‘‘एड नहीं, जस्टिस और कंपेंसेशन चाहिए”: नेपाल की तबाही ने उठाया क्लाइमेट जस्टिस का सवाल

Mansi | Sept 03, 2026, 18:45 IST
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पिछले कुछ समय में नेपाल और तिब्बत में आए भयानक बाढ़ ने जलवायु न्याय के मुद्दों को फिर से उजागर किया है। ये बाढ़ उस असमानता को दर्शाती हैं, जहां कम उत्सर्जन करने वाले देश जलवायु परिवर्तन के भयंकर परिणामों के सामने हैं, जबकि विकसित देशों का ऐतिहासिक योगदान काफी अधिक है। नेपाल जैसे देश अब केवल सहायता नहीं, बल्कि सही मुआवजे और न्याय की मांग कर रहे हैं।

बाढ़ के बाद की तबाही
बाढ़ के बाद की तबाही
नेपाल और तिब्बत के हिमालयी क्षेत्र में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और हिमालयी क्षेत्रों में बदलते मौसम के बीच आई इस तबाही ने घरों, सड़कों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया। लेकिन इस आपदा के साथ एक और सवाल भी खड़ा हुआ है जिस देश का ग्लोबल वार्मिंग में योगदान बेहद कम है, क्या उसे जलवायु संकट की इतनी बड़ी कीमत चुकानी चाहिए?

यही सवाल क्लाइमेट जस्टिस यानी जलवायु न्याय की बहस के केंद्र में है। नेपाल का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान 0.1% से भी कम है, लेकिन हिमालयी देश होने के कारण वह ग्लेशियरों के पिघलने, बाढ़, भूस्खलन और दूसरी जलवायु संबंधी आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील है। दूसरी ओर, जिन विकसित देशों ने दशकों तक औद्योगिक विकास के दौरान बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल किया, उनका ऐतिहासिक उत्सर्जन काफी अधिक रहा है।

क्या है क्लाइमेट जस्टिस?

क्लाइमेट जस्टिस का मतलब है कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी और उससे होने वाले नुकसान को सभी देशों के लिए एक जैसा नहीं माना जा सकता। जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है, लेकिन सभी देशों ने इसे पैदा करने में बराबर योगदान नहीं दिया है। इसके साथ ही, सभी देशों के पास बाढ़, सूखा, चक्रवात या दूसरी आपदाओं से निपटने और उनके बाद दोबारा खड़े होने के लिए बराबर संसाधन भी नहीं हैं। यही असमानता क्लाइमेट जस्टिस का सबसे बड़ा मुद्दा है। विकसित देशों ने औद्योगिक विकास की शुरुआत काफी पहले की। कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के लंबे समय तक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में पहुंचीं। अमेरिका और यूरोपीय देशों का वैश्विक स्तर पर ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन में बड़ा योगदान रहा है। वहीं नेपाल, बांग्लादेश, कई अफ्रीकी देश और छोटे द्वीपीय देश ऐसे हैं, जिनका ऐतिहासिक उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से वे सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल हैं।

नेपाल क्यों बना क्लाइमेट जस्टिस का बड़ा उदाहरण?

नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने और पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक खतरों का जोखिम बढ़ रहा है। इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। बाढ़ और भूस्खलन से घर तबाह होते हैं, सड़कें और पुल टूटते हैं, किसानों की जमीन और फसलें नष्ट होती हैं और कई परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ता है। ऐसे में किसी आपदा का असर सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों की आजीविका, शिक्षा और पूरे जीवन पर पड़ता है। नेपाल की हालिया तबाही के बाद पुनर्निर्माण पर करीब 4 से 5 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। एक छोटे और विकासशील देश के लिए यह एक बड़ी आर्थिक चुनौती है।

“यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, जिम्मेदारी का सवाल है”

क्लाइमेट एक्सपर्ट हरजीत सिंह कहते हैं कि नेपाल की हालिया तबाही क्लाइमेट जस्टिस के सवाल को साफ तौर पर सामने लाती है। उनके मुताबिक, बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण हिमालयी क्षेत्रों में आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। नेपाल का ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है, लेकिन इसके बावजूद वह जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। उनका कहना हैं, “यही क्लाइमेट जस्टिस का मुद्दा है। जिन विकसित देशों का ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में सबसे ज्यादा योगदान रहा है, उनकी जिम्मेदारी है कि वे जलवायु परिवर्तन से प्रभावित विकासशील देशों को आर्थिक सहायता दें।” उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों का ऐतिहासिक उत्सर्जन काफी अधिक रहा है और ग्लोबल वार्मिंग के पीछे विकसित देशों की बड़ी भूमिका रही है। हालांकि वर्तमान उत्सर्जन के मामले में चीन, अमेरिका और भारत जैसे देश भी बड़े उत्सर्जकों में शामिल हैं।

क्लाइमेट एक्सपर्ट हरजीत सिंह
क्लाइमेट एक्सपर्ट हरजीत सिंह

विकसित और विकासशील देशों के बीच जिम्मेदारी की बहस

क्लाइमेट जस्टिस की बहस केवल इस बात पर नहीं है कि आज कौन कितना प्रदूषण फैला रहा है। इसमें यह भी देखा जाता है कि पिछले डेढ़ सौ से ज्यादा वर्षों में किस देश ने कितना उत्सर्जन किया। विकसित देशों ने अपने औद्योगिक विकास के दौरान बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल किया। वहीं आज विकासशील देशों को एक अलग चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे का विकास भी करना है और साथ ही जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों से भी निपटना है। यही वजह है कि नेपाल जैसे देशों का सवाल है कि अगर उन्होंने इस संकट को पैदा करने में बहुत कम योगदान दिया है, तो उन्हें बार-बार आपदाओं के बाद अपने सीमित संसाधनों से पुनर्निर्माण क्यों करना पड़ रहा है?

मदद नहीं, जिम्मेदारी और क्षतिपूर्ति की मांग

नेपाल की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने क्लाइमेट जस्टिस का मुद्दा जोर से उठाया है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने इस आपदा के बाद कहा कि नेपाल को मिलने वाले अंतरराष्ट्रीय सहयोग को केवल ‘ऐड’ या सहायता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। नेपाल का तर्क है कि जिस देश का जलवायु संकट पैदा करने में योगदान बेहद कम रहा है, उसे उसके कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए सिर्फ मदद पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। नेपाल ने इस मुद्दे को ‘जस्टिस’ और ‘कंपनसेशन’ यानी न्याय और क्षतिपूर्ति के तौर पर रखने की बात कही है। नेपाल का कहना है कि बड़े उत्सर्जक देशों की जिम्मेदारी बनती है कि वे जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों को नुकसान से उबरने में सहयोग दें। विदेश मंत्री ने इस संदर्भ में अमेरिका के साथ चीन और भारत जैसे बड़े वर्तमान उत्सर्जकों की जिम्मेदारी का सवाल भी उठाया है। उनका तर्क है कि जलवायु संकट से जूझ रहे देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को केवल दान या मानवीय सहायता के नजरिए से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और न्याय के सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल

कौन भरेगा नुकसान की कीमत?

क्लाइमेट जस्टिस की बहस यहीं से क्लाइमेट फाइनेंस और लॉस एंड डैमेज के मुद्दे तक पहुँचती है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकासशील देशों को दो स्तरों पर पैसे की जरूरत होती है। पहला, भविष्य की आपदाओं के खतरे को कम करने के लिए- जैसे मजबूत बुनियादी ढांचा, बेहतर चेतावनी प्रणाली और जलवायु के अनुकूल खेती। दूसरा, उन नुकसान की भरपाई के लिए जो पहले ही हो चुके हैं। इसी उद्देश्य से ‘फंड फॉर रिस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज’ बनाया गया है। इसका मकसद जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से जूझ रहे विकासशील देशों को आर्थिक सहायता देना है।

लेकिन जरूरत और उपलब्ध फंड के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। हरजीत सिंह के मुताबिक, विकासशील देशों को जलवायु आपदाओं से हर साल सैकड़ों अरब डॉलर के नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, जबकि लॉस एंड डैमेज फंड में उपलब्ध राशि इसकी तुलना में बेहद कम है। नेपाल की हालिया तबाही ही इस अंतर को समझने के लिए काफी है। जहां एक देश के पुनर्निर्माण के लिए ही 4 से 5 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है, वहीं दुनिया के तमाम प्रभावित विकासशील देशों की मदद के लिए बनाया गया फंड अब भी जरूरत के मुकाबले बेहद छोटा है।

मदद या मुआवजा?

नेपाल ने इस आपदा के बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत पर जोर दिया है। लेकिन क्लाइमेट जस्टिस से जुड़े लोगों का तर्क है कि इसे सिर्फ ‘मदद’ या ‘ऐड’ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। हरजीत सिंह कहते हैं कि जिन देशों का ऐतिहासिक उत्सर्जन ज्यादा रहा है, उनकी जिम्मेदारी भी ज्यादा होनी चाहिए। इसलिए जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों को दिया जाने वाला आर्थिक सहयोग केवल सहायता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और नुकसान की भरपाई के रूप में देखा जाना चाहिए।

नेपाल की तबाही केवल एक देश की आपदा नहीं है। यह उस असमानता की तस्वीर है, जो दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के साथ दिखाई दे रही है। एक तरफ वे देश हैं जिन्होंने दशकों तक औद्योगिक विकास के दौरान भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया। दूसरी तरफ नेपाल जैसे देश हैं, जिनका योगदान बेहद कम है, लेकिन उन्हें पिघलते ग्लेशियरों, बाढ़, भूस्खलन और बदलते मौसम की कीमत चुकानी पड़ रही है। क्लाइमेट जस्टिस का सवाल आखिरकार यही है, अगर किसी देश ने उस संकट को पैदा करने में बहुत कम योगदान दिया है, लेकिन उसे अपने लोगों, घरों और अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, तो उस नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए?
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