Siliguri Tea Workers Problem: बीमारी का ख़तरा, तेंदुए का ख़तरा, रोज़गार का ख़तरा, 11 घंटे मेहनत, मजदूरी सिर्फ 250 रुपये
Gaon Connection | Apr 21, 2026, 18:15 IST
सिलीगुड़ी के चाय बागानों में काम करने वाली मेहनती महिला मजदूर हर दिन कठिनाईयों का सामना करती हैं, लेकिन उन्हें महज 250 रुपये का मेहनताना मिलता है। यहाँ सुविधाओं की कमी है, जैसे शौचालय और आराम करने के स्थान की कमी और जंगली जानवरों के हमलों का खतरा हमेशा बना रहता है। गाँव कनेक्शन की टीम पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी पहुँची और इन श्रमिकों से बातचीत की।
चाय के स्वाद के पीछे छिपी मेहनत और संघर्ष, अब चुनावी माहौल
पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में फैले हरे-भरे चाय बागान बाहर से जितने खूबसूरत दिखते हैं, अंदर की जिंदगी उतनी ही मुश्किल है। ‘गाँव कनेक्शन’ की टीम जब यहाँ काम करने वाले मजदूरों, खासकर महिला श्रमिकों से बात करने पहुँची, तो उनकी जिंदगी की कड़वी हकीकत सामने आई। मजदूरों ने बताया कि रोजाना 10 से 11 घंटे तक कड़ी मेहनत करने के बावजूद उन्हें केवल 250 रुपये मजदूरी मिलती है। चाय के स्वाद के पीछे छिपी यह मेहनत और संघर्ष अब चुनावी माहौल में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
चाय बागान में काम करने वाली महिलाओं ने बताया कि उन्हें सुबह जल्दी काम पर पहुंँना पड़ता है और शाम तक लगातार काम करना होता है। कई मजदूरों ने कहा कि दिनभर खड़े रहकर पत्तियां तोड़नी पड़ती हैं, लेकिन मेहनताना सिर्फ 250 रुपये मिलता है। एक महिला मजदूर ने कहा, “11 घंटे काम करते हैं, लेकिन खर्चा कैसे चलेगा? बच्चों की पढ़ाई, दवाई और घर का खर्च सब इसी में करना पड़ता है।”
जब श्रमिलकों से पूछा गया कि कितनी मजदूरी मिलने पर ठीक से गुजारा हो सकता है, तो कई लोगों ने कहा कि कम से कम 500 रुपये रोज मिलने चाहिए। एक महिला ने कहा, “250 रुपये में आज के समय में कुछ नहीं होता। जैसे-तैसे जिंदगी चल रही है।”
मजदूरों ने बताया कि हर दिन काम मिलना भी तय नहीं होता। कई बार कुछ दिन काम मिलता है, फिर कई दिन इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में कम मजदूरी के साथ रोजगार की अनिश्चितता भी बड़ी समस्या है। कुछ श्रमिकों ने कहा कि भुगतान भी समय पर नहीं होता, जिससे घर चलाना और मुश्किल हो जाता है।
महिला मजदूरों ने बताया कि चाय बागानों में बुनियादी सुविधाओं की भी कमी है। कई जगह शौचालय नहीं हैं, बैठने की व्यवस्था नहीं है और लंबे समय तक काम करने के दौरान आराम का कोई इंतजाम नहीं होता।
चाय बागानों के आसपास घने जंगल होने के कारण यहाँ काम करने वालीं मजदूरों को जंगली जानवरों का भी डर रहता है। मजदूरों ने बताया कि कई बार तेंदुआ बागानों में आ जाता है और लोगों पर हमला भी कर चुका है। इसके अलावा कीटनाशक, लगातार मेहनत और मौसम की मार से मजदूरों के बीमार पड़ने का ख़तरा भी बना रहता है।
जब मजदूरों से पूछा गया कि क्या वे अपने बच्चों या आने वाली बहू को भी चाय बागान में काम करते देखना चाहते हैं, तो जवाब साफ था-नहीं। एक महिला ने कहा, “हम चाहते हैं बच्चे पढ़ें-लिखें और अच्छा काम करें। हमारी तरह मजदूरी न करें।” पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच चाय बागान मजदूरों की मजदूरी और जीवन स्तर बड़ा मुद्दा बन रहा है। मजदूरों का कहना है कि चुनाव के समय नेता वादे करते हैं, लेकिन बाद में उनकी समस्याएं जस की तस रह जाती हैं।
सिलीगुड़ी नॉर्थ बंगाल का प्रमुख इलाका है और चाय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। भारत के कुल चाय उत्पादन में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है। ऐसे में लाखों मजदूरों की जिंदगी इसी उद्योग पर निर्भर है। हर सुबह जो चाय लोगों के घरों तक पहुंचती है, उसके पीछे इन मजदूरों का पसीना और संघर्ष छिपा है। कम मजदूरी, असुरक्षित माहौल और बुनियादी सुविधाओं की कमी चाय बागान मजदूरों की बड़ी चुनौतियां हैं। सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में उनकी जिंदगी में भी मिठास आएगी?
सुबह से शाम तक काम, फिर भी कमाई बेहद कम
रोशनी, चाय श्रमिक, सिलिगुड़ी, पश्चिम बंगाल
मजदूर बोले- 500 रुपये मिले तो गुजारा हो
रोज काम भी नहीं मिलता
हर दिन नहीं मिलता पैसा, 12 दिन में एक बार होती है पेमेंट-चाय बागान श्रमिक
शौचालय नहीं, आराम की जगह नहीं
बीमारी और जंगली जानवरों का खतरा
जंगली जानवरों का भी रहता है ख़तरा
बच्चों को इस काम में नहीं भेजना चाहते मजदूर
सिलिगुड़ी चाय बागान महिला श्रमिक-रोशनी
सिलीगुड़ी और चाय उद्योग की अहमियत
घरों को लौटते चाय श्रमिक