बच्चों की मासूमियत या सोशल मीडिया कंटेंट? स्कूलों में वायरल रील्स के ट्रेंड पर नीलेश मिसरा ने उठाए सवाल
Preeti Nahar | May 15, 2026, 18:28 IST
सोशल मीडिया का प्रभाव अब स्कूलों में भी दिखने लगा है, जहाँ बच्चे अपने विचार और मनोरंजन साझा कर रहे हैं। हालाँकि, शिक्षकों द्वारा बिना बच्चों की अनुमति के वीडियो बनाना और उसे वायरल करना चिंता का विषय है। गीतकार और लेखक नीलेश मिसरा विचारकों ने इस पर अपनी चिंता जताई है।
क्लासरूम या कंटेंट स्टूडियो? बच्चों के वायरल वीडियो पर उठे गंभीर सवाल
सोशल मीडिया के दौर में आज हर चीज़ “कंटेंट” बनती जा रही है यहाँ तक कि स्कूल और छोटे बच्चे भी। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और वायरल वीडियो की इस दौड़ में अब कई शिक्षक भी शामिल होते दिखाई दे रहे हैं। क्लासरूम के अंदर बच्चों के रोने, डरने, भावुक होने या मासूम हरकतों वाले वीडियो रिकॉर्ड किए जा रहे हैं और फिर उन्हें लाखों लोगों के सामने सोशल मीडिया पर डाल दिया जाता है। कई बार इन वीडियो को “क्यूट”, “इमोशनल” या “फनी” कहकर पोस्ट किया जाता है, लेकिन शायद ही कोई यह सोचता है कि जिस बच्चे का वीडियो बनाया जा रहा है, उसकी भावनाओं और निजता पर इसका क्या असर पड़ेगा।
हाल ही में लेखक और गीतकार Neelesh Misra ने भी इसी ट्रेंड पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर कोई बच्चा अपने सबसे कमजोर या असहज पल में है, तो क्या उसे कैमरे में कैद कर इंटरनेट पर डाल देना सही है? एक छोटा बच्चा यह समझने की स्थिति में नहीं होता कि उसका वीडियो क्यों बनाया जा रहा है, कौन लोग उसे देखेंगे और वह इंटरनेट पर कितने समय तक मौजूद रहेगा।
ऐसे में सवाल सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड का नहीं, बल्कि बच्चों की dignity, privacy और emotional safety का है। क्या स्कूल अब शिक्षा का स्थान कम और “वायरल कंटेंट” बनाने का माध्यम ज्यादा बनते जा रहे हैं? और सबसे जरूरी बात क्या माता-पिता की अनुमति के बिना बच्चों के वीडियो सार्वजनिक करना नैतिक और जिम्मेदार व्यवहार माना जा सकता है?
सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ “क्यूट कंटेंट” है या फिर बच्चों की निजता का उल्लंघन? छोटे बच्चों को यह समझ ही नहीं होता कि उनका वीडियो क्यों बनाया जा रहा है, उसे कौन देखेगा और वह इंटरनेट पर कितने समय तक रहेगा। रोते हुए या असहज बच्चे का वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच जाना उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्थिति पर असर डाल सकता है। इस तरह के मामलों को समझने के लिए गाँव कनेक्शन ने बात की दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के Psychiatrist डॉ राजीव मेहता से। डॉ राजीव बताते हैं कि -
1- बच्चों की वीडियो शेयर करने से पहले पैरेंट्स की अनुमति जरूरी होनी चाहिए
किसी भी स्कूल, शिक्षक या संस्था को किसी बच्चे की फोटो या वीडियो सोशल मीडिया या किसी भी इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर डालने से पहले उसके माता-पिता की स्पष्ट अनुमति लेना अनिवार्य होना चाहिए। छोटे बच्चों को यह समझ नहीं होता कि उनका वीडियो क्यों बनाया जा रहा है, वह कहाँ शेयर होगा और कितने लोग उसे देखेंगे। ऐसे में उनकी सहमति को “सहमति” नहीं माना जा सकता। इसलिए यह जिम्मेदारी स्कूल और शिक्षकों की बनती है कि वे बच्चों की प्राइवेसी और सुरक्षा को प्राथमिकता दें। कई देशों में बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं, क्योंकि एक बार कोई वीडियो इंटरनेट पर आ जाए तो उसे पूरी तरह हटाना लगभग असंभव हो जाता है।
2- वायरल होने की दौड़ में बच्चे “कंटेंट” बनते जा रहे हैं
आज सोशल मीडिया पर वायरल होने और फेम पाने की होड़ इतनी बढ़ चुकी है कि हर कोई अलग और भावनात्मक कंटेंट बनाना चाहता है। इसी ट्रेंड का असर अब स्कूलों में भी दिखाई देने लगा है। कई शिक्षक बच्चों के रोने, डरने, भावुक होने या मासूम हरकतों वाले वीडियो रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं। ऐसे वीडियो पर लाखों व्यूज़ और लाइक्स आते हैं, लेकिन शायद ही कोई यह सोचता है कि उस बच्चे पर इसका मानसिक असर क्या होगा। अगर किसी वीडियो में बच्चे को डांटा जा रहा हो, शर्मिंदा किया जा रहा हो, बुलिंग का शिकार बनाया जा रहा हो या उसकी कमजोरी को मजाक की तरह दिखाया जा रहा हो, तो इसका असर उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक रह सकता है। इंटरनेट कभी भूलता नहीं है आज का एक वायरल वीडियो बच्चे के भविष्य में भी उसका पीछा कर सकता है।
3- स्कूलों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीमित और जिम्मेदार होना चाहिए
स्कूल शिक्षा और बच्चों के विकास की जगह हैं, न कि वायरल कंटेंट बनाने का मंच। सोशल मीडिया का उपयोग अगर स्कूलों में किया भी जाए, तो उसका उद्देश्य सिर्फ शैक्षणिक और रचनात्मक होना चाहिए। जैसे किसी साइंस प्रोजेक्ट, सांस्कृतिक गतिविधि, खेल प्रतियोगिता या बच्चों को किताबों से हटकर कोई नई चीज़ सिखाने के लिए। लेकिन बच्चों की निजी भावनाओं, कमजोर पलों या व्यक्तिगत व्यवहार को रिकॉर्ड करके इंटरनेट पर डालना पूरी तरह गलत है। स्कूलों और शिक्षकों को यह समझना होगा कि बच्चों की गरिमा और भावनात्मक सुरक्षा किसी भी सोशल मीडिया ट्रेंड या वायरल वीडियो से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
इस मुद्दे से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें बच्चों के वीडियो वायरल होने के बाद विवाद हुआ, जाँच बैठी या नियम तक बनाने पड़े। कुछ अहम केस स्टडी इस तरह हैं:
दिल्ली और फरीदाबाद में “No Reels in Classrooms” आदेश
साल 2026 में दिल्ली और फरीदाबाद शिक्षा विभाग ने स्कूलों में रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाने पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए। कारण यही बताया गया कि सोशल मीडिया कंटेंट के लिए क्लासरूम का इस्तेमाल शिक्षा, अनुशासन और बच्चों की प्राइवेसी को प्रभावित कर रहा था। सिर्फ शैक्षणिक या जागरूकता वाले कंटेंट को अनुमति दी गई, वह भी पहले मंजूरी और सुरक्षा नियमों के साथ।
मुज़फ्फरनगर स्कूल वायरल वीडियो (2023)
उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक शिक्षिका दूसरे बच्चों से एक मुस्लिम छात्र को थप्पड़ लगवाती दिखी। वीडियो के वायरल होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई, पुलिस और बाल अधिकार आयोग तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस केस ने दिखाया कि कैमरे पर रिकॉर्ड हुई घटनाएँ बच्चों के मानसिक और सामाजिक जीवन पर कितना गहरा असर डाल सकती हैं।
भोपाल का “पैर दबवाने” वाला वीडियो
मध्य प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में बच्चों से शिक्षिका के पैर दबवाने का वीडियो वायरल हुआ। सोशल मीडिया पर भारी आलोचना हुई और शिक्षा विभाग ने जाँच शुरू की। यह मामला इसलिए अहम बना क्योंकि बच्चों की गरिमा और शिक्षक की पेशेवर मर्यादा दोनों पर सवाल उठे।
“Teacher TikTok Culture” पर अंतरराष्ट्रीय बहस
अमेरिका और दूसरे देशों में भी “Teachers on TikTok” को लेकर विवाद हुआ है। कई विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की फोटो/वीडियो पोस्ट करने से पहले माता-पिता की स्पष्ट अनुमति जरूरी होनी चाहिए, क्योंकि एक बार कंटेंट वायरल हो जाए तो उसे पूरी तरह हटाना लगभग असंभव हो जाता है।
सोशल मीडिया पर बच्चों की भावनात्मक स्थिति को “क्यूट” या “फनी कंटेंट” बनाकर पेश करने का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। रेडिट समेत कई प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे वीडियो चर्चा में रहे हैं, जिनमें बच्चे रोते हुए, डरे हुए या अपमानित महसूस करते नजर आए, लेकिन उन्हें मनोरंजन की तरह शेयर किया गया। बाद में कई लोगों ने इसे emotional exploitation यानी बच्चों की भावनाओं का इस्तेमाल कर लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश बताया। कई शिक्षकों, मनोवैज्ञानिकों और अभिभावकों ने भी माना कि बच्चों को सोशल मीडिया कंटेंट में बदलना एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है।
इन घटनाओं से एक बात साफ होती है कि मामला सिर्फ किसी वीडियो के वायरल होने का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या उस बच्चे की गरिमा और निजता सुरक्षित है? क्या उसके माता-पिता की अनुमति ली गई थी? क्या वह बच्चा इतना समझदार है कि उसे पता हो उसका वीडियो क्यों रिकॉर्ड किया जा रहा है और लाखों लोग उसे देख सकते हैं? और सबसे बड़ा सवाल क्या स्कूल, जो बच्चों के सुरक्षित और संवेदनशील विकास की जगह होने चाहिए, धीरे-धीरे “कंटेंट स्टूडियो” में बदलते जा रहे हैं?
इसी वजह से अब बड़ी संख्या में लोग, शिक्षा विशेषज्ञ और अभिभावक इस विषय पर सख्त गाइडलाइंस की माँग कर रहे हैं। क्योंकि सोशल मीडिया का ट्रेंड कुछ दिनों में खत्म हो सकता है, लेकिन इंटरनेट पर मौजूद एक वीडियो और उससे जुड़ी यादें किसी बच्चे के मन पर लंबे समय तक असर छोड़ सकती हैं।
नीलेश मिसरा ने उठाया स्कूल में बच्चों की रील्स बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने का मुद्दा
ऐसे में सवाल सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड का नहीं, बल्कि बच्चों की dignity, privacy और emotional safety का है। क्या स्कूल अब शिक्षा का स्थान कम और “वायरल कंटेंट” बनाने का माध्यम ज्यादा बनते जा रहे हैं? और सबसे जरूरी बात क्या माता-पिता की अनुमति के बिना बच्चों के वीडियो सार्वजनिक करना नैतिक और जिम्मेदार व्यवहार माना जा सकता है?
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक?
दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के Psychiatrist डॉ राजीव मेहता
किसी भी स्कूल, शिक्षक या संस्था को किसी बच्चे की फोटो या वीडियो सोशल मीडिया या किसी भी इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर डालने से पहले उसके माता-पिता की स्पष्ट अनुमति लेना अनिवार्य होना चाहिए। छोटे बच्चों को यह समझ नहीं होता कि उनका वीडियो क्यों बनाया जा रहा है, वह कहाँ शेयर होगा और कितने लोग उसे देखेंगे। ऐसे में उनकी सहमति को “सहमति” नहीं माना जा सकता। इसलिए यह जिम्मेदारी स्कूल और शिक्षकों की बनती है कि वे बच्चों की प्राइवेसी और सुरक्षा को प्राथमिकता दें। कई देशों में बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं, क्योंकि एक बार कोई वीडियो इंटरनेट पर आ जाए तो उसे पूरी तरह हटाना लगभग असंभव हो जाता है।
2- वायरल होने की दौड़ में बच्चे “कंटेंट” बनते जा रहे हैं
आज सोशल मीडिया पर वायरल होने और फेम पाने की होड़ इतनी बढ़ चुकी है कि हर कोई अलग और भावनात्मक कंटेंट बनाना चाहता है। इसी ट्रेंड का असर अब स्कूलों में भी दिखाई देने लगा है। कई शिक्षक बच्चों के रोने, डरने, भावुक होने या मासूम हरकतों वाले वीडियो रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं। ऐसे वीडियो पर लाखों व्यूज़ और लाइक्स आते हैं, लेकिन शायद ही कोई यह सोचता है कि उस बच्चे पर इसका मानसिक असर क्या होगा। अगर किसी वीडियो में बच्चे को डांटा जा रहा हो, शर्मिंदा किया जा रहा हो, बुलिंग का शिकार बनाया जा रहा हो या उसकी कमजोरी को मजाक की तरह दिखाया जा रहा हो, तो इसका असर उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक रह सकता है। इंटरनेट कभी भूलता नहीं है आज का एक वायरल वीडियो बच्चे के भविष्य में भी उसका पीछा कर सकता है।
3- स्कूलों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीमित और जिम्मेदार होना चाहिए
स्कूल शिक्षा और बच्चों के विकास की जगह हैं, न कि वायरल कंटेंट बनाने का मंच। सोशल मीडिया का उपयोग अगर स्कूलों में किया भी जाए, तो उसका उद्देश्य सिर्फ शैक्षणिक और रचनात्मक होना चाहिए। जैसे किसी साइंस प्रोजेक्ट, सांस्कृतिक गतिविधि, खेल प्रतियोगिता या बच्चों को किताबों से हटकर कोई नई चीज़ सिखाने के लिए। लेकिन बच्चों की निजी भावनाओं, कमजोर पलों या व्यक्तिगत व्यवहार को रिकॉर्ड करके इंटरनेट पर डालना पूरी तरह गलत है। स्कूलों और शिक्षकों को यह समझना होगा कि बच्चों की गरिमा और भावनात्मक सुरक्षा किसी भी सोशल मीडिया ट्रेंड या वायरल वीडियो से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
ऐसे कई मामलों पर उठी बहस
दिल्ली और फरीदाबाद में “No Reels in Classrooms” आदेश
क्लासरूम में न बनाएं कोई रील
मुज़फ्फरनगर स्कूल वायरल वीडियो (2023)
मुज़फ्फरनगर का वह वायरल वीडियो की रिपोर्ट
भोपाल का “पैर दबवाने” वाला वीडियो
मध्य प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में बच्चों से शिक्षिका के पैर दबवाने का वीडियो वायरल हुआ। सोशल मीडिया पर भारी आलोचना हुई और शिक्षा विभाग ने जाँच शुरू की। यह मामला इसलिए अहम बना क्योंकि बच्चों की गरिमा और शिक्षक की पेशेवर मर्यादा दोनों पर सवाल उठे।
स्कूल के बच्चे शिक्षिका के पैर दबाते दिखे- रिपोर्ट
अमेरिका और दूसरे देशों में भी “Teachers on TikTok” को लेकर विवाद हुआ है। कई विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की फोटो/वीडियो पोस्ट करने से पहले माता-पिता की स्पष्ट अनुमति जरूरी होनी चाहिए, क्योंकि एक बार कंटेंट वायरल हो जाए तो उसे पूरी तरह हटाना लगभग असंभव हो जाता है।
डिट समेत कई प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे वीडियो चर्चा में
इन घटनाओं से एक बात साफ होती है कि मामला सिर्फ किसी वीडियो के वायरल होने का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या उस बच्चे की गरिमा और निजता सुरक्षित है? क्या उसके माता-पिता की अनुमति ली गई थी? क्या वह बच्चा इतना समझदार है कि उसे पता हो उसका वीडियो क्यों रिकॉर्ड किया जा रहा है और लाखों लोग उसे देख सकते हैं? और सबसे बड़ा सवाल क्या स्कूल, जो बच्चों के सुरक्षित और संवेदनशील विकास की जगह होने चाहिए, धीरे-धीरे “कंटेंट स्टूडियो” में बदलते जा रहे हैं?
इसी वजह से अब बड़ी संख्या में लोग, शिक्षा विशेषज्ञ और अभिभावक इस विषय पर सख्त गाइडलाइंस की माँग कर रहे हैं। क्योंकि सोशल मीडिया का ट्रेंड कुछ दिनों में खत्म हो सकता है, लेकिन इंटरनेट पर मौजूद एक वीडियो और उससे जुड़ी यादें किसी बच्चे के मन पर लंबे समय तक असर छोड़ सकती हैं।