बेचने का दौर बदल रहा है- अभी बड़ी संख्या में मछली पालक अपनी उपज को कच्चे रूप में ही बेच देते हैं। इससे उन्हें बाजार का सामान्य भाव मिलता है और मुनाफे की गुंजाइश सीमित रहती है। यदि मछली को साफ करके, कटिंग करके, फ्रोजन पैकिंग या रेडी-टू-कुक उत्पाद के रूप में बेचा जाए तो उसकी कीमत कई गुना बढ़ सकती है। यही कारण है कि दुनिया के बड़े निर्यातक देश अब वैल्यू एडेड उत्पादों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं।

2- रेडी-टू-कुक और रेडी-टू-ईट उत्पादों की बढ़ रही मांग- आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में उपभोक्ता ऐसे उत्पाद चाहते हैं जिन्हें कम समय में तैयार किया जा सके। यही वजह है कि रेडी-टू-कुक फिश, फिश फिलेट, मैरीनेटेड फिश और रेडी-टू-ईट सीफूड उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत के लिए यह बड़ा अवसर है क्योंकि देश में मछली उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। यदि किसानों और उद्यमियों को प्रोसेसिंग सुविधाएं मिलती हैं तो वे घरेलू बाजार के साथ-साथ विदेशों में भी बेहतर दाम प्राप्त कर सकते हैं।

3- निर्यात के लिए अब ट्रेसिबिलिटी भी जरूरी- कार्यशाला में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अब केवल अच्छी गुणवत्ता की मछली ही काफी नहीं है। खरीदार यह भी जानना चाहते हैं कि मछली कहाँ पैदा हुई, किस तरह उसका पालन हुआ और उत्पादन के दौरान कौन-कौन से इनपुट इस्तेमाल किए गए। इसीलिए डिजिटल ट्रेसिबिलिटी सिस्टम को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। इससे उत्पाद की पूरी जानकारी रिकॉर्ड में रहती है और विदेशी बाजारों में भरोसा बढ़ता है।

4- एंटीबायोटिक और गुणवत्ता मानकों पर रखना होगा ध्यान - कई देशों में मछली और झींगा के निर्यात को लेकर कड़े नियम हैं। अगर इनमें दवाओं या एंटीबायोटिक की मात्रा तय सीमा से ज्यादा पाई जाती है, तो पूरा निर्यात ऑर्डर रद्द हो सकता है। इसलिए मछली पालकों को सलाह दी जाती है कि वे वैज्ञानिक तरीके से पालन करें और दवाओं का इस्तेमाल केवल विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही करें।

5- तालाब में मछली पालने वालों के लिए भी खुल रहे नए अवसर-कार्यशाला में केवल समुद्री मत्स्य पालन ही नहीं, बल्कि अंतर्देशीय मत्स्य पालन पर भी विशेष चर्चा हुई। तालाब, जलाशय और केज कल्चर के जरिए पैदा होने वाली मछलियों में भी निर्यात की बड़ी संभावना मौजूद है। इसका मतलब है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों के मछली पालकों को भी आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजारों का लाभ मिल सकता है।

6- सीवीड, मोती पालन और सजावटी मछलियां भी बन सकती हैं कमाई का जरिया- कार्यशाला में यह भी बताया गया कि भविष्य में सिर्फ सामान्य मछली पालन ही नहीं, बल्कि समुद्री शैवाल (सीवीड), मोती उत्पादन, सजावटी मछलियों और उच्च मूल्य वाली प्रजातियों का पालन भी किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन क्षेत्रों में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं और सरकार भी इन्हें बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है।

7- कोल्ड चेन और प्रोसेसिंग सुविधाओं की जरूरत- निर्यात बढ़ाने के लिए अच्छी कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और परिवहन व्यवस्था जरूरी है। कई हितधारकों ने बताया कि अभी इन सुविधाओं की कमी के कारण किसानों और निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ता है। सरकार और उद्योग जगत अब इस दिशा में निवेश बढ़ाने और आधुनिक बुनियादी ढांचा विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।

8- स्टार्टअप और MSME निभाएंगे बड़ी भूमिका- आने वाले समय में स्टार्टअप, छोटे उद्यम और MSME क्षेत्र वैल्यू एडेड सीफूड उत्पादों के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाएंगे। नई तकनीक, बेहतर पैकेजिंग और ऑनलाइन मार्केटिंग की मदद से छोटे उद्यमी भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बना सकते हैं।

9- 1 लाख करोड़ रुपये के निर्यात लक्ष्य पर नजर- कार्यशाला में यह भी स्पष्ट किया गया कि भारत समुद्री खाद्य निर्यात को 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इसके लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग, गुणवत्ता नियंत्रण, ट्रेसिबिलिटी और नए बाजारों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

यदि मछली पालक समय रहते इन बदलावों को अपनाते हैं, तो उनकी आय में बड़ा इजाफा हो सकता है। आने वाले वर्षों में सफलता सिर्फ ज्यादा मछली पैदा करने से नहीं, बल्कि उसे बेहतर गुणवत्ता और बेहतर रूप में बाजार तक पहुंचाने से तय होगी।
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