चीनी महँगी क्यों हुई? 10 साल में कैसे बदला पूरा गणित, बढ़ती खपत से एथेनॉल और घटते स्टॉक तक जानिए असली वजह
Mansi | Aug 22, 2026, 16:17 IST
भारत में चीनी का उपभोग तेजी से बढ़ रहा है, जबकि शुरुआती भंडार क्षीण हो चुके हैं। गन्ने से एथेनॉल की मांग ने चीनी के उत्पादन को प्रभावित किया है। हालांकि भारत पिछले दस वर्षों से चीनी का बड़ा निर्यातक बना रहा है, अब आयात की आवश्यकता उत्पन्न हो गई है। मौसमी उतार-चढ़ाव भी चीनी की उपलब्धता पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं।
घटते स्टॉक और बढ़ती मांग के बीच चीनी की कीमतों में तेज़ उछाल
सुबह की चाय हो, मिठाई की दुकान हो या त्योहारों की तैयारी चीनी के दाम बढ़ने का असर सीधे घर की रसोई और कारोबार, दोनों पर दिखाई देता है। लेकिन सवाल यह है कि गन्ने और चीनी के मामले में दुनिया के बड़े उत्पादक देशों में शामिल भारत आज 10 लाख टन कच्ची चीनी आयात करने की स्थिति तक कैसे पहुँचा?
इसकी तस्वीर सिर्फ़ आज की कीमत देखकर समझना मुश्किल है। पिछले करीब एक दशक में भारत में चीनी की खपत, उत्पादन, आयात-निर्यात और एथेनॉल की मांग में बड़ा बदलाव आया है। इसके साथ मौसम और गन्ने की पैदावार ने भी बाजार में चीनी की उपलब्धता को प्रभावित किया है।
करीब 10 साल पहले यानी वित्त वर्ष 2015-16 में भी भारत ने चीनी का आयात किया था। वाणिज्य मंत्रालय की ओर से लोकसभा में दिए गए आँकड़ों के मुताबिक़, उस साल भारत ने करीब 19.43 लाख टन चीनी आयात की थी, जिसकी कीमत लगभग 612.24 मिलियन डॉलर थी। इसी साल करीब 38.44 लाख टन चीनी का निर्यात भी हुआ था।
उस समय देश में घरेलू चीनी खपत करीब 2.55 करोड़ टन थी, जबकि 2016-17 के लिए यह लगभग 2.6 करोड़ टन रहने का अनुमान लगाया गया था। आज भारत में सालाना चीनी की घरेलू खपत आम तौर पर 2.6 से 2.8 करोड़ टन के आसपास रहती है। यानी एक दशक में मांग में बड़ा बदलाव आया है और देश को हर साल घरेलू बाजार के लिए करोड़ों टन चीनी की जरूरत होती है।
भारत के चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश की भूमिका सबसे अहम है। पीआईबी के मुताबिक़ 2024-25 में देश के कुल गन्ना उत्पादन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 48.5 प्रतिशत थी। इसके बाद महाराष्ट्र 24.1 प्रतिशत और कर्नाटक 10.5 प्रतिशत के साथ रहे। कृषि मंत्रालय के अनुसार 2024-25 में भारत में करीब 454.61 मिलियन टन गन्ने का उत्पादन हुआ।
गन्ने की कहानी अब सिर्फ़ चीनी तक सीमित नहीं रही। इसी गन्ने से बनने वाला एथेनॉल भारत की ऊर्जा नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के लिए सरकार ने एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम को बढ़ावा दिया है। इसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और घरेलू स्तर पर तैयार एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाना है।
पीआईबी के आँकड़ों के मुताबिक़, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने 2015-16 में 111.4 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदा था। यह खरीद 2017-18 में 150.5 करोड़ लीटर, 2018-19 में 188.56 करोड़ लीटर, 2020-21 में 302.30 करोड़ लीटर, 2021-22 में 408.09 करोड़ लीटर और 2022-23 में 505.10 करोड़ लीटर हो गई। 2023-24 में यह करीब 707 करोड़ लीटर और 2024-25 में बढ़कर 1,022 करोड़ लीटर हो गई।
करीब एक दशक में तेल कंपनियों की एथेनॉल खरीद 111.4 करोड़ लीटर से बढ़कर 1,022 करोड़ लीटर हो गई। एथेनॉल के लिए गन्ने का रस, चीनी, सिरप और शीरे जैसे स्रोतों का इस्तेमाल होता है। इसका मतलब यह है कि गन्ने से बनने वाले उत्पादों का एक हिस्सा अब एथेनॉल की ओर भी जा रहा है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि चीनी सिर्फ़ एथेनॉल की वजह से महँगी हुई है। कीमतों पर उत्पादन, घरेलू खपत, स्टॉक, मौसम, निर्यात और सरकारी नीतियों का भी असर पड़ता है।
गन्ने की फसल मौसम से काफी प्रभावित होती है। बारिश, तापमान और पानी की उपलब्धता में बदलाव से गन्ने की पैदावार और चीनी की रिकवरी पर असर पड़ सकता है। अमेरिकी कृषि विभाग की 2026 की रिपोर्ट में 2025-26 के चीनी उत्पादन अनुमान में कमी के कारणों में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में अगस्त-सितंबर 2025 के दौरान हुई अधिक बारिश को भी शामिल किया गया था। यानी हर साल सिर्फ़ कम बारिश ही समस्या नहीं होती, कई बार अत्यधिक बारिश भी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
दूसरी तरफ़ भारत पिछले दशक में बड़े चीनी निर्यातकों में भी रहा। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के आँकड़ों के मुताबिक़ 2018-19 में करीब 38 लाख टन, 2019-20 में 60 लाख टन, 2020-21 में 70 लाख टन और 2021-22 में रिकॉर्ड करीब 110 लाख टन चीनी का निर्यात हुआ। बाद में घरेलू उपलब्धता को देखते हुए सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंध और कोटा जैसे कदम उठाए। 2024-25 में निर्यात करीब 9 लाख टन रहा। मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ी चिंता स्टॉक को लेकर है। आमतौर पर 30 सितंबर को चीनी मिलों के पास करीब 60-70 लाख टन स्टॉक बचता है, लेकिन इस बार नया सीज़न शुरू होने से पहले यह करीब 35 लाख टन रहने का अनुमान है। पिछले साल यह करीब 47 लाख टन था। ऐसे समय में अगस्त से नवंबर के बीच त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ना बाजार पर और दबाव डाल सकता है।
इसी स्थिति के बीच 20 अगस्त 2026 को डीजीएफ़टी ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी। टैरिफ़ रेट कोटा यानी टीआरक्यू के तहत यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा। आयातित कच्ची चीनी को रिफाइन करके तैयार चीनी घरेलू बाजार में बेचनी होगी।
सरकार फिलहाल एक तरफ़ विदेश से अतिरिक्त चीनी मंगाकर घरेलू सप्लाई बढ़ाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ़ एथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन, स्टॉक और नई फसल पर भी नजर है। तो असली कहानी सिर्फ़ चीनी के दाम बढ़ने की नहीं है। पिछले 10 साल में भारत की चीनी खपत, एथेनॉल की मांग, निर्यात, उत्पादन और मौसम, सबने मिलकर गन्ने का गणित बदल दिया है। अब चुनौती यह है कि किसानों की आय और एथेनॉल की जरूरत पूरी करते हुए घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता और कीमतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
इसकी तस्वीर सिर्फ़ आज की कीमत देखकर समझना मुश्किल है। पिछले करीब एक दशक में भारत में चीनी की खपत, उत्पादन, आयात-निर्यात और एथेनॉल की मांग में बड़ा बदलाव आया है। इसके साथ मौसम और गन्ने की पैदावार ने भी बाजार में चीनी की उपलब्धता को प्रभावित किया है।
10 साल पहले कितनी चीनी आयात करता था भारत?
उस समय देश में घरेलू चीनी खपत करीब 2.55 करोड़ टन थी, जबकि 2016-17 के लिए यह लगभग 2.6 करोड़ टन रहने का अनुमान लगाया गया था। आज भारत में सालाना चीनी की घरेलू खपत आम तौर पर 2.6 से 2.8 करोड़ टन के आसपास रहती है। यानी एक दशक में मांग में बड़ा बदलाव आया है और देश को हर साल घरेलू बाजार के लिए करोड़ों टन चीनी की जरूरत होती है।
भारत के चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश की भूमिका सबसे अहम है। पीआईबी के मुताबिक़ 2024-25 में देश के कुल गन्ना उत्पादन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 48.5 प्रतिशत थी। इसके बाद महाराष्ट्र 24.1 प्रतिशत और कर्नाटक 10.5 प्रतिशत के साथ रहे। कृषि मंत्रालय के अनुसार 2024-25 में भारत में करीब 454.61 मिलियन टन गन्ने का उत्पादन हुआ।
एथेनॉल की बढ़ती मांग ने बदला गन्ने का खेल
पीआईबी के आँकड़ों के मुताबिक़, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने 2015-16 में 111.4 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदा था। यह खरीद 2017-18 में 150.5 करोड़ लीटर, 2018-19 में 188.56 करोड़ लीटर, 2020-21 में 302.30 करोड़ लीटर, 2021-22 में 408.09 करोड़ लीटर और 2022-23 में 505.10 करोड़ लीटर हो गई। 2023-24 में यह करीब 707 करोड़ लीटर और 2024-25 में बढ़कर 1,022 करोड़ लीटर हो गई।
करीब एक दशक में तेल कंपनियों की एथेनॉल खरीद 111.4 करोड़ लीटर से बढ़कर 1,022 करोड़ लीटर हो गई। एथेनॉल के लिए गन्ने का रस, चीनी, सिरप और शीरे जैसे स्रोतों का इस्तेमाल होता है। इसका मतलब यह है कि गन्ने से बनने वाले उत्पादों का एक हिस्सा अब एथेनॉल की ओर भी जा रहा है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि चीनी सिर्फ़ एथेनॉल की वजह से महँगी हुई है। कीमतों पर उत्पादन, घरेलू खपत, स्टॉक, मौसम, निर्यात और सरकारी नीतियों का भी असर पड़ता है।
मौसम, निर्यात और घटते स्टॉक ने भी बढ़ाया दबाव
दूसरी तरफ़ भारत पिछले दशक में बड़े चीनी निर्यातकों में भी रहा। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के आँकड़ों के मुताबिक़ 2018-19 में करीब 38 लाख टन, 2019-20 में 60 लाख टन, 2020-21 में 70 लाख टन और 2021-22 में रिकॉर्ड करीब 110 लाख टन चीनी का निर्यात हुआ। बाद में घरेलू उपलब्धता को देखते हुए सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंध और कोटा जैसे कदम उठाए। 2024-25 में निर्यात करीब 9 लाख टन रहा। मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ी चिंता स्टॉक को लेकर है। आमतौर पर 30 सितंबर को चीनी मिलों के पास करीब 60-70 लाख टन स्टॉक बचता है, लेकिन इस बार नया सीज़न शुरू होने से पहले यह करीब 35 लाख टन रहने का अनुमान है। पिछले साल यह करीब 47 लाख टन था। ऐसे समय में अगस्त से नवंबर के बीच त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ना बाजार पर और दबाव डाल सकता है।
अब 10 लाख टन कच्ची चीनी क्यों मंगाई जा रही है?
सरकार फिलहाल एक तरफ़ विदेश से अतिरिक्त चीनी मंगाकर घरेलू सप्लाई बढ़ाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ़ एथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन, स्टॉक और नई फसल पर भी नजर है। तो असली कहानी सिर्फ़ चीनी के दाम बढ़ने की नहीं है। पिछले 10 साल में भारत की चीनी खपत, एथेनॉल की मांग, निर्यात, उत्पादन और मौसम, सबने मिलकर गन्ने का गणित बदल दिया है। अब चुनौती यह है कि किसानों की आय और एथेनॉल की जरूरत पूरी करते हुए घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता और कीमतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।