Pesticide Residue: फलों-सब्जियों में कीटनाशक का खतरा, 70 हजार सैंपल की जाँच में 3.1% सैंपल फेल
Mansi | Aug 12, 2026, 13:52 IST
सरकार फलों और सब्ज़ियों में कीटनाशक अवशेषों की लगातार निगरानी कर रही है। पिछले तीन वर्षों में 3.1 % नमूनों में कीटनाशक तय सीमा से अधिक पाए गए। फसल सर्वे में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है, जिससे आँकड़े सटीक मिल रहे हैं। भारत फलों और सब्ज़ियों का नेट एक्सपोर्टर बना हुआ है, जबकि खाद्य तेल उत्पादन पर भी ज़ोर है।
फलों-सब्जियों की जाँच में 3.1% सैंपल फेल
देश में फल और सब्ज़ियों की गुणवत्ता को लेकर सरकार की निगरानी लगातार जारी है। लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों के दौरान जाँचे गए फलों और सब्ज़ियों के करीब 3.1% नमूनों में कीटनाशक अवशेष तय सीमा से अधिक पाए गए। इन नमूनों में FSSAI की ओर से निर्धारित ,मैक्सिमम रेसिदुए लिमिट (MRL)से ज्यादा मात्रा में कीटनाशक अवशेष मिले।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को लोकसभा में लिखित जवाब में यह जानकारी दी। सरकार के मुताबिक, इस निगरानी का मक़सद कृषि उत्पादों में कीटनाशक अवशेष की स्थिति पर नज़र रखना और सुरक्षित कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है।
सरकार ने बताया कि वर्ष 2023 से 2026 के बीच 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से फलों और सब्ज़ियों के कुल 70,652 नमूने लिए गए। इनकी जाँच ‘ मॉनिटरिंग ऑफ पेस्टिसाइड रेजिड्यूज़ एट नेशनल लेवल’ (MPRNL) परियोजना के तहत की गई। जाँच के दौरान 2,223 नमूनों में कीटनाशक अवशेष FSSAI की निर्धारित सीमा से अधिक पाए गए। यह कुल जाँचे गए नमूनों का लगभग 3.1% है। निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए नमूने लेते समय उनकी लोकेशन से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाती है। प्रयोगशालाओं में जीपीएस लोकेशन रिकॉर्ड की जाती है। वहीं, खेत से सीधे लिए गए नमूनों के साथ उस क्षेत्र और फसल के उत्पादन से संबंधित जानकारी भी दर्ज की जाती है।
कीटनाशक अवशेषों की निगरानी के लिए एमपीआरएनएल परियोजना वर्ष 2005-06 से चल रही है। इसके तहत 22 राज्यों में 40 प्रयोगशालाएँ काम कर रही हैं। सरकार ने इस परियोजना को 2028-29 तक जारी रखने की मंज़ूरी दी है। इसके अलावा 21 राज्यों ने अपने स्तर पर समितियाँ बनाई हैं। इन समितियों के ज़रिए कीटनाशक अवशेष की निगरानी के साथ किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) के बारे में प्रोत्साहित किया जा रहा है।
लोकसभा में कृषि क्षेत्र से जुड़ी एक और जानकारी सामने आई। कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि सरकार ने ड्राफ्ट शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 2026 को वापस ले लिया है। यह ड्राफ्ट 20 अप्रैल 2026 को जारी किया गया था। इसके बाद राज्यों और संबंधित पक्षों से सुझाव माँगे गए थे। मिले सुझावों पर दोबारा विचार करने के बाद सरकार ने 29 मई 2026 को ड्राफ्ट वापस लेने का फैसला किया।
सरकार फसल उत्पादन का अनुमान लगाने की प्रक्रिया को भी डिजिटल बनाने पर काम कर रही है।डिजिटल जनरल क्रॉप एस्टिमेशन सर्वे (DGCES) की शुरुआत खरीफ 2023-24 में 10 राज्यों के कुछ जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर की गई थी। पायलट के बाद इसे रबी 2023-24 में 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। फिलहाल यह व्यवस्था 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है।
इस डिजिटल सर्वे में मोबाइल ऐप के माध्यम से रियल टाइम जानकारी जुटाई जाती है। जीपीएस आधारित जियो-टैगिंग, टाइम-स्टैंप, तस्वीरों के जरिए रिकॉर्ड और ऑनलाइन निगरानी जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार के अनुसार, इससे फसल उत्पादन से जुड़े आँकड़ों को ज्यादा सटीक, पारदर्शी और समय पर उपलब्ध कराने में मदद मिली है।
सरकार के अनुसार, भारत फलों और सब्ज़ियों के मामले में लगातार नेट एक्सपोर्टर बना हुआ है। वर्ष 2016-17 में इनका निर्यात 2.45 अरब डॉलर का था, जो 2025-26 में बढ़कर 3.93 अरब डॉलर हो गया। इस दौरान निर्यात की मात्रा भी 4.95 मिलियन टन से बढ़कर 5.82 मिलियन टन हुई। हालाँकि, घरेलू खपत बढ़ने के साथ आयात में भी इज़ाफ़ा हुआ है। फलों और सब्ज़ियों का आयात 2016-17 के 1.78 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 3.82 अरब डॉलर हो गया। मात्रा के लिहाज़ से भी आयात 1.12 मिलियन टन से बढ़कर 2.07 मिलियन टन तक पहुँच गया।
देश में खाद्य तेल का उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स (NMEO) के तहत अलग-अलग योजनाएँ चला रही है। इनमें एनएमईओ-ऑयल पाम और एनएमईओ-ऑयलसीड्स शामिल हैं। एनएमईओ-ऑयल पाम की शुरुआत 2021-22 में हुई थी। इसके तहत 2021-22 से 2025-26 के बीच 6.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती का लक्ष्य रखा गया था। सरकार के मुताबिक, अब तक 2.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम लगाया जा चुका है। ऑयल पाम को पूरी तरह उत्पादन देने में करीब 4 से 5 साल लगते हैं। इसलिए अभी इस योजना के तहत लगाए गए अधिकांश पौधे अपनी पूरी उत्पादन क्षमता तक नहीं पहुँचे हैं। 2021-22 से 2025-26 के बीच देश में 20.10 लाख टन क्रूड पाम ऑयल का उत्पादन हुआ।
प्राकृतिक रबर को लेकर भी सरकार ने आँकड़े साझा किए। वर्ष 2025-26 में देश में 9.05 लाख टन प्राकृतिक रबर का उत्पादन हुआ, जबकि 4.59 लाख टन रबर का आयात किया गया। वित्त वर्ष 2026-27 में जून तक के शुरुआती आँकड़ों के अनुसार, 1.49 लाख टन प्राकृतिक रबर का उत्पादन हुआ और 1.14 लाख टन का आयात किया गया। सरकार के मुताबिक, प्राकृतिक रबर की कीमत मुख्य रूप से मांग और आपूर्ति से प्रभावित होती है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमतों का असर भी घरेलू बाज़ार पर पड़ता है। केरल के कोट्टायम में RSS-4 ग्रेड प्राकृतिक रबर की औसत कीमत अप्रैल से जून 2026-27 के दौरान 253.21 रुपये प्रति किलो रही, जबकि 2025-26 में यह 197.32 रुपये प्रति किलो थी।
लोकसभा में सामने आई इन जानकारियों से कृषि क्षेत्र में सरकार की कई प्राथमिकताएँ दिखाई देती हैं। एक ओर फलों और सब्ज़ियों में कीटनाशक अवशेष की जाँच और निगरानी की जा रही है, तो दूसरी ओर डिजिटल तकनीक के ज़रिए फसल उत्पादन का अनुमान लगाने की व्यवस्था को बेहतर बनाया जा रहा है। इसके साथ ही खाद्य तेल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने, कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने और किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों से जोड़ने पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। कीटनाशक अवशेष से जुड़े आँकड़े यह भी बताते हैं कि सुरक्षित कृषि पद्धतियों और कीटनाशकों के सही इस्तेमाल पर लगातार ध्यान देना ज़रूरी है।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को लोकसभा में लिखित जवाब में यह जानकारी दी। सरकार के मुताबिक, इस निगरानी का मक़सद कृषि उत्पादों में कीटनाशक अवशेष की स्थिति पर नज़र रखना और सुरक्षित कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है।
70 हजार से ज्यादा नमूनों की जाँच
2028-29 तक जारी रहेगी निगरानी
गन्ने से जुड़े 2026 के ड्राफ्ट पर सरकार ने बदला रुख
फसल सर्वे में डिजिटल तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल
इस डिजिटल सर्वे में मोबाइल ऐप के माध्यम से रियल टाइम जानकारी जुटाई जाती है। जीपीएस आधारित जियो-टैगिंग, टाइम-स्टैंप, तस्वीरों के जरिए रिकॉर्ड और ऑनलाइन निगरानी जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार के अनुसार, इससे फसल उत्पादन से जुड़े आँकड़ों को ज्यादा सटीक, पारदर्शी और समय पर उपलब्ध कराने में मदद मिली है।