जब गाँव के करघो ने जीता दुनिया का दिल: जानें उत्तर-प्रदेश के सीतापुर में बनने वाली हैंडलूम दरियाँ क्यों है विदेशों तक मशहूर
Gaon Connection | Apr 25, 2026, 13:23 IST
उत्तर प्रदेश के सीतापुर की हैंडलूम दरियाँ आज अपनी खास पहचान बना चुकी हैं। यहाँ के कारीगर सदियों से इन्हें हाथों से बनाते आ रहे हैं। कॉटन, जूट और वूल जैसे धागों से ये दरियाँ तैयार होती हैं। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना ने इस कला को नई दिशा दी है।
ODOP के तरह मिली सीतापुर की दगियों को नई पहचान
वैसे तो उत्तर प्रदेश के हर क्षेत्र की बात ही अलग है, चाहे वह राधारानी का ब्रज हो या भोलेनाथ की काशी, चिकनकारी वाला लखनऊ हो या चूड़ियों वाला फिरोजाबाद। हर जगह यूपी वाले अपना परचम लहराते ही रहते हैं। पूरे देश में सबसे ज्यादा गाँव भी यूपी में ही हैं। और आज हम बात करेंगे एक ऐसे गाँव की, जिसने विश्व तक अपनी धाक जमा रखी है।
सीतापुर – एक बेहद खूबसूरत और शांत शहर, जिसे राजा विक्रमादित्य ने बसवाया था और देवी सीता के नाम पर इस जगह का नामकरण किया गया। नैमिषारण्य नामक तीर्थ भी इसी शहर में स्थित है, जहाँ हजारों श्रद्धालु रोज दर्शन के लिए आते हैं। यहाँ के घाट भी काफी रमणीय हैं।
लेकिन जिस बात के लिए यह शहर विश्व-प्रख्यात है, वह है यहां के गाँव खैराबाद की हैंडलूम की दरियाँ। एक ऐसा उत्पाद जिसने अपनी सादगी और सुंदरता से सभी का दिल जीत लिया। जिसे यहाँ के कारीगर बहुत मेहनत और शिद्दत से, बिना किसी मशीनी उपकरण के, अपने हाथों द्वारा बनाते हैं। यहाँ दरी बनाने का काम लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी से चला आ रहा है, या फिर यह भी कह सकते हैं कि यह परंपरा मुगल काल से ही चली आ रही है।
आइए जानते हैं कि किस प्रकार हमारे कारीगर बंधु इस कला को मेहनत से बुनते हैं और हम तक पहुंचाते हैं:-
1. कच्चे माल का चयन
सबसे पहले धागों का चुनाव करते सीतापुर के कारीगर
2. रंगाई की प्रक्रिया
धागों पर होता है मांग के अनुसार रंगाई का काम
3. धागों को सुखाना
रंगाई के बाद धागों को सुखाना
4. बुनाई की प्रक्रिया
धागों को किया जाता है हैंडलूम पर सेट
5. फिनिशिंग
फिनिशिंग में ली जाती है मशीन की मदद, ताकि सिलाई ना निलके
सीतापुर की इन दरियों को मिला ODOP का साथ
सीतापुर की दरियाँ और खूबसूरत बैग्स
ODOP के साथ से स्थानीय बुनकरों को आर्थिक मजबूती मिली है। उनके उत्पाद अब राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहे जा रहे हैं। पहले जो कला सीमित संसाधनों में संघर्ष कर रही थी, आज वही आत्मनिर्भरता और सम्मान की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सरकारी सहयोग, डिजिटल प्लेटफॉर्म और बढ़ती जागरूकता ने इस पारंपरिक कला को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया है। अब जरूरत है इस विरासत को आगे बढ़ाने की, ताकि सीतापुर की दरी केवल एक उत्पाद न रहकर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के रूप में आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहे।