खेती से थाली तक पहुँचा प्लास्टिक: गेहूं और टमाटर जैसे पौधों में घुसे माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक, फसल और खाद्य सुरक्षा पर आई रिपोर्ट
Preeti Nahar | May 01, 2026, 17:49 IST
Nano-plastics in Food Chain: खेती की जमीन में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने गंभीर चेतावनी दी है। इस शोध में पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक (MPs) और नैनोप्लास्टिक (NPs) न केवल मिट्टी में मौजूद रहते हैं, बल्कि पौधों की जड़ों के जरिए उनके अंदर प्रवेश कर जाते हैं और उनके विकास को प्रभावित करते हैं। यह स्थिति खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।
नैनोप्लास्टिक अब कर रहे हैं खेती की मिट्टी से होते हुए सीधे पौधों में प्रवेश
इस शोध में पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक (MPs) और नैनोप्लास्टिक (NPs) न केवल मिट्टी में मौजूद रहते हैं, बल्कि पौधों की जड़ों के जरिए उनके अंदर प्रवेश कर जाते हैं और उनके विकास को प्रभावित करते हैं।यह संकेत देता है कि प्लास्टिक अब मिट्टी से होते हुए खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहा है, जो आने वाले समय में मानव स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
क्या कहती है स्टडी?
पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित
क्यों खास है यह शोध?
कैसे पौधों में पहुंच रहे हैं प्लास्टिक कण?
पौधों की जड़ों पर नुकसान, पाई गई क्लोरोफिल की कमी
फसल उत्पादन पर क्या असर पड़ा
माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी में पौधों की लंबाई और बायोमास (कुल वृद्धि) कम हो गई।
क्लोरोफिल की कमी के कारण पौधों की ऊर्जा उत्पादन क्षमता घट गई।
टमाटर के पौधों पर इसका असर ज्यादा गंभीर देखा गया, खासकर जब फाइबर आधारित प्लास्टिक मौजूद थे। इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में फसल उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
माइक्रो और नैनोप्लास्टिक का संयुक्त असर
जड़ों के जरिए पौधों के अंदर प्रवेश रहा है प्लास्टिक
खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर खतरा
क्या हमारी थाली तक पहुंच चुका है प्लास्टिक?
मक्का, धान और गेहूं जैसी मुख्य फसलों में आएगी कमी
दुनिया के कई देशों जैसे चीन, अमेरिका और जर्मनी में हुए एक अन्य अध्ययन में भी यह पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक पौधों की प्रकाश संश्लेषण (खुद खाना बनाने की प्रक्रिया) की क्षमता को करीब 12 फीसदी तक कम कर सकता है। इसका मतलब है कि पौधे ठीक से विकसित नहीं हो पाते।
पहले के शोध भी इस खतरे को लेकर चेतावनी दे चुके हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर यही स्थिति जारी रही, तो अगले 25 वर्षों में मक्का, धान और गेहूं जैसी मुख्य फसलों की पैदावार में 4 से 13.5 फीसदी तक की कमी आ सकती है। इसका सीधा मतलब है कि हर साल करीब 36 करोड़ मीट्रिक टन अनाज का नुकसान हो सकता है, जो दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
क्या हो सकते हैं समाधान?
कृषि में प्लास्टिक के उपयोग हो कम