Trellis System: कम जगह में ज्यादा उत्पादन देगी ये वैज्ञानिक खेती, बढ़ेगी कमाई, जानिए क्यों बढ़ रही है इसकी लोकप्रियता?

Preeti Nahar | Jun 05, 2026, 17:57 IST
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मचान विधि (Trellis System) आज सब्जी उत्पादक किसानों के लिए एक लाभदायक तकनीक बनती जा रही है। कम जगह में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता के फल और रोग-कीटों के कम प्रकोप जैसे फायदे इसे खास बनाते हैं। आखिर कैसे बेल वाली फसलों की खेती में यह तकनीक किसानों की लागत घटाकर मुनाफा बढ़ा सकती है, जानिए इस आर्टिकल में।

व्यावसायिक स्तर पर सब्जियों की ट्रेलिस फार्मिंग<br>
व्यावसायिक स्तर पर सब्जियों की ट्रेलिस फार्मिंग
अगर आपको छोटी जगहों में खेती करके ज्यादा लाभ कमाना है तो इस आर्टिकल में ऐसी तकनीक के बारे में जानेंगे जिसे अपनाकर कम जगह में खेती करके भी बढ़िया मुनाफा कमाया जा सकता हैं। क्योंकि खेती में आजकल नए-नए प्रयोग हो रहे हैं, किसान पुरानी तकनीकों को छोड़ नई कृषि तरीकों को अपना रहे हैं।

ऐसी ही एक तकनीक है 'मचान' तकनीक जो खेती में बढ़ती लागत, घटती भूमि जोत और बेहतर गुणवत्ता वाली उपज की मांग को पूरा कर रही है। अगर आप सब्जियों की खेती करना चाहते हैं तो ये विधि आपके सबसे काम की हो सकती है। सब्जियों की खेती में मचान विधि (Trellis System) ऐसी ही एक आधुनिक और प्रभावी तकनीक है।

इसमें बेल वाली फसलों को जमीन पर फैलाने के बजाय बांस, तार या जाली के सहारे ऊपर की ओर बढ़ाया जाता है। इससे पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, रोगों का खतरा कम होता है और उत्पादन में तेजी देखी जाती है। यदि आप सब्जी की खेती से अधिक मुनाफा कमाने की सोच रहे हैं, तो यह जानना जरूरी है कि आखिर मचान विधि को आधुनिक बागवानी की गेम-चेंजर तकनीक क्यों कहा जा रहा है।

किन फसलों के लिए उपयुक्त है मचान विधि?

बड़े खेतों में तार और बांस से बने मचान
बड़े खेतों में तार और बांस से बने मचान
मचान तकनीक विशेष रूप से बेल वाली सब्जियों के लिए उपयोगी मानी जाती है। इसमें लौकी, करेला, खीरा, तोरई, परवल, सेम, ककड़ी, कुंदरू और कुछ क्षेत्रों में टमाटर जैसी फसलों की भी खेती की जाती है।

सामान्य तरीक से इन फसलों की ग्रोथ देखें तो इन फसलों की बेलें स्वाभाविक रूप से फैलती हैं। यदि इन्हें जमीन पर छोड़ दिया जाए तो इन फसलों के फल मिट्टी के संपर्क में आ जाते हैं, जिससे सड़न और कीटों का ख़तरा बढ़ जाता है। मचान पर उगाने से यह समस्या काफी हद तक दूर हो जाती है।

उत्पादन बढ़ाने में कैसे मदद करती है यह तकनीक?

व्यावसायिक स्तर पर सब्जियों की ट्रेलिस फार्मिंग
व्यावसायिक स्तर पर सब्जियों की ट्रेलिस फार्मिंग
मचान पर उगाए गए पौधों को चारों तरफ से धूप और हवा मिलती है। प्रकाश संश्लेषण बेहतर होने से पौधों की ग्रोथ तेज होती है और उनमें अधिक फूल एवं फल लगते हैं। इसके अलावा बेलों को ऊपर फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है, जिससे एक ही खेत में अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं।

Krishi Vibhag Gov UP की जानकारी के अनुसार कई फसलों में मचान विधि अपनाने से उत्पादन 20 से 40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। साथ ही फलों का आकार, रंग और गुणवत्ता भी बेहतर रहती है।

फल रहते हैं साफ और आकर्षक

मचान विधि से फसलें रहती है साफ
मचान विधि से फसलें रहती है साफ
जब फल जमीन पर नहीं गिरते तो उन पर मिट्टी नहीं लगती और वे साफ-सुथरे बने रहते हैं। मिट्टी के संपर्क में न आने से फलों में सड़न, दाग-धब्बे और फफूंद संक्रमण की संभावना भी कम हो जाती है।

ऐसे फलों को बाजार में बेहतर कीमत भी मिलती हैं और उनकी मांग भी अधिक रहती है। यही कारण है कि व्यावसायिक सब्जी उत्पादक तेजी से इस तकनीक की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

रोग और कीटों का खतरा होता है कम

कई बार जमीन पर लेटी हुई सब्जियों और बेलों में पत्तों और मिट्टी के कारण हवा पास नहीं हो पाती, लेकिन मचान पर चढ़ी बेलों में हवा का संचार बेहतर होता है, जिससे नमी कम जमा होती है। परिणामस्वरूप पत्तियों और फलों में फफूंद जनित रोगों का खतरा कम होता है। इसके अलावा खेत में दवा का छिड़काव भी आसानी से किया जा सकता है, जिससे कीट एवं रोग प्रबंधन आसान हो जाता है। इसके साथ पौधों की निगरानी और संक्रमित भागों की पहचान भी सरल हो जाती है।

कम जगह में ज्यादा खेती का अवसर

छोटी जगह में अधिक खेती
छोटी जगह में अधिक खेती
छोटे और सीमांत किसानों के लिए मचान तकनीक विशेष रूप से लाभदायक साबित हो सकती है। बेलों को ऊपर बढ़ाने से जमीन का उपयोग अधिक कुशलता से होता है। इससे सीमित भूमि में भी अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं और उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। जहाँ भूमि की उपलब्धता कम है, वहाँ यह तकनीक किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

मचान बनाने की सही विधि

  1. मचान तैयार करने के लिए खेत में मजबूत बांस, लोहे के पाइप या सीमेंट के खंभे लगाए जाते हैं।
  2. इन खंभों के ऊपर तार, रस्सी या जाली बांधी जाती है, जिस पर बेलों को चढ़ाया जाता है।
  3. आमतौर पर मचान की ऊंचाई 6 से 7 फीट रखी जाती है ताकि पौधों की देखभाल, दवा छिड़काव और तुड़ाई आसानी से की जा सके।
  4. जैसे-जैसे बेलें बढ़ती हैं, उन्हें समय-समय पर सहारा देकर ऊपर की ओर बांधना आवश्यक होता है।

कई प्रकार के मचान

बांस मचान- ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला और कम लागत वाला विकल्प। यह छोटे किसानों के लिए उपयुक्त माना जाता है।

तार या जाली मचान-बड़े स्तर की व्यावसायिक खेती के लिए बेहतर विकल्प। यह अधिक टिकाऊ होता है और लंबे समय तक उपयोग किया जा सकता है।

ए-फ्रेम मचान-खीरा, करेला और सेम जैसी फसलों के लिए लोकप्रिय संरचना। इसमें दोनों ओर से बेलों को बढ़ने का पर्याप्त स्थान मिलता है।

सफल खेती के लिए जरूरी सावधानियाँ

मचान बनाते समय रखे सावधानी
मचान बनाते समय रखे सावधानी
मचान को मजबूत बनाना बेहद जरूरी है ताकि तेज हवा या फलों के वजन से ढांचा क्षतिग्रस्त न हो। बेलों को नियमित रूप से बांधते रहना चाहिए और खेत में संतुलित खाद एवं सिंचाई का प्रबंधन करना चाहिए।

रोग और कीट नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना भी जरूरी है। सूखी और रोगग्रस्त पत्तियों को समय-समय पर हटाने से पौधे स्वस्थ बने रहते हैं और उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

किसानों के लिए क्यों फायदेमंद है यह तकनीक?

मचान विधि केवल उत्पादन बढ़ाने की तकनीक नहीं है, बल्कि यह गुणवत्ता सुधारने, रोग कम करने और किसानों की आय बढ़ाने का भी प्रभावी तरीका है। कम भूमि में अधिक उत्पादन, साफ और आकर्षक फल, आसान तुड़ाई तथा बेहतर बाजार मूल्य जैसे कई लाभ इसे आधुनिक सब्जी खेती/ Vegetable Farming की एक जरूरी तकनीक बनाते हैं। बदलती कृषि तकनीकों में मचान विधि अपनाकर किसान कम संसाधनों में अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं और अपनी खेती को अधिक लाभकारी बना सकते हैं।
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