हर सुगंधित चावल को नहीं मिलेगा बासमती का दर्जा! सरकार करेगी 45 किस्मों की समीक्षा, पूसा 1121 जैसी किस्मों पर रहेगा ज़ोर

Gaon Connection | Jun 27, 2026, 14:37 IST
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केंद्र सरकार ने निर्यात के लिए मान्यता प्राप्त बासमती चावल की किस्मों की समीक्षा शुरू की है। उद्देश्य निर्यात योग्य किस्मों की सूची को बाज़ार की माँग के अनुरूप बनाना और पूसा बासमती 1121 जैसी लोकप्रिय किस्मों की वैश्विक पहचान को मज़बूत करना है। सरकार नामकरण व्यवस्था में बदलाव और स्वीकृत किस्मों की सूची को सरल बनाने पर भी विचार कर रही है।

बासमती की पहचान पर सख्ती!
बासमती की पहचान पर सख्ती!
केंद्र सरकार ने भारत से निर्यात होने वाले बासमती चावल की मान्यता प्राप्त किस्मों की समीक्षा शुरू कर दी है। इस पहल का उद्देश्य निर्यात के लिए मंज़ूर बासमती किस्मों की सूची को बाज़ार की माँग के अनुरूप बनाना और दुनिया भर में लोकप्रिय बासमती किस्मों की पहचान को और मज़बूत करना है। लंबे समय से चावल निर्यातक यह मांग कर रहे थे कि निर्यात योग्य बासमती किस्मों की मौजूदा सूची बहुत बड़ी है, जबकि विदेशी खरीदार केवल कुछ चुनिंदा और प्रसिद्ध किस्मों को ही पहचानते हैं। ऐसे में सूची को व्यावहारिक बनाने से भारतीय बासमती की वैश्विक ब्रांड पहचान को भी फायदा मिल सकता है।

फिलहाल भारत में 45 सुगंधित धान की किस्मों को बासमती के रूप में निर्यात की मंज़ूरी प्राप्त है। लेकिन समय के साथ वैज्ञानिकों ने कई पुरानी किस्मों में सुधार कर नई किस्में विकसित की हैं, जिन्हें नए नाम या कोड दिए गए। निर्यातकों का कहना है कि इससे विदेशी बाज़ार में भ्रम की स्थिति बनती है, क्योंकि खरीदार नई किस्मों के बजाय पूसा बासमती 1121 जैसी स्थापित किस्मों के नाम से ही परिचित हैं। इसी कारण केंद्र सरकार अब नामकरण और स्वीकृत किस्मों की सूची की समीक्षा कर रही है।

बासमती किस्मों की सूची की होगी समीक्षा

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), कृषि निर्यात संवर्धन संस्था एपीडा और बासमती निर्यातकों के बीच इस विषय पर चर्चा हुई। अभी तक कोई अंतिम फ़ैसला नहीं लिया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) बासमती किस्मों के नामकरण और उनकी सूची की दोबारा समीक्षा करने पर सहमत है।

क्यों उठी सूची घटाने की मांग?

निर्यातकों का कहना है कि वर्तमान में निर्यात के लिए स्वीकृत 45 किस्मों की सूची बहुत लंबी है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में केवल कुछ चुनिंदा किस्मों की ही सबसे अधिक माँग रहती है। ऐसे में यदि सूची को बाज़ार की ज़रूरत के अनुसार व्यवस्थित किया जाए तो भारतीय बासमती की ब्रांड पहचान और मज़बूत हो सकती है।

पूसा बासमती 1121 का नाम सबसे आगे

पूसा बासमती 1121 दुनिया की सबसे लोकप्रिय बासमती किस्मों में शामिल है। वर्ष 2005 में जारी की गई इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पकने के बाद इसके चावल की लंबाई लगभग 22 मिलीमीटर तक पहुँच जाती है, जबकि बासमती की श्रेणी में शामिल होने के लिए पकने के बाद न्यूनतम लंबाई 12 मिलीमीटर होना आवश्यक है। निर्यातकों का कहना है कि पूसा बासमती 1121 ने भारतीय बासमती को दुनिया भर में नई पहचान दिलाई है। यही वजह है कि पाकिस्तान भी अपने सुगंधित चावल को 1121 नाम से बेचता है।

नई किस्मों के नाम से बढ़ता है भ्रम

वैज्ञानिक जब किसी लोकप्रिय बासमती किस्म में सुधार कर नई किस्म विकसित करते हैं, तो उसे नया नाम या कोड दे दिया जाता है। निर्यातकों का मानना है कि इससे विदेशी खरीदारों के बीच भ्रम पैदा होता है, क्योंकि वे पहले से स्थापित नामों को ही जानते हैं। उनका सुझाव है कि नई और बेहतर किस्मों को मूल लोकप्रिय किस्म के नाम से जोड़कर पेश किया जाए, ताकि बाज़ार में उनकी पहचान बनी रहे।

50 हज़ार करोड़ रुपये के पार पहुँचा बासमती निर्यात

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विजय सेतिया ने कहा कि पूसा बासमती 1121 ने भारत के बासमती निर्यात को वर्ष 2004-05 के लगभग 3,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर वर्ष 2025-26 में 50,000 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि यदि नई उन्नत किस्मों के नामों को मूल सफल किस्मों के साथ जोड़ा जाता है, तो इससे निर्यात को और मजबूती मिल सकती है।

नई व्यवस्था पर भी हो रहा विचार

व्यापार नीति विशेषज्ञ एस. चंद्रशेखरन ने सुझाव दिया है कि बासमती जैसी भौगोलिक संकेतक (जीआई) वाली फसल के लिए स्थायी सूची के बजाय एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जिसमें प्रमुख किस्मों को अलग पहचान मिले और उन्नत, पारंपरिक, प्रयोगात्मक तथा बंद की जा चुकी किस्मों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाए। उनका मानना है कि इससे बासमती की वैश्विक पहचान बनाए रखने में मदद मिलेगी और बाज़ार की बदलती ज़रूरतों के अनुसार किस्मों का प्रबंधन भी आसान होगा।
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