गन्ने की खेती में आएगा बदलाव, अच्छे बीज के लिए लखनऊ में बनेगा सेंटर, ISMA-ICAR साथ मिलकर करेंगे काम, जानिए किसानों को क्या मिलेगा
Mansi | Aug 14, 2026, 13:36 IST
लखनऊ में एक नया केंद्र स्थापित किया जाएगा, जहां गन्ने की रोपण सामग्री की गुणवत्ता को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा। यह केंद्र आईसीएआर-आईएसआरआई और आईएसएमए के सहयोग से संचालित होगा। किसानों को यहाँ रोगमुक्त बीज और उच्च गुणवत्ता वाली किस्में उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे गन्ने की उत्पादकता में सुधार होगा और चीनी की रिकवरी बेहतर होगी। कृषि में नवाचार लाने के लिए यह केंद्र महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।
लखनऊ में प्रस्तावित नए सेंटर से किसानों को रोगमुक्त और बेहतर गुणवत्ता वाले गन्ने के बीज मिलने की उम्मीद है
गन्ने की खेती में अच्छी पैदावार के लिए सिर्फ़ खेत और मौसम ही मायने नहीं रखते, बीज की गुणवत्ता भी उतनी ही अहम होती है। अगर रोपण सामग्री अच्छी हो तो फसल की बढ़वार, उत्पादन और चीनी की रिकवरी बेहतर हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए लखनऊ में एक नया सेंटर तैयार करने की योजना है। यह सेंटर आईसीएआर-इंडियन शुगरकेन रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-ISRI) के परिसर में बनाया जाएगा।
इसके लिए इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और ICAR-ISRI के बीच साझेदारी की गई है। सेंटर के निर्माण और विकास पर करीब 80 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह खर्च दोनों संस्थाएं बराबर यानी 50:50 के आधार पर साझा करेंगी। ICAR तकनीकी और वैज्ञानिक सहयोग देगा, जबकि ISMA बुनियादी ढाँचा तैयार करने में निवेश करेगा।
इस सेंटर का सबसे बड़ा मक़सद किसानों तक रोगमुक्त, शुद्ध और बेहतर पैदावार वाली गन्ने की रोपण सामग्री पहुँचाना होगा। गन्ने में कई बार बीमारी और कीटों की वजह से पुरानी किस्मों की उत्पादकता प्रभावित होती है। ऐसे में स्वस्थ बीज मिलने से किसानों को बेहतर किस्मों की ओर बढ़ने में मदद मिल सकती है। ICAR की पहले की पहल से भी यह सामने आया है कि उत्तर प्रदेश में स्वस्थ गन्ना बीज सामग्री की कमी को दूर करने और नई किस्मों को किसानों तक पहुँचाने पर काम हुआ है। ICAR-IISR के अनुसार, बेहतर किस्मों और स्वस्थ बीज सामग्री के इस्तेमाल से राज्य में गन्ने की उत्पादकता और चीनी उत्पादन में सुधार लाने में मदद मिली है।
नया सेंटर सिर्फ़ बीज तैयार करने तक सीमित नहीं रहेगा। यहाँ तैयार होने वाली रोपण सामग्री की गुणवत्ता और आनुवंशिक शुद्धता की जाँच की जाएगी। खेतों में अलग-अलग गन्ने की किस्मों के प्रदर्शन को भी देखा जाएगा, ताकि यह समझा जा सके कि कौन-सी किस्म किस क्षेत्र और परिस्थिति में बेहतर परिणाम दे रही है। बीज की हर खेप की पहचान और उसकी निगरानी के लिए टैगिंग और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी व्यवस्था भी प्रस्तावित है। इससे किसानों तक पहुँचने वाले बीज के बारे में जानकारी को रिकॉर्ड करना आसान होगा।
गन्ने की खेती में एक बड़ी चुनौती यह भी है कि कई इलाकों में किसान लंबे समय से एक ही किस्म पर निर्भर रहते हैं। इससे बीमारी फैलने या किसी किस्म की उत्पादकता कम होने पर किसानों को नुकसान हो सकता है। प्रस्तावित सेंटर के जरिए चीनी मिलों के क्षेत्रों में पुरानी गन्ना किस्मों को धीरे-धीरे बेहतर किस्मों से बदलने और फसल में विविधता बढ़ाने पर काम किया जाएगा। इससे किसानों को अपने क्षेत्र के हिसाब से नई किस्मों का विकल्प मिल सकता है। नई गन्ना किस्म तैयार करने और उसे बड़ी संख्या में किसानों तक पहुँचाने में समय लगता है। प्रस्तावित सेंटर में नियंत्रित और वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से बेहतर किस्मों की रोपण सामग्री को तेजी से बढ़ाने पर काम किया जाएगा। इसका फायदा यह हो सकता है कि नई किस्में सिर्फ़ शोध संस्थानों तक सीमित न रहें, बल्कि पर्याप्त मात्रा में तैयार होने के बाद किसानों तक भी पहुँच सकें।
अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का असर सिर्फ़ खेत में गन्ने की मात्रा पर नहीं पड़ता। गन्ने की गुणवत्ता का सीधा संबंध चीनी मिलों में होने वाली चीनी रिकवरी से भी है। ISMA का कहना है कि बेहतर रोपण सामग्री से गन्ने की उत्पादकता और चीनी की रिकवरी बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इसका मतलब है कि अगर किसान को अच्छी किस्म और स्वस्थ बीज समय पर मिलता है, तो उसकी फसल की गुणवत्ता और कमाई दोनों बेहतर होने की संभावना रहती है। सेंटर में गन्ने की नई किस्मों और वैज्ञानिक खेती से जुड़ी जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाएगी। गन्ना विकास से जुड़े कर्मचारियों को नई तकनीकों और किस्मों की जानकारी दी जाएगी, ताकि वे आगे किसानों तक इसे पहुँचा सकें। मतलब कोशिश सिर्फ़ “अच्छा बीज तैयार करने” की नहीं, बल्कि “अच्छा बीज किसान तक सही तरीके से पहुँचाने” की भी है।
कृषि क्षेत्र में बीज की गुणवत्ता और उसकी पहचान को लेकर भी अब तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। सरकार ने सीड नेट पोर्टल के जरिए बीज की ट्रेसबिलिटी की व्यवस्था शुरू की है। पैकेट पर दिए गए QR कोड को स्कैन करके बीज की किस्म और उससे जुड़ी जानकारी हासिल की जा सकती है। गन्ने के बीज की डिजिटल निगरानी से किसानों को यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि उन्हें कौन-सी किस्म की रोपण सामग्री मिल रही है और उसका स्रोत क्या है।
उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में है और यहाँ गन्ने की खेती बड़ी संख्या में किसान करते हैं। ऐसे में अगर किसानों को समय पर स्वस्थ, प्रमाणित और क्षेत्र के अनुकूल रोपण सामग्री मिलती है तो इसका असर खेत की उत्पादकता से लेकर चीनी मिलों की रिकवरी तक दिखाई दे सकता है। ICAR-IISR पहले भी उत्तर प्रदेश के गन्ना विभाग, चीनी मिलों और किसानों के साथ मिलकर नई किस्मों और स्वस्थ बीज सामग्री को बढ़ावा देने पर काम करता रहा है।
इसके लिए इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और ICAR-ISRI के बीच साझेदारी की गई है। सेंटर के निर्माण और विकास पर करीब 80 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह खर्च दोनों संस्थाएं बराबर यानी 50:50 के आधार पर साझा करेंगी। ICAR तकनीकी और वैज्ञानिक सहयोग देगा, जबकि ISMA बुनियादी ढाँचा तैयार करने में निवेश करेगा।