सहजन के बीज और ज्वालामुखीय पत्थर से पानी होगा फिल्टर! RO से बर्बाद होने वाले पानी का मिलेगा समाधान, यूपी में होगी रिसर्च
Gaon Connection | Jul 18, 2026, 17:21 IST
उत्तर प्रदेश सरकार 'भूजल सप्ताह-2026' के तहत जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को जन आंदोलन बनाने के लिए अभियान चला रही है। 'जल-संवाद' कार्यक्रम में सहजन के बीज और स्कोरिया ज्वालामुखीय चट्टान से पानी शुद्ध करने की तकनीक पर चर्चा हुई। आरओ सिस्टम से निकलने वाले अपशिष्ट जल को बचाने के लिए इस तकनीक पर शोध, प्रोटोटाइप और परीक्षण की तैयारी की जा रही है। साथ ही वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और जनभागीदारी को भी अभियान का अहम हिस्सा बनाया जाएगा।
आरओ से बर्बाद होने वाले पानी को बचाने की नई तकनीक पर होगा शोध
उत्तर प्रदेश में भूजल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा अभियान शुरू किया है। 'भूजल सप्ताह-2026' के तहत जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और लोगों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए पूरे प्रदेश में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में शुक्रवार को भूजल विभाग ने 'जल-संवाद' कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें घरेलू आरओ (RO) सिस्टम से निकलने वाले अपशिष्ट जल को बचाने और उसका दोबारा उपयोग करने के लिए नई तकनीकों पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम के दौरान सहजन (मोरिंगा) के बीज और स्कोरिया ज्वालामुखीय चट्टान (Scoria Volcanic Rock) के उपयोग से प्राकृतिक तरीके से पानी को शुद्ध करने की तकनीक प्रस्तुत की गई। इस तकनीक के ज़रिए आरओ सिस्टम से प्रतिदिन बर्बाद होने वाले लाखों लीटर पानी को बचाने की संभावना जताई गई। भूजल विभाग ने इस तकनीक में रुचि दिखाते हुए इस पर विस्तृत शोध, प्रोटोटाइप तैयार करने और परीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है।
'जल-संवाद' कार्यक्रम की अध्यक्षता भूजल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने की। इस दौरान प्राकृतिक और कम लागत वाली जल शुद्धिकरण तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि सहजन के बीजों का पाउडर पानी में मौजूद महीन अशुद्धियों को एकत्र कर नीचे बैठाने में मदद करता है, जबकि छिद्रयुक्त स्कोरिया ज्वालामुखीय चट्टान फ़िल्टर की तरह काम कर पानी की अशुद्धियाँ कम करने में सहायक हो सकती है। हालांकि, इस तकनीक को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक शोध और परीक्षण किए जाएंगे।
कार्यक्रम में घरेलू आरओ सिस्टम से फ़िल्टरिंग के बाद निकलने वाले अपशिष्ट जल के संरक्षण को लेकर विशेष चर्चा हुई। यदि प्रस्तावित तकनीक सफल होती है, तो बड़ी मात्रा में बर्बाद होने वाले पानी का दोबारा उपयोग संभव हो सकेगा। भूजल विभाग ने इस दिशा में शोध कार्य को आगे बढ़ाने और व्यवहारिक मॉडल विकसित करने में रुचि दिखाई है।
'जल-संवाद' के दौरान विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने भूजल संकट से निपटने के लिए कई सुझाव दिए। इनमें वर्षा जल संचयन, रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण को प्रभावी ढंग से लागू करने वाले गाँवों, शहरों और आवासीय सोसायटियों को विशेष प्रोत्साहन और पुरस्कार देने का प्रस्ताव शामिल रहा। साथ ही रिमोट सेंसिंग और जीआईएस (GIS) तकनीक के माध्यम से जल संरक्षण और भूजल भंडारण की मैपिंग को भी अभियान का हिस्सा बनाने पर ज़ोर दिया गया।
भूजल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समाज के हर वर्ग की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने लोगों से जल संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाने की अपील की। सरकार का उद्देश्य केवल नई तकनीकों को बढ़ावा देना ही नहीं, बल्कि व्यवहार में बदलाव लाकर भूजल संरक्षण को जन आंदोलन का स्वरूप देना भी है।
कार्यक्रम के दौरान सहजन (मोरिंगा) के बीज और स्कोरिया ज्वालामुखीय चट्टान (Scoria Volcanic Rock) के उपयोग से प्राकृतिक तरीके से पानी को शुद्ध करने की तकनीक प्रस्तुत की गई। इस तकनीक के ज़रिए आरओ सिस्टम से प्रतिदिन बर्बाद होने वाले लाखों लीटर पानी को बचाने की संभावना जताई गई। भूजल विभाग ने इस तकनीक में रुचि दिखाते हुए इस पर विस्तृत शोध, प्रोटोटाइप तैयार करने और परीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है।