Sheetal Devi: पैरालंपिक मेडलिस्ट शीतल देवी '𝐏𝐚𝐫𝐚 𝐀𝐫𝐜𝐡𝐞𝐫 𝐨𝐟 𝐭𝐡𝐞 𝐘𝐞𝐚𝐫 𝟐𝟎𝟐𝟓' से सम्मानित
Gaon Connection | Mar 30, 2026, 18:17 IST
जम्मू-कश्मीर की रहने वाली शीतल देवी को 'पैरा आर्चर ऑफ द ईयर 2025' का खिताब से सम्मानित किया गया है। उन्होंने बिना हाथों के होते हुए विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर सभी को प्रेरित किया है। उनकी मेहनत और साहस ने न केवल खेल में बल्कि समाज में भी एक नई उम्मीद जगाई है। पढ़िए शीतल देवी की कहानी।
शीतल देवी '𝐏𝐚𝐫𝐚 𝐀𝐫𝐜𝐡𝐞𝐫 𝐨𝐟 𝐭𝐡𝐞 𝐘𝐞𝐚𝐫 𝟐𝟎𝟐𝟓'
भारत की शीतल देवी को वर्ल्ड आर्चरी ने 'पैरा आर्चर ऑफ द ईयर 2025' चुना है। जम्मू-कश्मीर की 19 वर्षीय शीतल देवी, जिनके दोनों हाथ नहीं हैं, पिछले साल दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू में वर्ल्ड पैरा आर्चरी चैंपियनशिप में महिलाओं की कंपाउंड व्यक्तिगत स्पर्धा में गोल्ड जीतकर ऐसा करने वाली पहली और एकमात्र महिला आर्मलेस (बिना हाथों वाली) तीरंदाज बनीं। उनकी यह उपलब्धि शारीरिक सीमाओं को पार कर असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प से खेल की दुनिया में भारत का नाम रोशन करने की कहानी है।
किश्तवाड़ जिले के एक छोटे से गाँव लोईधार की रहने वाली शीतल देवी ने 15 साल की उम्र तक तीरंदाजी के बारे में कभी सोचा भी नहीं था। वह अपने गाँव में ही रहती थीं और पेड़ों पर चढ़ना उन्हें बहुत पसंद था, जिसके लिए वह अपने पैरों का इस्तेमाल करती थीं। शीतल बताती हैं, “मेरा कोई प्लान नहीं था कि मैं आर्चरी करूंगी या देश के लिए मेडल जीतूंगी। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि विदेश क्या होता है।”
जब शीतल 15 साल की थीं, तब इलाज के लिए पहली बार गाँव से बाहर गईं। वहीं उनकी मुलाकात प्रीति नाम की एक खिलाड़ी से हुई, जिन्होंने उन्हें बताया कि शारीरिक चुनौतियों के बावजूद खेलों में करियर बनाया जा सकता है। इसके बाद शीतल का मूल्यांकन किया गया और पता चला कि वह स्विमिंग, रनिंग और तीरंदाजी जैसे खेल खेल सकती हैं।
शीतल देवी को श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड तीरंदाजी अकादमी में प्रशिक्षण के लिए दाखिला मिला। शुरुआत में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। पहली बार जब उन्होंने धनुष उठाया तो वह काफी भारी होने के कारण गिर गया। कोच ने उन्हें समझाया कि यह एक दिन में नहीं सीखा जा सकता, इसके लिए लगातार मेहनत करनी होगी। शीतल कहती हैं, “पहली बार जब मैंने बो उठाया तो वह गिर गया। मुझे लगा कि शायद मैं नहीं कर पाऊंगी। लेकिन सर ने कहा कि मेहनत और प्रैक्टिस से सब हो जाएगा।” उन्होंने एक महीने तक सिर्फ अपनी स्टैंडिंग और स्ट्रेंथ पर काम किया। जब पहली बार उन्होंने एरो चलाया तो उन्हें लगा कि अगर मेहनत करूं तो मैं जरूर आगे जा सकती हूं।
जब शीतल देवी गाँव से निकली थीं, तब उन्होंने खुद से एक वादा किया था। वह कहती हैं, “मैं जब गाँव से आई थी तो मैंने सोचा था कि जब तक एक मेडल नहीं जीतूंगी, तब तक गाँव वापस नहीं जाऊंगी। बस एक मेडल जीतना था।” शुरुआत में उन्हें यह भी नहीं पता था कि पैरा खिलाड़ियों की अलग कैटेगरी होती है। उन्होंने अपने पहले प्रतियोगिता में सामान्य (एबल बॉडी) खिलाड़ियों के साथ खेला और सातवें स्थान पर रहीं। बाद में जूनियर प्रतियोगिता में उन्होंने सिल्वर मेडल जीत लिया। दिलचस्प बात यह है कि उन्हें तब तक यह भी नहीं पता था कि मेडल के अलग-अलग रंग होते हैं। शीतल बताती हैं कि, “मुझे नहीं पता था कि मेडल्स का रंग गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज भी होता है। जब मैं पोडियम पर चढ़ने गई तो मुझे समझ नहीं आया कि किस नंबर पर खड़ा होना है। मैंने सर से पूछा कि मुझे कहाँ खड़ा होना है।”
सिर्फ तीन साल के अंदर शीतल देवी ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और वहाँ गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज तीनों मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया। वह कहती हैं, “जब मैं इंटरनेशनल खेलने गई तो मुझे पता चला कि मेरे जैसे और भी बहुत लोग हैं। उन्हें देखकर मुझे बहुत मोटिवेशन मिला कि अगर ये कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती।”
शीतल देवी के जन्म के समय कई लोगों ने कहा था कि यह लड़की आगे क्या कर पाएगी। लेकिन उनके परिवार ने हमेशा उनका साथ दिया। शीतल बताती हैं, “मेरे परिवार ने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अलग हूँ। लोग बातें करते थे तो मेरी माँ रोती थीं, लेकिन मेरे दादा की माँ कहती थीं कि यह हमारी घर की लक्ष्मी है, देखना यह घर का नाम रोशन करेगी।” आज वही लोग उनके माता-पिता को बधाई देने आते हैं।
आज शीतल देवी पैरा और एबल- दोनों कैटेगरी में खेलती हैं। उनका कहना है कि वह खुद को किसी से कम नहीं मानतीं। “मैं खुद को चैलेंज देती हूं कि मुझे एबल खिलाड़ियों के साथ भी जीतना है। मैं यह नहीं सोचती कि मैं पैरा हूं, इसलिए मुझे सिर्फ पैरा कैटेगरी में ही जीतना है।” अब उनका लक्ष्य आने वाले पैरा एशियन गेम्स में फिर से गोल्ड मेडल जीतना है।
शीतल देवी की कहानी सिर्फ खेल की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस हिम्मत की कहानी है जो परिस्थितियों से बड़ी होती है। एक ऐसी लड़की जिसने 15 साल की उम्र तक तीर-कमान देखा भी नहीं था, उसने सिर्फ तीन साल में दुनिया को अपना हुनर दिखा दिया। आज वह हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, यह बताने के लिए कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी सपना दूर नहीं होता।
गाँव से विदेश तक का सफऱ
शीतल और उनका परिवार
जब शीतल 15 साल की थीं, तब इलाज के लिए पहली बार गाँव से बाहर गईं। वहीं उनकी मुलाकात प्रीति नाम की एक खिलाड़ी से हुई, जिन्होंने उन्हें बताया कि शारीरिक चुनौतियों के बावजूद खेलों में करियर बनाया जा सकता है। इसके बाद शीतल का मूल्यांकन किया गया और पता चला कि वह स्विमिंग, रनिंग और तीरंदाजी जैसे खेल खेल सकती हैं।
पहली बार धनुष उठाया तो गिर गया
कठिनाई भरा रहा सफर
गाँव छोड़ते वक्त लिया था एक संकल्प
जब खुद से किया वादा हुआ पूरा
इंटरनेशनल मंच पर लहराया परचम
गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज तीनों मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया
शीतल देवी के जन्म के समय कई लोगों ने कहा था कि यह लड़की आगे क्या कर पाएगी। लेकिन उनके परिवार ने हमेशा उनका साथ दिया। शीतल बताती हैं, “मेरे परिवार ने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अलग हूँ। लोग बातें करते थे तो मेरी माँ रोती थीं, लेकिन मेरे दादा की माँ कहती थीं कि यह हमारी घर की लक्ष्मी है, देखना यह घर का नाम रोशन करेगी।” आज वही लोग उनके माता-पिता को बधाई देने आते हैं।
हौसले की मिसाल
लक्ष्य आने वाले पैरा एशियन गेम्स में फिर से गोल्ड मेडल जीतना-शीतल देवी
शीतल देवी की कहानी सिर्फ खेल की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस हिम्मत की कहानी है जो परिस्थितियों से बड़ी होती है। एक ऐसी लड़की जिसने 15 साल की उम्र तक तीर-कमान देखा भी नहीं था, उसने सिर्फ तीन साल में दुनिया को अपना हुनर दिखा दिया। आज वह हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, यह बताने के लिए कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी सपना दूर नहीं होता।