जनता ज़रूर सोचेगी! क्या इसीलिए सांसद बनाया था?
Dr SB Misra | Aug 08, 2026, 12:53 IST
यह टिप्पणी संसद में बार-बार होने वाले हंगामे और काम ठप होने की आलोचना करती है। इसमें बताया गया है कि कैसे राजनीतिक खींचतान और नारेबाजी के कारण जनता- विशेषकर ग्रामीण आबादी और किसानों से जुड़े मुख्य मुद्दों की अनदेखी हो रही है। यह आलेख वर्तमान संसदीय व्यवहार और आंदोलनों की तुलना अतीत के छात्र आंदोलनों, आपातकाल के दौर और स्वतंत्रता के बाद के दिग्गज नेताओं के उत्कृष्ट संसदीय भाषणों से करता है। हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और राजनीतिक मांगों के पीछे की मंशा पर सवाल उठाते हुए, यह इस बात पर ज़ोर देता है कि वास्तविक समस्याओं का समाधान केवल मंत्री या अधिकारी बदलने से नहीं, बल्कि सार्थक चर्चा और व्यवस्था परिवर्तन से ही संभव है, जिसका अंतिम निर्णय देश के परिपक्व मतदाताओं को ही करना है।
संसद में हंगामा या जनहित की बात?
संसद का मानसून सत्र समाप्त होने को आ रहा है लेकिन सारे सत्र में काम कितना हुआ, यह हो-हल्ला करने वाले सांसद बता सकते हैं। देश की आबादी में 70% संख्या गाँव वालों की है और दिन-ब-दिन की समस्याएँ भी उन्हीं की सबसे ज़्यादा होती हैं। इन गाँव वालों ने बड़ी उम्मीद के साथ अपने प्रतिनिधियों को संसद में भेजा था और सोचा था उनकी समस्याओं का समाधान, उससे संबंधित नियम-कानून बनेंगे; लेकिन वहाँ संसद में यही सुनाई पड़ा "नहीं चलेगी, नहीं चलेगी"। पता नहीं क्या नहीं चलेगा, शायद सांसद "नहीं चलेगी" कह रहे होंगे।
गाँव के अशिक्षित और अर्ध-शिक्षित ग्रामीणों ने भी यह सोचा होगा कि सांसदों द्वारा शिष्ट भाषा में चर्चा की जाएगी, लेकिन वहाँ तो गाँवों की तरह तू-तू मैँ-मैँ हो रही है। टीवी पर संसद की कार्यवाही देखकर उन सभी को बेहद निराशा हुई होगी कि संसद में काम की बातें करने के बजाय अभद्र और अशिष्ट नारे लग रहे हैं। ऐसा लगता है कि संसद बाधित करने वाला रोग विधानसभाओं को भी लग रहा है। आश्चर्य की बात है कि शोर-शराबा करने वाले सांसद और विधायक एक ही दलों से संबंध रखते हैं। मुझे मालूम नहीं कि वोटरों ने अपने प्रतिनिधियों के बारे में भविष्य के लिए क्या सोचा होगा।
इसी बीच कॉकरोच छात्रों का जमावड़ा दिल्ली में इकट्ठा हुआ जिसका एक ही उद्देश्य था कि शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र होना चाहिए; मानो त्यागपत्र से सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी और जैसे नए अधिकारी आएँगे तो सब काम बढ़िया हो जाएगा। उनकी जो भी सोच हो, त्यागपत्र तो हो गया लेकिन व्यवस्था न सुधरने वाली थी, ना अभी तक सुधरी है। उसे सुधारने का काम सत्ता पक्ष को करना है, जिसे काम करने दिया जाएगा तो ज़रूर करेगा, ऐसी आशा है। कॉकरोच पार्टी के नाम से इकट्ठा की गई भीड़ के बारे में भी कई सवाल दिमाग़ में आते हैं कि क्या छात्र-छात्राएँ पुलिस पर पत्थर मारेंगे और 100 से अधिक पुलिसकर्मियों को घायल कर देंगे? अथवा क्या भले घरों से आए हुए छात्र-छात्राएँ माँ-बहन की गालियाँ बकेंगे और प्रधानमंत्री तक को नहीं छोड़ेंगे? यदि यह छात्र-छात्राओं का आंदोलन था तो इसमें छात्र नेता कहाँ हैं? राजनेता तो दिखाई पड़े बड़ी संख्या में, लेकिन छात्र संगठनों के कोई नेता मौजूद नहीं थे। जाने-माने छात्र संगठन, फिर चाहे एनएसयूआई हो जो कांग्रेस से संबद्ध है या एबीवीपी हो जो भारतीय जनता पार्टी से प्रेरित है अथवा अन्य दलों से जुड़े छात्र संगठनों से जुड़े नेता हों, दिखाई नहीं पड़े। यह कहना भी संभव नहीं होगा कि किन शिक्षण संस्थानों से जुड़े हुए थे छात्र-छात्राओं के समूह और जो नाबालिग छोटे-छोटे छात्र-छात्राएँ थे, उनका पेपर लीक से संबंध था अथवा नहीं था।
अब से पहले कभी भी छात्र-छात्राओं के आंदोलन में संसद पर हमला नहीं बोला गया, संसद तक पहुँचने का प्रयास नहीं किया गया; लेकिन इस बार ऐसा क्या नया था और वहाँ पहुँचकर क्या करने का इरादा था, यह पता नहीं। इतना ही नहीं, छात्र-छात्राओं ने तो अपने को संसद भवन के इर्द-गिर्द ही सीमित रखा, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने प्रधानमंत्री आवास पर धावा बोल दिया, बिना किसी सूचना के, बिना किसी आज्ञा के। मालूम नहीं उनका भी इरादा क्या था, उद्देश्य क्या था। प्रधानमंत्री छात्र-छात्राओं की समस्या का समाधान तो खोज सकते थे, लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं की समस्या का समाधान खोजने का न तो अवसर था, न उन्होंने ऐसी इच्छा ज़ाहिर की।
आज़ाद भारत में छात्र आंदोलन होते रहे हैं, कभी शांतिपूर्ण तो कभी उग्र आंदोलन। वर्ष 1957 में लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों का आंदोलन हुआ था, तब चंद्रभानु गुप्ता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और जुगल किशोर शिक्षा मंत्री थे। आंदोलन थोड़ा उग्र हो गया था। यह तो याद नहीं कि किस बात पर गोली चली थी, लेकिन एक छात्र गयंदर नाम का था जो शहीद हो गया था। उसकी मूर्ति लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के प्रांगण में लगाई गई थी, शायद अभी भी लगी हो। उस समय गोली चलने के कारण और परिस्थितियाँ पता नहीं, लेकिन कॉकरोच छात्रों पर गोली पुलिस वालों ने आत्मरक्षा के लिए चलाई थी। गोली चलाने का आदेश गृह मंत्री अथवा प्रधानमंत्री ने दिया था, यह जाँच रिपोर्ट के बाद पता चलेगा।
कहा जाता है कि ट्रक भर पत्थर वहाँ पर मौजूद थे और पुलिस पर पत्थर चलाए भी गए थे। 100 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए और बड़ी संख्या में अस्पताल में भर्ती हुए। इसके साथ ही कुछ छात्र-छात्राएँ भी घायल हुए। इन हिंसात्मक घटनाओं के कारण स्पष्ट नहीं हैं। आशा की जानी चाहिए कि एक दिन सारे प्रकरण की जाँच का नतीजा सामने आएगा और इस बात का सत्यापन होगा कि उस भीड़ में कितने प्रतिशत अवांछित तत्व घुस आए थे, जैसा कुछ लोगों द्वारा कहा जा रहा है; और छात्रों को उत्तेजित करने में इन उग्र लोगों की कितनी भूमिका थी, यह भी जाँच के बाद ही सामने आ सकता है।
कुछ लोग नौजवानों के इस आंदोलन की तुलना नेपाल के ज़ेन-जी (Gen Z) आंदोलन अथवा बांग्लादेश के नौजवानों के आंदोलन से करते हैं। इन लोगों को ध्यान में रखना चाहिए कि नेपाल, बांग्लादेश और दूसरे स्थानों पर ऐसे आंदोलनों का अंततः परिणाम क्या हुआ है और क्या यह परिणाम सुखद रहा है? यह संभव है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए किया हो, क्योंकि किसी मंत्री का त्यागपत्र कोई महान लक्ष्य नहीं है। जो भी हो, इस आंदोलन के बारे में इतना तो कहा जा सकता है कि कॉकरोच पार्टी के नेताओं की अपेक्षा अन्य राजनीतिक दलों के नेता अधिक सक्रिय दिखाई पड़ रहे थे और प्रतीत होता था कि वे ही इस आंदोलन के संचालक मंडल के भाग हैं। प्रधानमंत्री के घर के पास राजनेता खुलकर आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में लेते हुए देखे गए। राजनेताओं ने अपनी पार्टी से जुड़े छात्र संगठनों का नेतृत्व तो अधिकतर छात्रों और अध्यापकों के हाथ में दे रखा है, लेकिन यहाँ कॉकरोच पार्टी पैदा होते ही राजनेताओं के नियंत्रण में आ गई, ऐसा लगता है।
कहते हैं संसद चलाने में एक दिन में करोड़ों रुपया ख़र्च होता है और जब लगातार पूरे सत्र संसद नहीं चली, तो कितना रुपया बर्बाद हुआ और यह किसका रुपया है, इसका जवाब शायद ही किसी के पास होगा। किसी भी राष्ट्रीय समस्या का समाधान संसद के अलावा और कैसे निकलेगा? जब सत्ता पक्ष समस्या के समाधान के लिए नियम बनाने को तत्पर हो, तब असंतोष का एक ही कारण हो सकता है कि वे नियम पर्याप्त नहीं हैं या उनमें सुधार की ज़रूरत है। यह काम चर्चा के द्वारा ही संभव है; और चर्चा करेंगे नहीं और करेंगे तो विषय से हटकर भाषण देने जैसा कार्य करेंगे, तब समस्या का समाधान कैसे होगा?
कुछ लोग वर्तमान कॉकरोच पार्टी के आंदोलन को जेपी आंदोलन जैसा मानते हैं, लेकिन इन दोनों में कोई समानता नहीं है। आज जेपी जैसा व्यक्तित्व राजनीतिक पटल पर ढूँढ़ने से नहीं मिलेगा और दूसरी बात, वर्तमान आंदोलन छात्रों का है ऐसा कहा जाता है, लेकिन जेपी आंदोलन जन-आंदोलन था। वर्तमान आंदोलन शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र के लिए आरंभ किया गया था, जबकि जेपी आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए था और इसीलिए उसे 'संपूर्ण क्रांति' का नाम दिया गया था। दूसरा और इससे कहीं बड़ा अंतर यह है कि उस समय विपक्ष में अनेक मूर्धन्य नेता मौजूद थे- अटल बिहारी वाजपेयी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, मधु दंडवते और इस तरह न जाने कितने दिग्गज नेता मौजूद थे, जिनके भाषण तेजस्वी और प्रभावी होते थे और कई बार सत्ता पक्ष के पास उनका उत्तर नहीं होता था। आज ऐसा कुछ नहीं है। आज कई लोग कहते हैं कि संविधान का गला घोंटा जा रहा है। जिज्ञासा का विषय है कि वर्तमान आंदोलनकारी आंदोलन शांत करने के लिए क्या उन्हीं उपायों को उचित समझते हैं जो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनाए थे? शायद उन्होंने यह देखा और समझा नहीं होगा कि इंदिरा जी ने संविधान में क्या और कितना परिवर्तन किया था। यदि उस परिवर्तन को जनता पार्टी द्वारा निरस्त न किया गया होता, तो आज के नेता सड़कों पर और संसद में इस तरह अशिष्ट आलोचनाएँ और शोर-शराबा नहीं कर पाते। लाखों विपक्षी नेता उस समय जेल में थे और यदि वह व्यवस्था आज होती, तो यह सभी लोग जेल में पड़े होते। यदि आज के बड़बोले नेताओं ने वह जमाना देखा होता जब संविधान की प्रस्तावना तक में परिवर्तन किया गया था, जब अदालत के फैसले को किनारे डाल दिया गया, न्यायपालिका और सेना तक में हस्तक्षेप किया गया और कोई 'छूँ' तक नहीं कर सकता था, मैं नहीं समझता यदि आज के नेताओं ने उस समय के शासन को देखा और समझा होता तो वर्तमान व्यवस्था की इतनी आलोचना करते।
आजकल देश में प्रकृति का क़हर मचा है। बड़े भाग में भयंकर बाढ़ और जलभराव की समस्या है, तो पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और दूसरे स्थानों पर सड़कें, पुल और बाँध का टूटना; जिससे जनता को परेशानी हो रही है। इतना ही नहीं, ग्रामीण किसानों को खरीफ़ की बोआई के समय खाद-बीज की समस्याएँ झेलनी पड़ रही हैं। संसद में इन सभी सवालों को चाहे ध्यानाकर्षण अथवा शून्यकाल या अन्य किसी कार्यक्रम के अंतर्गत उठाया जा सकता था, लेकिन माननीय सदस्यों में से बहुतों ने शोर-शराबे को प्राथमिकता देते हुए नारे लगाते रहे "नहीं चलेगी, नहीं चलेगी"। और इतना ही नहीं, पहले तो शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र और बाद में गृह मंत्री का त्यागपत्र और प्रधानमंत्री द्वारा माफ़ी माँगा जाना, ऐसे सवालों को किसानों की समस्या से ज़्यादा महत्वपूर्ण समझा गया। पुराने समय में मैं अखबारों में पढ़ता और सुनता था लोगों से कि संसद में कौन-कौन से लोग जनता की आवाज बनकर उनके सवालों को मुखर ढंग से प्रस्तुत करते हैं। एक बार सरकार के किसी मंत्री ने अपने अधिकारियों से कहा था कि भूपेश गुप्त के सवालों को हल्के में मत लिया करो, गंभीरता से उनके उत्तर तैयार करो- हम जानते हैं कि भूपेश जी कम्युनिस्ट पार्टी के अच्छे प्रवक्ता, अच्छे नेता थे। इसी प्रकार एक बार अटल जी ने सरकार की आलोचना करते हुए एक-एक बिंदु को लेकर सरकार को निरुत्तर जैसा कर दिया था। सदन के बाद नेहरू जी से जब उनकी भेंट हो गई तो नेहरू जी ने उनसे कहा था, "बहुत अच्छा बोले।" इसी तरह सदन में ऐसे दिग्गजों में डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, मधु दंडवते, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और न जाने कितने विपक्ष में बैठने वाले नेता हुआ करते थे, जिनके तीखे सवालों का जवाब देना सरकार को बहुत आसान नहीं पड़ता था। आज जब सदन ठप कर दिया जाएगा तो किसके सवाल और किसके उत्तर?
शायद अब समय आ गया है कि वोटर को सोचना होगा कि उसे संसद ठप करने वाले प्रतिनिधि चाहिए अथवा जनता की आवाज़ बुलंद करने वाले। जनप्रतिनिधियों को यह सोचना होगा कि वे सचमुच जनकल्याण के काम करना चाहते हैं तो मंत्री या अधिकारी बदलने से काम बनेगा अथवा व्यवस्था बदलने से। समय बताएगा कि जनता क्या सोचती है और क्या निर्णय लेती है। मैं समझता हूँ 78 साल के बाद देश की जनता काफी परिपक्व हो गई है क्योंकि संसद का तमाशा पंचायत घर में टीवी पर आम आदमी ने भी देखा है। आशा है देशहित में सोचने और काम करने का वातावरण बनेगा, यह केवल आशा की जा सकती है।
गाँव के अशिक्षित और अर्ध-शिक्षित ग्रामीणों ने भी यह सोचा होगा कि सांसदों द्वारा शिष्ट भाषा में चर्चा की जाएगी, लेकिन वहाँ तो गाँवों की तरह तू-तू मैँ-मैँ हो रही है। टीवी पर संसद की कार्यवाही देखकर उन सभी को बेहद निराशा हुई होगी कि संसद में काम की बातें करने के बजाय अभद्र और अशिष्ट नारे लग रहे हैं। ऐसा लगता है कि संसद बाधित करने वाला रोग विधानसभाओं को भी लग रहा है। आश्चर्य की बात है कि शोर-शराबा करने वाले सांसद और विधायक एक ही दलों से संबंध रखते हैं। मुझे मालूम नहीं कि वोटरों ने अपने प्रतिनिधियों के बारे में भविष्य के लिए क्या सोचा होगा।
संसद से लेकर पीएम आवास तक: आंदोलन का दायरा और नीयत पर सवाल
अब से पहले कभी भी छात्र-छात्राओं के आंदोलन में संसद पर हमला नहीं बोला गया, संसद तक पहुँचने का प्रयास नहीं किया गया; लेकिन इस बार ऐसा क्या नया था और वहाँ पहुँचकर क्या करने का इरादा था, यह पता नहीं। इतना ही नहीं, छात्र-छात्राओं ने तो अपने को संसद भवन के इर्द-गिर्द ही सीमित रखा, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने प्रधानमंत्री आवास पर धावा बोल दिया, बिना किसी सूचना के, बिना किसी आज्ञा के। मालूम नहीं उनका भी इरादा क्या था, उद्देश्य क्या था। प्रधानमंत्री छात्र-छात्राओं की समस्या का समाधान तो खोज सकते थे, लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं की समस्या का समाधान खोजने का न तो अवसर था, न उन्होंने ऐसी इच्छा ज़ाहिर की।
आज़ाद भारत में छात्र आंदोलन होते रहे हैं, कभी शांतिपूर्ण तो कभी उग्र आंदोलन। वर्ष 1957 में लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों का आंदोलन हुआ था, तब चंद्रभानु गुप्ता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और जुगल किशोर शिक्षा मंत्री थे। आंदोलन थोड़ा उग्र हो गया था। यह तो याद नहीं कि किस बात पर गोली चली थी, लेकिन एक छात्र गयंदर नाम का था जो शहीद हो गया था। उसकी मूर्ति लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के प्रांगण में लगाई गई थी, शायद अभी भी लगी हो। उस समय गोली चलने के कारण और परिस्थितियाँ पता नहीं, लेकिन कॉकरोच छात्रों पर गोली पुलिस वालों ने आत्मरक्षा के लिए चलाई थी। गोली चलाने का आदेश गृह मंत्री अथवा प्रधानमंत्री ने दिया था, यह जाँच रिपोर्ट के बाद पता चलेगा।
आंदोलनों की दिशा और विदेशी मॉडल से तुलना: क्या शक्ति प्रदर्शन ही लक्ष्य है?
कुछ लोग नौजवानों के इस आंदोलन की तुलना नेपाल के ज़ेन-जी (Gen Z) आंदोलन अथवा बांग्लादेश के नौजवानों के आंदोलन से करते हैं। इन लोगों को ध्यान में रखना चाहिए कि नेपाल, बांग्लादेश और दूसरे स्थानों पर ऐसे आंदोलनों का अंततः परिणाम क्या हुआ है और क्या यह परिणाम सुखद रहा है? यह संभव है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए किया हो, क्योंकि किसी मंत्री का त्यागपत्र कोई महान लक्ष्य नहीं है। जो भी हो, इस आंदोलन के बारे में इतना तो कहा जा सकता है कि कॉकरोच पार्टी के नेताओं की अपेक्षा अन्य राजनीतिक दलों के नेता अधिक सक्रिय दिखाई पड़ रहे थे और प्रतीत होता था कि वे ही इस आंदोलन के संचालक मंडल के भाग हैं। प्रधानमंत्री के घर के पास राजनेता खुलकर आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में लेते हुए देखे गए। राजनेताओं ने अपनी पार्टी से जुड़े छात्र संगठनों का नेतृत्व तो अधिकतर छात्रों और अध्यापकों के हाथ में दे रखा है, लेकिन यहाँ कॉकरोच पार्टी पैदा होते ही राजनेताओं के नियंत्रण में आ गई, ऐसा लगता है।
आपातकाल का दौर और आज की राजनीति: इतिहास से सबक सीखने की ज़रूरत
कुछ लोग वर्तमान कॉकरोच पार्टी के आंदोलन को जेपी आंदोलन जैसा मानते हैं, लेकिन इन दोनों में कोई समानता नहीं है। आज जेपी जैसा व्यक्तित्व राजनीतिक पटल पर ढूँढ़ने से नहीं मिलेगा और दूसरी बात, वर्तमान आंदोलन छात्रों का है ऐसा कहा जाता है, लेकिन जेपी आंदोलन जन-आंदोलन था। वर्तमान आंदोलन शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र के लिए आरंभ किया गया था, जबकि जेपी आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए था और इसीलिए उसे 'संपूर्ण क्रांति' का नाम दिया गया था। दूसरा और इससे कहीं बड़ा अंतर यह है कि उस समय विपक्ष में अनेक मूर्धन्य नेता मौजूद थे- अटल बिहारी वाजपेयी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, मधु दंडवते और इस तरह न जाने कितने दिग्गज नेता मौजूद थे, जिनके भाषण तेजस्वी और प्रभावी होते थे और कई बार सत्ता पक्ष के पास उनका उत्तर नहीं होता था। आज ऐसा कुछ नहीं है। आज कई लोग कहते हैं कि संविधान का गला घोंटा जा रहा है। जिज्ञासा का विषय है कि वर्तमान आंदोलनकारी आंदोलन शांत करने के लिए क्या उन्हीं उपायों को उचित समझते हैं जो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनाए थे? शायद उन्होंने यह देखा और समझा नहीं होगा कि इंदिरा जी ने संविधान में क्या और कितना परिवर्तन किया था। यदि उस परिवर्तन को जनता पार्टी द्वारा निरस्त न किया गया होता, तो आज के नेता सड़कों पर और संसद में इस तरह अशिष्ट आलोचनाएँ और शोर-शराबा नहीं कर पाते। लाखों विपक्षी नेता उस समय जेल में थे और यदि वह व्यवस्था आज होती, तो यह सभी लोग जेल में पड़े होते। यदि आज के बड़बोले नेताओं ने वह जमाना देखा होता जब संविधान की प्रस्तावना तक में परिवर्तन किया गया था, जब अदालत के फैसले को किनारे डाल दिया गया, न्यायपालिका और सेना तक में हस्तक्षेप किया गया और कोई 'छूँ' तक नहीं कर सकता था, मैं नहीं समझता यदि आज के नेताओं ने उस समय के शासन को देखा और समझा होता तो वर्तमान व्यवस्था की इतनी आलोचना करते।
आजकल देश में प्रकृति का क़हर मचा है। बड़े भाग में भयंकर बाढ़ और जलभराव की समस्या है, तो पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और दूसरे स्थानों पर सड़कें, पुल और बाँध का टूटना; जिससे जनता को परेशानी हो रही है। इतना ही नहीं, ग्रामीण किसानों को खरीफ़ की बोआई के समय खाद-बीज की समस्याएँ झेलनी पड़ रही हैं। संसद में इन सभी सवालों को चाहे ध्यानाकर्षण अथवा शून्यकाल या अन्य किसी कार्यक्रम के अंतर्गत उठाया जा सकता था, लेकिन माननीय सदस्यों में से बहुतों ने शोर-शराबे को प्राथमिकता देते हुए नारे लगाते रहे "नहीं चलेगी, नहीं चलेगी"। और इतना ही नहीं, पहले तो शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र और बाद में गृह मंत्री का त्यागपत्र और प्रधानमंत्री द्वारा माफ़ी माँगा जाना, ऐसे सवालों को किसानों की समस्या से ज़्यादा महत्वपूर्ण समझा गया। पुराने समय में मैं अखबारों में पढ़ता और सुनता था लोगों से कि संसद में कौन-कौन से लोग जनता की आवाज बनकर उनके सवालों को मुखर ढंग से प्रस्तुत करते हैं। एक बार सरकार के किसी मंत्री ने अपने अधिकारियों से कहा था कि भूपेश गुप्त के सवालों को हल्के में मत लिया करो, गंभीरता से उनके उत्तर तैयार करो- हम जानते हैं कि भूपेश जी कम्युनिस्ट पार्टी के अच्छे प्रवक्ता, अच्छे नेता थे। इसी प्रकार एक बार अटल जी ने सरकार की आलोचना करते हुए एक-एक बिंदु को लेकर सरकार को निरुत्तर जैसा कर दिया था। सदन के बाद नेहरू जी से जब उनकी भेंट हो गई तो नेहरू जी ने उनसे कहा था, "बहुत अच्छा बोले।" इसी तरह सदन में ऐसे दिग्गजों में डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, मधु दंडवते, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और न जाने कितने विपक्ष में बैठने वाले नेता हुआ करते थे, जिनके तीखे सवालों का जवाब देना सरकार को बहुत आसान नहीं पड़ता था। आज जब सदन ठप कर दिया जाएगा तो किसके सवाल और किसके उत्तर?
शायद अब समय आ गया है कि वोटर को सोचना होगा कि उसे संसद ठप करने वाले प्रतिनिधि चाहिए अथवा जनता की आवाज़ बुलंद करने वाले। जनप्रतिनिधियों को यह सोचना होगा कि वे सचमुच जनकल्याण के काम करना चाहते हैं तो मंत्री या अधिकारी बदलने से काम बनेगा अथवा व्यवस्था बदलने से। समय बताएगा कि जनता क्या सोचती है और क्या निर्णय लेती है। मैं समझता हूँ 78 साल के बाद देश की जनता काफी परिपक्व हो गई है क्योंकि संसद का तमाशा पंचायत घर में टीवी पर आम आदमी ने भी देखा है। आशा है देशहित में सोचने और काम करने का वातावरण बनेगा, यह केवल आशा की जा सकती है।