Heatwave Alert: IMD की चेतावनी के बीच डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने बताया- शरीर पर कैसे असर डाल रही है भीषण गर्मी? बताए बचाव के उपाय

Preeti Nahar | May 08, 2026, 13:54 IST
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भारत में मौसम की परिस्थितियों को लेकर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने जून-जुलाई के दौरान तेज गर्मी का अलार्म जारी किया है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने इसे स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट करार दिया है। उन्होंने बताया कि गर्मी बढ़ने से शरीर पर भारी दबाव पड़ सकता है, जिससे मिचली, चक्कर और हीट स्ट्रोक जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती हैं। पढ़िए पूरी जानकारी।
​<em>अत्यधिक गर्मी से शरीर का तापमान बढ़ने पर चक्कर, कमजोरी, डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक का खतरा- Dr. Soumya Swaminathan</em>​
​अत्यधिक गर्मी से शरीर का तापमान बढ़ने पर चक्कर, कमजोरी, डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक का खतरा- Dr. Soumya Swaminathan​
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department) ने चेतावनी दी है कि अब से जून और जुलाई के बीच देश के बड़े हिस्सों में भीषण गर्मी वाले दिनों की संख्या बढ़ सकती है। ऐसे समय में Soumya Swaminathan ने M. S. Swaminathan Research Foundation के पॉडकास्ट ‘Science Simply’ में हीटवेव को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

Soumya Swaminathan एक भारतीय बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) और क्लीनिकल वैज्ञानिक हैं, जो टीबी (क्षय रोग) और एचआईवी पर अपने शोध कार्यों के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने वर्ष 2015 से 2017 तक भारत सरकार में स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव के रूप में कार्य किया और साथ ही Indian Council of Medical Research (ICMR) की महानिदेशक भी रहीं। उन्होंने बताया कि भारत हमेशा से गर्म देश रहा है, लेकिन अब जिस तरह से तापमान 35, 40 और कई इलाकों में 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा रहा है, वह मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा ख़तरा बनता जा रहा है। उन्होंने साफ कहा कि हीटवेव अब केवल मौसम की ख़बर नहीं बल्कि तेजी से उभरता हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जिस पर जल्द से जल्द ध्यान देने की जरूरत है।

शरीर पर गर्मी कैसे करती है हमला?

हीटवेव का शरीर पर नुकसान
हीटवेव का शरीर पर नुकसान
डॉ. सौम्या ने बताया कि सामान्य तौर पर इंसान के शरीर का अंदरूनी तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है और शरीर 20 से 25 डिग्री सेल्सियस के तापमान में सबसे अधिक सहज महसूस करता है। लेकिन जब तापमान बहुत तेजी से बढ़ता है तो शरीर पर दबाव बढ़ने लगता है। शुरुआत में शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है। त्वचा की सतह पर आने वाला पसीना जब वाष्पित होता है तो शरीर का तापमान कम करने में मदद करता है। लेकिन समस्या तब बढ़ जाती है जब हवा में नमी बहुत ज्यादा हो जाती है। अधिक नमी के कारण पसीना ठीक से सूख नहीं पाता और शरीर का तापमान लगातार बढ़ने लगता है। इसका असर मतली, चक्कर आना, कमजोरी, डिहाइड्रेशन, मांसपेशियों में ऐंठन, हीट एग्जॉशन और गंभीर स्थिति में हीट स्ट्रोक के रूप में सामने आता है।

सिर्फ तापमान नहीं, ये चार फैक्टर बनाते हैं हीटवेव को ख़तरनाक

उन्होंने कहा कि लोग अक्सर सिर्फ तापमान को ही खतरा मानते हैं, जबकि असल ख़तरा कई कारकों के मेल से बनता है। इसमें अत्यधिक तापमान, हवा में नमी, सीधी धूप या रेडिएशन और हवा की गति शामिल है। अगर कोई व्यक्ति तेज धूप में खड़ा है और हवा भी नहीं चल रही है तो शरीर के लिए खुद को ठंडा रखना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि एक ही तापमान अलग-अलग परिस्थितियों में अलग प्रभाव डाल सकता है।

किन लोगों पर सबसे ज्यादा ख़तरा?

खेतों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर हीटवेव के सबसे ज्यादा जोखिम में
खेतों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर हीटवेव के सबसे ज्यादा जोखिम में
डॉ. स्वामीनाथन के मुताबिक हीटवेव का असर हर व्यक्ति पर समान नहीं होता। खेतों में काम करने वाले किसान, निर्माण मजदूर, डिलीवरी कर्मचारी और खुली धूप में काम करने वाले लोग ज्यादा जोखिम में होते हैं क्योंकि उनका गर्मी के संपर्क में रहने का समय ज्यादा होता है। इसके अलावा गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, छोटे बच्चे और डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग या किडनी की बीमारी से पीड़ित लोग भी ज्यादा संवेदनशील होते हैं। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का काम, उसका वातावरण और उसकी शारीरिक स्थिति यह तय करती है कि गर्मी उसे कितना नुकसान पहुँचा सकती है।

मजदूरों और किसानों के लिए क्या सावधानियाँ जरूरी?

डॉ. स्वामीनाथन ने बताया कि गर्मी के दौरान काम करने के तरीके में बदलाव जरूरी है। Odisha का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ लू के दिनों में सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक काम रोकने के नियम लागू किए गए हैं। मजदूरों को हर 1 या 2 घंटे में 15 से 20 मिनट का ब्रेक मिलना चाहिए ताकि उनका शरीर ठंडा हो सके। उन्होंने बताया कि अत्यधिक गर्मी में शरीर हर घंटे आधा लीटर से लेकर एक लीटर तक पानी खो सकता है, इसलिए लगातार पानी पीना बेहद जरूरी है। ORS का सेवन भी फायदेमंद हो सकता है। खेतों में काम करने वाले किसानों को दोपहर के समय काम करने से बचना चाहिए और सुबह या शाम के समय खेतों में जाना चाहिए।

AI आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम

वैज्ञानिक अब मौसम और स्वास्थ्य डेटा को जोड़कर बेहतर हीट अलर्ट सिस्टम तैयार कर रहे हैं।
वैज्ञानिक अब मौसम और स्वास्थ्य डेटा को जोड़कर बेहतर हीट अलर्ट सिस्टम तैयार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि National Disaster Management Authority और राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियाँ पहले से ही मौसम चेतावनी जारी करती हैं, लेकिन अब इससे आगे बढ़ने की जरूरत है। Indian Institute of Science के Art Park के साथ मिलकर एक ऐसा अर्ली वार्निंग टूल तैयार किया जा रहा है, जो केवल मौसम डेटा ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य डेटा को भी जोड़ेगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किस तापमान पर किस तरह के लोगों को ज्यादा खतरा हो सकता है।

शहर क्यों बन रहे हैं ‘हीट ट्रैप’?

डॉ. स्वामीनाथन ने कहा कि भारत के कई शहर तेजी से हीट ट्रैप बनते जा रहे हैं। अत्यधिक कंक्रीट और स्टील के उपयोग के कारण शहरों के बीच का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 6 से 8 डिग्री अधिक पाया गया है। Ahmedabad ने सबसे पहले Heat Action Plan लागू किया था। वहीं Chennai में गिग वर्कर्स के लिए कूलिंग शेल्टर बनाए गए हैं और Jaipur में पारंपरिक ‘खस’ आधारित कूलिंग तकनीक अपनाई जा रही है।

कई शहरों ने नियुक्त किए ‘हीट ऑफिसर’

ट्रैफिक सिग्नल पर रूकने वालों के लिए शेड का इंतजाम
ट्रैफिक सिग्नल पर रूकने वालों के लिए शेड का इंतजाम
डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि व्यक्तिगत सावधानियों के साथ-साथ अब स्थानीय स्तर पर बड़े कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए भारत के कई शहरों और दुनिया के अन्य हिस्सों में अलग-अलग मॉडल अपनाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि कई शहरों ने ‘हीट ऑफिसर’ नियुक्त किए हैं, जिनका काम अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल बनाना होता है। उन्होंने कहा कि हीटवेव से निपटना सिर्फ स्वास्थ्य विभाग या श्रम विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें कई सरकारी एजेंसियों को साथ मिलकर काम करना पड़ता है।

अहमदाबाद का हीट एक्शन प्लान मॉडल- Ahmedabad देश के उन शुरुआती शहरों में शामिल है जिसने सबसे पहले Heat Action Plan तैयार किया। इस योजना का फोकस शुरुआती चेतावनी प्रणाली मजबूत करना, लोगों तक समय रहते जानकारी पहुंचाना और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बनाना है। इसका मुख्य उद्देश्य अत्यधिक गर्मी के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को कम करना है।

चेन्नई में गिग वर्कर्स के लिए कूलिंग सेंटर- Chennai में गिग वर्कर्स और लगातार बाहर काम करने वाले लोगों के लिए एयर-कंडीशन्ड लाउंज और शेड तैयार किए गए हैं। इन केंद्रों में डिलीवरी वर्कर्स और अन्य बाहरी कामगार कुछ समय के लिए आराम कर सकते हैं, खुद को ठंडा कर सकते हैं, पानी पी सकते हैं और फिर दोबारा काम पर लौट सकते हैं।

जयपुर में पारंपरिक ‘खस’ कूलिंग मॉडल- Jaipur में कुछ जगहों पर बिना एयर कंडीशनिंग वाले विशेष केबिन बनाए गए हैं। इनमें पैसिव कूलिंग तकनीक अपनाई गई है और हवा के प्रवाह के लिए ‘खस-खस’ का इस्तेमाल किया जा रहा है। डॉ. स्वामीनाथन ने कहा कि भारत में पारंपरिक रूप से ऐसे कई तरीके रहे हैं जिनसे इमारतों को ठंडा रखा जाता था। ये तरीके सस्ते हैं, पर्यावरण के अनुकूल हैं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी नहीं बढ़ाते।

ओडिशा में पीक ऑवर में काम पर रोक- Odisha ने श्रमिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बड़ा कदम उठाया है। यहां अत्यधिक गर्मी वाले दिनों में दिन के सबसे गर्म घंटों के दौरान काम करने पर रोक लगाई गई है। इससे मजदूरों को लू और हीट स्ट्रेस से बचाने में मदद मिल रही है।

चेन्नई में ट्रैफिक सिग्नलों पर ग्रीन शेड- डॉ. स्वामीनाथन ने बताया कि Chennai नगर निगम ट्रैफिक सिग्नलों पर हरे रंग की शेड लगा रहा है। ये शेड उन दोपहिया वाहन चालकों के लिए राहत का काम कर रहे हैं जिन्हें ट्रैफिक सिग्नल पर लंबे समय तक धूप में इंतजार करना पड़ता है।

रिफ्लेक्टिव पेंट और अस्पतालों में विशेष इंतजाम

अस्पतालों में बने कूलिंग सिस्टम
अस्पतालों में बने कूलिंग सिस्टम
डॉ. स्वामीनाथन ने बताया कि कुछ जगहों पर गर्मी कम करने के लिए रिफ्लेक्टिव कूलिंग पेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि इमारतों का तापमान कम रहे। इसके अलावा लोगों के लिए छांव वाले आराम केंद्र भी बनाए जा रहे हैं। अस्पतालों में खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के वार्ड को ठंडी जगहों पर शिफ्ट किया जा रहा है ताकि कमजोर मरीजों को ऊपरी मंजिलों की अधिक गर्मी से बचाया जा सके।

कमजोर तबके की पहचान सबसे जरूरी

ग्रामीण और शहरी इलाकों के दैनिक मजदूर सबसे अधिक प्रभावित
ग्रामीण और शहरी इलाकों के दैनिक मजदूर सबसे अधिक प्रभावित
उन्होंने कहा कि सिर्फ कागजों पर Heat Action Plan बनाना पर्याप्त नहीं है। असली जरूरत यह है कि योजनाएं जमीन पर लागू हों। साथ ही शहरों और कस्बों को यह पहचानना होगा कि कौन से लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। जिन लोगों के पास बेहतर घर, एयर कंडीशनिंग या संसाधन नहीं हैं, उन पर गर्मी का सबसे ज्यादा असर पड़ता है। इसलिए स्थानीय प्रशासन को उन्हीं इलाकों पर विशेष ध्यान देना होगा जहां कमजोर तबका रहता है।

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