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धान की फ़सल पर नया खतरा: जब कीटों को ज़्यादा ताक़तवर बना रहे हैं वायरस

Gaon Connection | Jan 15, 2026, 13:41 IST
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धान की खेती को लेकर हमारी अब तक की समझ अधूरी थी। एक नया वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि धान के कुछ वायरस केवल फसल को बीमार नहीं करते, बल्कि पौधों की जैविक “खुशबू” बदलकर कीटों को उनके प्राकृतिक दुश्मनों से भी बचा लेते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि कीट ज़्यादा समय तक जीवित रहते हैं और रोग का फैलाव तेज़ हो जाता है।
खेती का छिपा विज्ञान: धान के रोग कैसे कीटों को दुश्मनों से बचाते हैं
धान हमारी सबसे ज़रूरी फसलों में से एक है। देश की बड़ी आबादी का खाना इसी पर टिका है और लाखों किसानों की आमदनी भी। लेकिन धान की खेती हमेशा आसान नहीं रही। कीट और बीमारियाँ सालों से किसानों के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। किसान खेत में कीट दिखते ही दवा छिड़कता है, कई बार महँगी दवाएँ डालता है, फिर भी देखता है कि कुछ ही दिनों में कीट फिर लौट आते हैं। अब वैज्ञानिकों ने बताया है कि इसके पीछे सिर्फ़ किसान की गलती या दवा की कमी नहीं, बल्कि खेती के अंदर चल रही एक गहरी और छिपी हुई चाल है।

अब तक किसानों को यही सिखाया गया है कि अगर खेत में कीट दिखें, तो दवा डालो; अगर बीमारी दिखे, तो छिड़काव करो। लेकिन कई बार किसान देखता है कि दवा डालने के बाद भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि कीट और ज़्यादा बढ़ गए हैं। किसान सोचता है कि शायद दवा नकली थी, या मात्रा कम पड़ गई। लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने जो खोज की है, वह बताती है कि समस्या केवल दवा या किसान की समझ की नहीं है, बल्कि खेती के भीतर चल रही एक बहुत ही चालाक और अदृश्य प्रक्रिया की है।

वैज्ञानिकों ने पाया है कि धान में लगने वाले कुछ वायरस केवल पौधे को बीमार नहीं करते, बल्कि कीटों की मदद भी करते हैं। यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन प्रकृति में ऐसा होता है। जब धान का पौधा वायरस से संक्रमित होता है, तो उसके अंदर की जैविक क्रियाएँ बदल जाती हैं। पौधा हवा में कुछ खास तरह की बहुत हल्की गंध छोड़ने लगता है। इंसान इस गंध को महसूस नहीं कर सकता, लेकिन कीट और दूसरे छोटे जीव इसे आसानी से पहचान लेते हैं। यही गंध पूरे खेल को बदल देती है।

धान को नुकसान पहुँचाने वाले कीट, जैसे प्लान्थॉपर और लीफहॉपर, आमतौर पर खेत में अकेले नहीं रहते। उनके भी दुश्मन होते हैं, ऐसे कीट जो उन्हें खाकर खत्म कर देते हैं और किसान की फसल को बचाते हैं। लेकिन जब वायरस से संक्रमित पौधा अपनी गंध बदल देता है, तो ये मित्र कीट भ्रमित हो जाते हैं। वे सही शिकार तक पहुँच नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि नुकसान करने वाले कीट ज़्यादा देर तक ज़िंदा रहते हैं, तेज़ी से बढ़ते हैं और ज़्यादा पौधों को नुकसान पहुँचाते हैं।

मॉडल जो यह बताता है कि चावल को संक्रमित करने वाले वायरस कीट वैक्टर के खिलाफ अप्रत्यक्ष सुरक्षा को कैसे कमजोर करते हैं। Photo Credit: Science Advances
मॉडल जो यह बताता है कि चावल को संक्रमित करने वाले वायरस कीट वैक्टर के खिलाफ अप्रत्यक्ष सुरक्षा को कैसे कमजोर करते हैं। Photo Credit: Science Advances


यहाँ वायरस की भूमिका बहुत चालाक हो जाती है। वायरस खुद चल नहीं सकता, उसे फैलने के लिए कीटों की ज़रूरत होती है। इसलिए वह पौधे को इस तरह बदल देता है कि कीट सुरक्षित रहें। कीट जितना ज़्यादा ज़िंदा रहेगा, उतना ज़्यादा वायरस फैलेगा। इस तरह पौधा, वायरस और कीट तीनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बन जाता है, जिसमें किसान सबसे ज़्यादा नुकसान उठाता है।

इसी वजह से कई बार किसान को लगता है कि अब कीट पहले जैसे नहीं रहे। पहले जो कीटनाशक असर करता था, अब वही दवा बेअसर लगती है। असल में कीट नहीं बदले, बल्कि उनके चारों तरफ़ का माहौल बदल गया है। वायरस की वजह से पौधे का व्यवहार बदल गया है, जिससे खेत का पूरा संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसे में केवल दवा डालना उस जड़ तक नहीं पहुँच पाता, जहाँ से समस्या शुरू हुई है।

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इस शोध से खेती को देखने का नज़रिया बदलता है। यह बताता है कि बीमारी और कीट को अलग-अलग समझना अब काफी नहीं है। खेत में जो हो रहा है, वह एक पूरी कहानी है, जिसमें पौधा, कीट, वायरस और वातावरण सब आपस में जुड़े हुए हैं। जब किसान केवल कीट को मारने की कोशिश करता है, तो वह इस पूरी कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा देख रहा होता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि किसान को दवा बिल्कुल नहीं डालनी चाहिए। बल्कि इसका मतलब यह है कि दवा आख़िरी उपाय हो, पहला नहीं। खेत में जैविक संतुलन बनाए रखना अब पहले से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। मित्र कीटों को बचाना, ज़रूरत से ज़्यादा छिड़काव से बचना, और ऐसी किस्मों को अपनाना जो बीमारी को सहन कर सकें ये सब मिलकर ही इस समस्या से निपट सकते हैं।

भारत जैसे देश में धान की फसल सिर्फ़ किसान की नहीं, पूरे देश की चिंता है। अगर वायरस और कीट मिलकर ज़्यादा ताक़तवर होते गए, तो इसका असर पैदावार पर पड़ेगा, बाज़ार पर पड़ेगा और अंत में आम आदमी की थाली पर पड़ेगा। इसलिए यह शोध सिर्फ़ वैज्ञानिकों के लिए नहीं, बल्कि हर किसान और नीति बनाने वाले लोगों के लिए भी अहम है।

यह समझ हमें यह सिखाती है कि खेती केवल खेत में खड़े होकर दवा छिड़कने का काम नहीं है। खेती प्रकृति के संकेतों को समझने की कला है। पौधा जब कुछ “कह” रहा है, तो हमें उसे सुनना होगा। वायरस, कीट और पौधे के बीच चल रही यह अदृश्य बातचीत अगर हम समझ लें, तो हम ऐसी खेती की ओर बढ़ सकते हैं जो कम खर्च वाली हो, ज़्यादा सुरक्षित हो और लंबे समय तक टिकाऊ रहे।

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