धान के आगे फीकी पड़ी कपास की बुवाई, उत्तर भारत में 22% तक घटा रकबा, क्यों किसानों का मोहभंग?
Gaon Connection | Jun 18, 2026, 16:08 IST
उत्तर भारत में इस खरीफ सीज़न कपास की बुवाई में 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कई किसान कपास छोड़कर धान की खेती की ओर रुख़ कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार सरकारी ख़रीद की गारंटी, बेहतर आमदनी, गुलाबी सुंडी का प्रकोप और मौसम की अनिश्चितता किसानों को कपास से दूर कर रही है।
धान की ओर झुके पंजाब-हरियाणा के किसान
उत्तर भारत के कपास उत्पादक क्षेत्रों में इस खरीफ सीज़न किसानों का रुझान धान की खेती की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। सरकारी ख़रीद की गारंटी, बेहतर आमदनी और कम जोखिम के कारण कई किसान कपास की जगह धान को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका असर कपास के रकबे पर भी दिखने लगा है।
बिजनेसलाइन की एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में इस साल कपास की बुवाई करीब 9 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 11.56 लाख हेक्टेयर थी। यानी उत्तर भारत में कपास का क्षेत्रफल करीब 22 प्रतिशत घट गया है। वहीं कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक 12 जून तक देशभर में कपास का कुल रकबा 9.53 लाख हेक्टेयर रहा, जो एक साल पहले के 13.19 लाख हेक्टेयर से 28 प्रतिशत कम है।
पंजाब में कपास का रकबा 1.19 लाख हेक्टेयर से घटकर 0.80 लाख हेक्टेयर रह गया है। हरियाणा में यह 3.94 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.92 लाख हेक्टेयर और राजस्थान में 6.43 लाख हेक्टेयर से घटकर 5.28 लाख हेक्टेयर रह गया है। हालाँकि राजस्थान के कुछ हिस्सों में अभी भी बुवाई जारी है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) की फसल समिति के अध्यक्ष अतुल गणात्रा ने कहा, "पंजाब और हरियाणा में क्षेत्र कम हुआ है, लेकिन राजस्थान के निचले और ऊपरी हिस्सों में बुवाई जारी है। हाल की बारिश के बाद राज्य में कपास का रकबा बरकरार रह सकता है या 3-4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।"
जोधपुर स्थित साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के संस्थापक निदेशक भागीरथ चौधरी के मुताबिक किसान अब धान को अधिक सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं। उन्होंने कहा, "धान में सरकारी ख़रीद और बेहतर दाम मिलने की संभावना रहती है। इसके उलट कपास में गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का प्रकोप, मौसम की अनिश्चितता और MSP से नीचे बाज़ार भाव मिलने जैसी समस्याएँ किसानों की चिंता बढ़ा रही हैं।" उनके अनुसार पिछले साल धान की अच्छी पैदावार और बेहतर आमदनी ने भी किसानों को इस दिशा में प्रोत्साहित किया है।
धान की रोपाई में देरी होने से किसानों को मक्का और मूँग जैसी कम अवधि वाली ज़ायद फसलें लेने का अवसर मिल रहा है। इससे खेतों का बेहतर उपयोग हो रहा है और अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो रही है। वहीं कपास की फसल को अप्रैल और मई की भीषण गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में देर से बोई गई फसल में पौधों के मुरझाने, जड़ सड़न और कमजोर बढ़वार जैसी समस्याएँ देखी जा रही हैं।
केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (CICR) के सिरसा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के पूर्व प्रमुख दिलीप मोंगा ने कहा कि उत्तर भारत में कपास का रकबा पिछले कुछ वर्षों से लगातार घट रहा है। उन्होंने बताया कि गुलाबी सुंडी के बढ़ते प्रकोप के अलावा पिछले वर्ष अगस्त-सितंबर में हुई अधिक बारिश और बुवाई के समय उच्च तापमान ने भी कपास उत्पादन को प्रभावित किया। मोंगा के अनुसार, धान समेत अन्य फसलों से बेहतर आमदनी मिलने के कारण किसान धीरे-धीरे कपास से दूरी बना रहे हैं।
केंद्र सरकार ने विपणन वर्ष 2026-27 के लिए कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर मध्यम रेशा कपास के लिए 8,267 रुपये प्रति क्विंटल और लंबे रेशे वाली कपास के लिए 8,667 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। इसके बावजूद उत्तर भारत में किसानों का झुकाव धान की खेती की ओर अधिक दिखाई दे रहा है।
बिजनेसलाइन की एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में इस साल कपास की बुवाई करीब 9 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 11.56 लाख हेक्टेयर थी। यानी उत्तर भारत में कपास का क्षेत्रफल करीब 22 प्रतिशत घट गया है। वहीं कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक 12 जून तक देशभर में कपास का कुल रकबा 9.53 लाख हेक्टेयर रहा, जो एक साल पहले के 13.19 लाख हेक्टेयर से 28 प्रतिशत कम है।