Independence Day: कुएँ से ट्यूबवेल, ट्यूबवेल से ड्रिप तक… जानिए कैसे बदली खेतों में सिंचाई की कहानी
Mansi | Aug 15, 2026, 14:38 IST
भारत की सिंचाई व्यवस्था कुओं और नहरों से शुरू होकर आधुनिक तकनीकों तक पहुँची है। अब ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी विधियाँ पानी के कुशल उपयोग को बढ़ावा दे रही हैं। सोलर पंप खेतों तक पानी पहुँचाने में ऊर्जा का नया विकल्प प्रदान कर रहे हैं। सरकार की विभिन्न योजनाएँ सिंचाई क्षमता बढ़ाने और पानी की बचत पर केंद्रित हैं।
कुएँ और नहर से लेकर ड्रिप और सोलर पंप तक, आधुनिक तकनीक ने गाँवों में सिंचाई का तरीका बदल दिया है
आज़ादी के समय भारत का गाँव खेती के लिए काफी हद तक बारिश, कुएँ और नहरों पर निर्भर था। किसान के लिए अच्छी बारिश का मतलब अच्छी फसल और बारिश का बिगड़ता मिज़ाज बड़ी चिंता हुआ करता था। जहाँ कुआँ होता, वहाँ पानी निकालकर खेत सींचे जाते और जहाँ नहर की सुविधा होती, वहाँ उसके पानी का इंतज़ार रहता। आजादी के करीब आठ दशक बाद गाँवों के खेतों की यह तस्वीर काफी बदल चुकी है। अब ट्यूबवेल और पंप के साथ ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकें सिंचाई का तरीका बदल रही हैं। कई जगह सोलर पंप खेतों तक पानी पहुँचाने में मदद कर रहे हैं, जबकि प्रिसीजन इरिगेशन जैसी तकनीकें पानी के ज्यादा बेहतर इस्तेमाल की दिशा दिखा रही हैं।
1947 से 2026 तक भारत की सिंचाई व्यवस्था का यह सफ़र सिर्फ़ तकनीक बदलने की कहानी नहीं है। यह उन किसानों की मेहनत की कहानी भी है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद खेतों को सींचा और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया। कुएँ और नहर से शुरू हुई यह यात्रा आज ‘हर बूंद से अधिक फसल’ की सोच तक पहुँच चुकी है।
भारत में छोटी सिंचाई व्यवस्था में कुएँ और ट्यूबवेल की भूमिका लंबे समय से रही है। जल शक्ति मंत्रालय की लघु सिंचाई गणना में सिंचाई योजनाओं को मुख्य रूप से कुएँ, उथले ट्यूबवेल, मध्यम ट्यूबवेल, गहरे ट्यूबवेल, सतही प्रवाह और सतही लिफ़्ट योजनाओं में बाँटा गया है। गाँव के स्तर पर इसका मतलब समझना आसान है। जहाँ खेत के पास कुआँ था, वहाँ किसान पानी निकालकर फसल तक पहुँचाता था। जहाँ भूजल उपलब्ध था, वहाँ ट्यूबवेल ने सिंचाई का रास्ता खोला। वहीं नहर और दूसरी सतही जल योजनाओं ने बड़े इलाक़ों में खेती को पानी उपलब्ध कराने में मदद की।
जल शक्ति मंत्रालय की सातवीं लघु सिंचाई गणना में भी भूजल आधारित योजनाओं में कुएँ और ट्यूबवेल/बोरवेल, जबकि सतही जल आधारित योजनाओं में सतही प्रवाह और सतही लिफ़्ट योजनाएँ शामिल हैं। यानी भारत के गाँवों में सिंचाई का ढाँचा कभी किसी एक साधन पर निर्भर नहीं रहा। अलग-अलग इलाक़ों में पानी के स्रोत और उपलब्धता के हिसाब से किसान अलग-अलग तरीकों से खेत सींचते रहे हैं।
समय के साथ सिंचाई को सिर्फ़ किसान के निजी कुएँ या ट्यूबवेल तक सीमित रखने के बजाय बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं पर भी जोर बढ़ा। नहरों, जलाशयों और दूसरी सिंचाई परियोजनाओं के जरिए खेती तक पानी पहुँचाने की कोशिश हुई। इसी दिशा में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना यानी पीएमकेएसवाई महत्वपूर्ण योजना बनी। इसके तहत त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी), कमांड एरिया डेवलपमेंट एंड वाटर मैनेजमेंट, सतही लघु सिंचाई और मरम्मत, नवीनीकरण एवं बहाली जैसे घटक शामिल हैं। पीएमकेएसवाई के आधिकारिक पोर्टल का प्रबंधन जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग द्वारा किया जाता है।
गाँव में किसान के लिए सिर्फ़ सिंचाई परियोजना बन जाना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि पानी खेत तक पहुँचे कैसे? पीएमकेएसवाई के ‘हर खेत को पानी’ घटक के तहत सतही लघु सिंचाई और मरम्मत, नवीनीकरण एवं बहाली जैसी योजनाओं के जरिए सिंचाई क्षमता बढ़ाने पर काम किया गया है। सरकार के 30 जून 2026 के आधिकारिक अपडेट के मुताबिक़, पीएमकेएसवाई के तहत 3,462 सतही लघु सिंचाई और मरम्मत, नवीनीकरण एवं बहाली परियोजनाएँ पूरी की जा चुकी थीं। इनसे 5.93 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता बनी। वहीं भूजल से जुड़े हस्तक्षेपों के जरिए 88.55 हज़ार हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षेत्र जुड़ा। सिंचाई व्यवस्था में बदलाव सिर्फ़ बड़े बाँध और नहर बनाने तक सीमित नहीं है। छोटे जल स्रोतों और स्थानीय सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना भी इसका हिस्सा है।
किसान के लिए पानी की अहमियत तब सबसे ज्यादा समझ आती है जब बारिश कम हो या भूजल सीमित हो। ऐसे में सिर्फ़ खेत तक ज्यादा पानी पहुँचाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत यह भी है कि जितना पानी उपलब्ध है, उसका ज्यादा से ज्यादा हिस्सा फसल के काम आए। यहीं से ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों की भूमिका बढ़ती है। सरकार की ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ (पीडीएमसी) पहल का उद्देश्य खेत स्तर पर पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाना है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़, पीडीएमसी के तहत अब तक 110.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया गया है। पीडीएमसी में ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जाता है। ड्रिप में पानी नियंत्रित तरीके से पौधे की जड़ के पास पहुँचाया जाता है, जबकि स्प्रिंकलर में पानी फुहार के रूप में खेत तक पहुँचता है।
गाँव के छोटे किसान के लिए किसी नई तकनीक को अपनाने में सबसे बड़ी चुनौती अक्सर उसकी लागत होती है। ड्रिप या स्प्रिंकलर सिस्टम लगाना भी शुरुआती निवेश मांगता है। इसीलिए सरकार की योजना में वित्तीय सहायता का प्रावधान है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार छोटे और सीमांत किसानों को सूक्ष्म सिंचाई सिस्टम लगाने के लिए 55% तक और अन्य किसानों को 45% तक वित्तीय सहायता दी जाती है। माइक्रो इरिगेशन सिस्टम के लिए सहायता प्रति लाभार्थी अधिकतम 5 हेक्टेयर तक सीमित है। राज्यों की ओर से अतिरिक्त सहायता भी दी जा सकती है। इसका मकसद यही है कि पानी बचाने वाली तकनीक केवल बड़े किसानों तक सीमित न रहे और छोटे किसान भी इसे अपना सकें।
गाँवों में सिंचाई का एक बड़ा हिस्सा पंपों पर निर्भर करता है। इन पंपों के लिए बिजली या डीज़ल की जरूरत होती है। डीज़ल की कीमत बढ़ने पर सिंचाई की लागत भी किसान की जेब पर असर डाल सकती है। इसी जगह प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान यानी पीएम-कुसुम जैसी योजना सौर ऊर्जा को खेती से जोड़ती है। मार्च 2026 में सरकार ने बताया कि पीएम-कुसुम के तहत देश में 10 लाख से अधिक स्टैंडअलोन सोलर कृषि पंप स्थापित किए जा चुके थे और 13 लाख से अधिक ग्रिड-कनेक्टेड कृषि पंपों का सोलराइजेशन किया जा चुका था। सरकार के मुताबिक़ सोलर पंप किसानों को दिन के समय सिंचाई के लिए भरोसेमंद ऊर्जा देने और डीज़ल पर निर्भरता घटाने में मदद कर रहे हैं।
इसके अलावा, 31 दिसंबर 2025 तक की आधिकारिक स्थिति में पीएम-कुसुम के कंपोनेंट-बी के तहत 13,15,190 पंप स्वीकृत और 9,75,227 पंप स्थापित बताए गए थे। इसी अवधि तक योजना से 21,77,369 किसान लाभान्वित हुए थे। अब गाँव में सिंचाई की कहानी सिर्फ़ पानी के स्रोत तक सीमित नहीं है। पानी निकालने के लिए इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा भी इस बदलाव का अहम हिस्सा बन रही है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर के बाद खेती में अगला जोर प्रिसीजन इरिगेशन यानी जरूरत के मुताबिक़ सटीक सिंचाई पर है। सरकार सूक्ष्म सिंचाई को पानी के कुशल इस्तेमाल, सटीक सिंचाई और फसल के जड़ क्षेत्र तक पानी पहुँचाने से जोड़ती है। आधिकारिक विवरण के मुताबिक़ ड्रिप सिंचाई पानी और पोषक तत्वों को सीधे पौधे के जड़ क्षेत्र तक पहुँचाने में मदद करती है।ल आने वाले समय में मिट्टी की नमी, मौसम की जानकारी और डिजिटल तकनीक किसान को यह समझने में मदद कर सकती हैं कि खेत को कब और कितने पानी की जरूरत है। हालाँकि, यहाँ एक बात साफ़ समझना जरूरी है। सेंसर आधारित स्मार्ट सिंचाई अभी देश के हर गाँव और हर खेत में पहुँच चुकी है, ऐसा दावा करना सही नहीं होगा। इसे खेती में उभरती तकनीक और आगे की दिशा के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
भारत के गाँवों में सिंचाई का सफर लंबा रहा है। कुएँ और नहर से शुरू होकर यह ट्यूबवेल और पंप तक पहुँचा। इसके बाद ड्रिप और स्प्रिंकलर ने पानी को ज्यादा नियंत्रित तरीके से खेत तक पहुँचाने का रास्ता दिया। अब सोलर पंप सिंचाई के लिए ऊर्जा का नया विकल्प दे रहे हैं। पीएमकेएसवाई के तहत सिंचाई का विस्तार और पानी की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर है, जबकि पीडीएमसी के जरिए खेत में पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। सरकार के मुताबिक़ पीएमकेएसवाई के तहत अगस्त 2025 तक 2.7 करोड़ से अधिक किसान लाभान्वित हुए थे और इन पहलों से 24.61 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र कवर या विकसित हुआ था। इस पर ₹64,407 करोड़ से अधिक का समर्थन दिया गया।
1947 से 2026 तक भारत की सिंचाई व्यवस्था का यह सफ़र सिर्फ़ तकनीक बदलने की कहानी नहीं है। यह उन किसानों की मेहनत की कहानी भी है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद खेतों को सींचा और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया। कुएँ और नहर से शुरू हुई यह यात्रा आज ‘हर बूंद से अधिक फसल’ की सोच तक पहुँच चुकी है।
जब गाँव के खेतों का सहारा थे कुएँ और नहर
जल शक्ति मंत्रालय की सातवीं लघु सिंचाई गणना में भी भूजल आधारित योजनाओं में कुएँ और ट्यूबवेल/बोरवेल, जबकि सतही जल आधारित योजनाओं में सतही प्रवाह और सतही लिफ़्ट योजनाएँ शामिल हैं। यानी भारत के गाँवों में सिंचाई का ढाँचा कभी किसी एक साधन पर निर्भर नहीं रहा। अलग-अलग इलाक़ों में पानी के स्रोत और उपलब्धता के हिसाब से किसान अलग-अलग तरीकों से खेत सींचते रहे हैं।
कुएँ और पंप लंबे समय से किसानों के लिए सिंचाई के प्रमुख साधनों में शामिल रहे हैं
नहरों और बड़ी परियोजनाओं ने बढ़ाई सिंचाई की पहुँच
नहरों के जरिए खेतों तक पहुँचता पानी सिंचाई की पहुँच बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।
‘हर खेत को पानी’ की कोशिश
सिंचाई का दायरा बढ़ा, लेकिन अब हर बूंद बचाने की चुनौती
ड्रिप सिंचाई में पानी को नियंत्रित तरीके से फसल की जड़ों तक पहुँचाया जाता है, जिसमें पानी की बचत में मदद मिलती है
छोटे किसान के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर कितने आसान हुए?
स्प्रिंकलर सिंचाई में फसल तक पानी फुहार के रूप में पहुँचाया जाता है
अब खेत तक पानी पहुँचाने में सूरज भी मदद कर रहा है
इसके अलावा, 31 दिसंबर 2025 तक की आधिकारिक स्थिति में पीएम-कुसुम के कंपोनेंट-बी के तहत 13,15,190 पंप स्वीकृत और 9,75,227 पंप स्थापित बताए गए थे। इसी अवधि तक योजना से 21,77,369 किसान लाभान्वित हुए थे। अब गाँव में सिंचाई की कहानी सिर्फ़ पानी के स्रोत तक सीमित नहीं है। पानी निकालने के लिए इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा भी इस बदलाव का अहम हिस्सा बन रही है।
सोलर पंप सूरज की ऊर्जा से खेतों तक पानी पहुँचाने का विकल्प दे रहे हैं