Mushroom Discovery: मेघालय के जंगल में मिला अनोखा मशरूम, डीएनए जाँच में सामने आई नई प्रजाति
Mansi | Aug 11, 2026, 18:23 IST
री-भोई ज़िले, मेघालय में रुसुला ग्रिसियोपुरपुराटा नामक एक नवोदित मशरूम प्रजाति का पता चला है। इसकी पहचान वैज्ञानिकों ने डीएनए तकनीक और उसके विशिष्ट स्वरूप का गहन अध्ययन करके की है। यह महत्वपूर्ण नमूना एक साल के पेड़ के नीचे पाया गया था और इसे शोध हेतु संरक्षित किया गया है।
मेघालय में मिली मशरूम की नई प्रजाति
मेघालय के री-भोई ज़िले में एक ऐसी मशरूम प्रजाति की पहचान हुई है, जिसे विज्ञान के लिए नई प्रजाति के रूप में दर्ज किया गया है। इसका वैज्ञानिक नाम रुसुला ग्रिसियोपुरपुराटा रखा गया है। यह रुसुला वंश से संबंधित है, जिसमें दुनिया भर में करीब 2,000 प्रजातियाँ शामिल हैं। इस नई प्रजाति की पहचान में इसके बाहरी रूप के साथ-साथ डीएनए आधारित जाँच की भी अहम भूमिका रही है।
इस मशरूम की खोज और पहचान भारत में फफूंद की विविधता के अध्ययन के लिहाज़ से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शोधकर्ताओं ने इसके नमूनों का अध्ययन कर इसके आकार, रंग, गलफड़ों की बनावट और दूसरे सूक्ष्म गुणों की तुलना संबंधित प्रजातियों से की। इसके बाद आणविक स्तर पर की गई जाँच ने इसे एक अलग प्रजाति के रूप में पहचानने में मदद की।
नई प्रजाति का मुख्य नमूना यानी होलोटाइप 22 जुलाई 2022 को मेघालय के री-भोई ज़िले के जिरांग में साल के पेड़ के नीचे मिला था। यह स्थान समुद्र तल से करीब 320 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस नमूने को शोध के लिए सुरक्षित किया गया और आगे वैज्ञानिक जाँच की गई। अध्ययन में कुल तीन नमूनों को शामिल किया गया, जिनमें एक नमूना मेघालय से और दो पश्चिम बंगाल से लिए गए थे। मेघालय से मिले नमूने को जीयूबीएच 20331 संग्रह संख्या के तहत दर्ज किया गया। इन नमूनों के आधार पर वैज्ञानिकों ने नई प्रजाति के गुणों को समझने और उसकी पहचान सुनिश्चित करने का प्रयास किया।
रुसुला ग्रिसियोपुरपुराटा की सबसे खास पहचान इसका धूसर-बैंगनी रंग का टोपी जैसा ऊपरी हिस्सा है। उम्र बढ़ने के साथ इसकी टोपी में दरारें दिखाई देने लगती हैं। इसके गलफड़ों में डंठल के पास शाखाओं जैसी बनावट भी देखी गई है।
मशरूम की पहचान केवल उसके रंग या आकार से नहीं की गई। शोधकर्ताओं ने इसके सूक्ष्म गुणों के साथ उसके आनुवंशिक गुणों का भी अध्ययन किया। यही वजह है कि इस प्रजाति को रुसुला की दूसरी संबंधित प्रजातियों से अलग पहचानने में मदद मिली।
इस मशरूम की पहचान के लिए आईटीएस डीएनए अनुक्रमण और फाइलोजेनेटिक विश्लेषण का इस्तेमाल किया गया। आईटीएस यानी आंतरिक प्रतिलेखित अंतराल फफूंद की प्रजातियों की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला एक महत्वपूर्ण डीएनए संकेतक है। वैज्ञानिकों ने डीएनए से मिले परिणामों की तुलना मशरूम की बाहरी और सूक्ष्म विशेषताओं से की। दोनों स्तरों पर मिले प्रमाणों ने इस मशरूम को रुसुला की एक अलग प्रजाति के रूप में पहचानने में मदद की। यह तरीका आधुनिक फंगल टैक्सोनॉमी यानी मशरूम की वैज्ञानिक पहचान और वर्गीकरण में महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस नई प्रजाति से जुड़ा शोध फाइटोटैक्सा नामक वैज्ञानिक पत्रिका में 5 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुआ। शोध गुवाहाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया। रुसुला ग्रिसियोपुरपुराटा को रुसुला के साइनोक्सैंथिनी उपखंड के अंतर्गत रखा गया है। वैज्ञानिक वर्गीकरण में किसी नई प्रजाति के लिए होलोटाइप का दर्ज होना महत्वपूर्ण होता है। यह वह मुख्य नमूना होता है, जिसे उस प्रजाति के वैज्ञानिक नाम और पहचान के संदर्भ के रूप में सुरक्षित रखा जाता है।
रुसुला वंश की कुछ प्रजातियाँ खाने योग्य होती हैं, लेकिन रुसुला ग्रिसियोपुरपुराटा के खाने योग्य होने की पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए इसे खाद्य मशरूम मानकर इस्तेमाल करना उचित नहीं होगा। नई प्रजाति की वैज्ञानिक पहचान और उसकी खाद्यता, दोनों अलग-अलग विषय हैं। मेघालय में मिली यह नई मशरूम प्रजाति भारत की जैव विविधता और फफूंद की दुनिया की विशाल विविधता की ओर भी ध्यान खींचती है। इस खोज से पता चलता है कि जंगलों और पेड़ों के आसपास मौजूद कई छोटे जीवों और कवकों की अभी भी वैज्ञानिक रूप से पहचान बाकी हो सकती है। रुसुला ग्रिसियोपुरपुराटा की खोज इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इस मशरूम की खोज और पहचान भारत में फफूंद की विविधता के अध्ययन के लिहाज़ से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शोधकर्ताओं ने इसके नमूनों का अध्ययन कर इसके आकार, रंग, गलफड़ों की बनावट और दूसरे सूक्ष्म गुणों की तुलना संबंधित प्रजातियों से की। इसके बाद आणविक स्तर पर की गई जाँच ने इसे एक अलग प्रजाति के रूप में पहचानने में मदद की।
मेघालय के जिरांग में मिला था नमूना
धूसर-बैंगनी रंग और अलग बनावट
मशरूम की पहचान केवल उसके रंग या आकार से नहीं की गई। शोधकर्ताओं ने इसके सूक्ष्म गुणों के साथ उसके आनुवंशिक गुणों का भी अध्ययन किया। यही वजह है कि इस प्रजाति को रुसुला की दूसरी संबंधित प्रजातियों से अलग पहचानने में मदद मिली।