ग्रामीण महिलाएं बनीं भारत की वर्कफोर्स की ताकत, लेकिन कमाई और पहचान में अब भी अंतर कायम: NSO रिपोर्ट

Gaon Connection | Apr 30, 2026, 19:25 IST
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महिलाओं की आर्थिक सहभागिता भारत में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँच चुकी है। खासकर ग्रामीण महिलाएँ, जो न सिर्फ अपने परिवारों का सहारा बन रही हैं, बल्कि समाज में भी बदलावा ला रही हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट में महिला श्रम बल में बढ़ते योगदान की पुष्टि हुई है।
भट्टे पर काम करती हुईं महिलाएं
भट्टे पर काम करती हुईं महिलाएं
भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसमें सबसे बड़ी भूमिका ग्रामीण महिलाओं की रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की 'वुमन एंड मेन इन इंडिया 2025' रिपोर्ट के अनुसार, महिला श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 2022 के 33.9 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 40 प्रतिशत हो गई है। हालांकि इस प्रगति के बावजूद वेतन असमानता, कृषि पर निर्भरता और बिना भुगतान वाले काम का बोझ जैसी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं।

ग्रामीण महिलाओं ने बढ़ाई भागीदारी

रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 2025 में 40 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो 2022 में 33.9 प्रतिशत थी। इसमें ग्रामीण महिलाओं की भूमिका अहम रही है जहां उनकी भागीदारी 37.5 प्रतिशत से बढ़कर 45.9 प्रतिशत हो गई है।

पुरुषों के मुकाबले अब भी बड़ा अंतर

इसके बावजूद पुरुषों और महिलाओं के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। 2025 में पुरुषों की श्रम भागीदारी दर 79.1 प्रतिशत है जो 2022 में 78 प्रतिशत थी। यानी दोनों के बीच लगभग 40 प्रतिशत का अंतर है, जिसमें खास बदलाव नहीं आया है।

कृषि क्षेत्र पर महिलाओं की ज्यादा निर्भरता

रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली लगभग 72.7 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र से जुड़ी हैं। यानी करीब तीन-चौथाई ग्रामीण महिला श्रमिक खेती पर निर्भर हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और अवसर सीमित रहते हैं।

शहरी महिलाओं की भागीदारी अभी भी कम

शहरी क्षेत्रों में महिलाएं मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम करती हैं, लेकिन वहां उनकी भागीदारी अभी भी काफी कम है। 2025 में शहरी महिला श्रम भागीदारी दर सिर्फ 27.7 प्रतिशत रही, जो 2022 के मुकाबले मात्र 3 प्रतिशत अधिक है।

प्रगति के बावजूद चुनौतियां बरकरार

रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद वेतन में असमानता, बिना भुगतान वाले काम का बोझ और कृषि पर अत्यधिक निर्भरता जैसी संरचनात्मक समस्याएं अब भी बनी हुई हैं, जो इस प्रगति पर सवाल खड़े करती हैं।
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