निकोटीन और कोटिनिन की पहचान से बदलेगा हेल्थ चेकअप का तरीका, निकोटीन जाँच किट अब होगी सबके लिए
Gaon Connection | Apr 16, 2026, 11:50 IST
वैज्ञानिकों ने निकोटीन और उसके उप-उत्पाद कोटिनिन की पहचान के लिए एक नई, सस्ती और तेज़ तकनीक विकसित की है। यह आयरन-आधारित नैनोसेंसर अणुओं को पकड़कर चमक में बदलाव के जरिए उनकी मौजूदगी का संकेत देता है। पारंपरिक महंगी और जटिल तकनीकों के मुकाबले यह तरीका आसान, कम लागत वाला और अधिक प्रभावी है। भविष्य में इसका उपयोग अस्पतालों, लैब और कम लागत वाली जाँच किट्स में किया जा सकता है, जिससे धूम्रपान के प्रभाव की जल्दी और व्यापक जांच संभव हो सकेगी।
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आज भी धूम्रपान और पैसिव स्मोकिंग (दूसरों के धुएं में रहना) पूरी दुनिया में बड़ी स्वास्थ्य समस्या बना हुआ है। सिगरेट और तंबाकू में पाया जाने वाला निकोटीन एक ऐसा केमिकल है जो जल्दी लत लगा देता है और शरीर के लिए नुकसानदायक होता है। जब निकोटीन शरीर में जाता है, तो यह टूटकर (मेटाबोलाइज होकर) कोटिनिन नाम का पदार्थ बनाता है। यह कोटिनिन खून, लार और पेशाब में लंबे समय तक रहता है। इसलिए अगर किसी व्यक्ति के शरीर में कोटिनिन मिल जाए, तो यह साफ संकेत होता है कि वह तंबाकू के संपर्क में रहा है। इसी वजह से इन दोनों की सही और जल्दी पहचान बहुत जरूरी होती है।
अब तक निकोटीन और कोटिनिन की जाँच के लिए जो तरीके इस्तेमाल होते थे, वे काफी जटिल और महंगे होते हैं। जैसे गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री (GC-MS), हाई-परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी (HPLC), इलेक्ट्रोफोरेसिस और इम्यूनोएसे। इन तकनीकों में बड़ी मशीनें लगती हैं, सैंपल तैयार करने में समय लगता है और इन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञ चाहिए होते हैं। यही कारण है कि हर जगह या बड़े स्तर पर इनका इस्तेमाल करना आसान नहीं होता।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है। यह तकनीक एक खास तरह के सेंसर पर आधारित है, जिसे आयरन (लोहे) से बने नैनोस्फीयर से तैयार किया गया है। ये नैनोस्फीयर बहुत छोटे-छोटे कण होते हैं, जो स्पंज की तरह दिखते हैं। इनके अंदर बहुत सूक्ष्म छेद (पोर) होते हैं, जो छोटे-छोटे अणुओं को अपने अंदर पकड़ सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने एक खास प्रक्रिया (सॉल्वोथर्मल विधि) से लोहे और कुछ ऑर्गेनिक (कार्बनिक) पदार्थों को मिलाकर यह नैनोस्फीयर बनाए हैं। जब निकोटीन या कोटिनिन जैसे अणु इनके संपर्क में आते हैं, तो ये उन्हें अपने अंदर खींच लेते हैं। जैसे ही ये अणु इन छिद्रों में जाते हैं, सेंसर में एक खास बदलाव होता है-यह ज्यादा चमकने लगता है और इसका रंग हल्का नीला हो जाता है। इस चमक (फ्लोरोसेंस) को देखकर वैज्ञानिक आसानी से समझ सकते हैं कि निकोटीन या कोटिनिन मौजूद है या नहीं। इस प्रक्रिया को देखने के लिए कॉन्फोकल माइक्रोस्कोपी और इंट्रासेल्युलर इमेजिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है।इस सेंसर की खासियत क्या है?
यह नया सेंसर बहुत ही सटीक (accurate) है और खास तौर पर निकोटीन और कोटिनिन को पहचानने में सक्षम है। इसे कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, यानी यह री-यूजेबल है। इसकी एक बड़ी खासियत यह भी है कि यह बहुत कम मात्रा में मौजूद निकोटीन/कोटिनिन को भी पकड़ सकता है। इसमें “होस्ट-गेस्ट” इंटरैक्शन (यानि सेंसर और अणु के बीच खास तरह का जुड़ाव) और इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर की वजह से तेज़ सिग्नल मिलता है, जिससे पहचान आसान हो जाती है।
यह तकनीक लोहे पर आधारित है, जो आसानी से उपलब्ध और सस्ता होता है। साथ ही यह ज्यादा जहरीला (toxic) भी नहीं है, इसलिए शरीर के लिए सुरक्षित माना जाता है। इसकी एक और खास बात यह है कि यह पानी (जलीय माध्यम) में भी अच्छी तरह काम करता है, जिससे इसे प्रयोग करना और आसान हो जाता है। यही कारण है कि यह तकनीक बड़े स्तर पर इस्तेमाल के लिए काफी उपयोगी मानी जा रही है।
यह नई तकनीक आने वाले समय में स्वास्थ्य जाँच को आसान और सस्ता बना सकती है। इससे अस्पतालों और लैब में धूम्रपान के असर की जल्दी जाँच की जा सकेगी। साथ ही, तंबाकू के संपर्क में आने वाले लोगों की पहचान भी तेजी से हो पाएगी। यह तकनीक आगे चलकर अन्य बीमारियों के बायोमार्कर की जांच के लिए भी इस्तेमाल हो सकती है। कम लागत और सरल उपयोग के कारण यह आम लोगों तक भी पहुंच सकती है और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
पुरानी जाँच तकनीकों की समस्या
नई खोज: आयरन से बना खास सेंसर
सेंसर कैसे काम करता है– आसान भाषा में समझें
यह नया सेंसर बहुत ही सटीक (accurate) है और खास तौर पर निकोटीन और कोटिनिन को पहचानने में सक्षम है। इसे कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, यानी यह री-यूजेबल है। इसकी एक बड़ी खासियत यह भी है कि यह बहुत कम मात्रा में मौजूद निकोटीन/कोटिनिन को भी पकड़ सकता है। इसमें “होस्ट-गेस्ट” इंटरैक्शन (यानि सेंसर और अणु के बीच खास तरह का जुड़ाव) और इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर की वजह से तेज़ सिग्नल मिलता है, जिससे पहचान आसान हो जाती है।