त्रिपुरा के देसी चावल की विदेशों में धूम, 4 खास किस्में यूरोप के बाजार में पहुंचीं; किसानों को 40% ज्यादा दाम की उम्मीद
Gaon Connection | Sept 03, 2026, 15:13 IST
त्रिपुरा से एनपीओपी प्रमाणित चार पारंपरिक चावल की 18 मीट्रिक टन खेप ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड के लिए रवाना हुई है। इसमें काली खासा, हरिनारायण, बिरोन और मैमी हांगा चावल शामिल हैं। एपीडा की मदद से हुए इस निर्यात से स्थानीय किसानों और एफपीसी को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ने का अवसर मिलेगा। किसानों को घरेलू बाजार की तुलना में 40 प्रतिशत तक अधिक मूल्य मिलने की उम्मीद है।
किसानों के लिए खुला कमाई का नया दरवाजा
त्रिपुरा के पारंपरिक चावल को अब यूरोपीय बाजार में जगह मिलने लगी है। राज्य से एनपीओपी प्रमाणित चार पारंपरिक किस्मों की करीब 18 मीट्रिक टन चावल की खेप 2 सितंबर को ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड के लिए रवाना की गई। इस निर्यात को कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने सुविधा दी है। खेप में सुगंधित काली खासा, सुगंधित हरिनारायण, बिरोन यानी सफेद चिपचिपा चावल और मैमी हांगा यानी काला चावल शामिल हैं। चावल को त्रिपुरा की किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी) के जरिए एकत्र किया गया है, जिन्हें त्रिपुरा राज्य जैविक कृषि विकास एजेंसी (टीएसओएफडीए) का समर्थन मिला है। इसका निर्यात सोनीपत की प्रथिति ऑर्गेनिक फूड्स कर रही है।
इस निर्यात की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि त्रिपुरा का पारंपरिक चावल यूरोप पहुंच रहा है, बल्कि यह भी है कि किसानों को स्थानीय बाजार से बाहर खरीदारों तक पहुंचने का रास्ता मिल रहा है। एपीडा के मुताबिक इस खेप से जुड़े किसानों को घरेलू बाजार की तुलना में 40 प्रतिशत तक अधिक मूल्य मिलने की उम्मीद है। यह पहल पिछले महीने त्रिपुरा में आयोजित रिवर्स बायर-सेलर मीट का अगला चरण भी है, जहां संभावित विदेशी खरीदारों और स्थानीय उत्पादकों को आमने-सामने लाया गया था। यानी खरीदारों से हुई बातचीत अब वास्तविक निर्यात सौदे में बदलती दिख रही है।
ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड भेजी गई खेप में चार अलग-अलग पारंपरिक किस्में हैं। इनमें काली खासा और हरिनारायण सुगंधित चावल, बिरोन सफेद चिपचिपा चावल और मैमी हांगा काला चावल शामिल हैं। इन्हें त्रिपुरा की एफपीसी से एकत्रित किया गया है और निर्यात के लिए आवश्यक जैविक प्रमाणन प्रक्रिया के तहत तैयार किया गया है।
यूरोपीय बाजार तक पहुंचने से त्रिपुरा के छोटे किसानों और एफपीसी के लिए कमाई का एक नया रास्ता खुल सकता है। एपीडा के अनुसार इस निर्यात अवसर में शामिल किसानों को घरेलू बाजार की तुलना में 40 प्रतिशत तक अधिक मूल्य मिलने की उम्मीद है। इससे किसानों के लिए सिर्फ उत्पादन बढ़ाने ही नहीं, बल्कि प्रमाणित और निर्यात-उन्मुख तरीके से खेती करने का आर्थिक प्रोत्साहन भी पैदा होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में एफपीसी की भूमिका महत्वपूर्ण है। अलग-अलग किसानों की छोटी मात्रा को एकत्र कर एक समान गुणवत्ता, प्रमाणन और निर्यात के मानकों के अनुरूप तैयार करना आसान होता है। इससे किसानों की सीधे बड़े खरीदारों तक पहुंच बनाने की क्षमता बढ़ती है। एपीडा का कहना है कि प्रमाणन, ट्रेसबिलिटी और गुणवत्ता व्यवस्था को मजबूत करके किसानों तथा एफपीसी को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जा रहा है।
एनपीओपी यानी National Programme for Organic Production (राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम) भारत में जैविक उत्पादों के उत्पादन, निरीक्षण और प्रमाणन के लिए व्यवस्था उपलब्ध कराता है। एपीडा के मुताबिक इसके तहत जैविक उत्पादन के मानक, प्रमाणन एजेंसियों की मान्यता, निरीक्षण और ‘इंडिया ऑर्गेनिक’ लोगो जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। खास बात यह है कि एनपीओपी के मानकों को यूरोपीय आयोग ने बिना प्रसंस्करण वाले पौध-आधारित जैविक उत्पादों के लिए अपने मानकों के समकक्ष मान्यता दी है। इससे भारत के प्रमाणित जैविक उत्पादों के लिए यूरोपीय बाजार तक पहुंच आसान होती है।
यही वजह है कि ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड जैसे बाजारों के लिए सिर्फ चावल की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, प्रमाणन और ट्रेसबिलिटी भी महत्वपूर्ण हैं। त्रिपुरा की इस खेप को इन मानकों के अनुरूप प्रमाणित किया गया है। इससे राज्य के पारंपरिक और जैविक कृषि उत्पादों को आगे दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक ले जाने की संभावनाएं भी बनती हैं।
इस निर्यात की कड़ी पिछले महीने त्रिपुरा में एपीडा की ओर से आयोजित रिवर्स बायर-सेलर मीट (RBSM) से जुड़ी है। इसमें विदेशी खरीदारों और राज्य के स्थानीय उत्पादकों को एक मंच पर लाया गया था। अब उसी तरह के बाजार संपर्क का परिणाम वास्तविक निर्यात के रूप में सामने आया है। एपीडा के मुताबिक उसका लक्ष्य त्रिपुरा के विशिष्ट कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ना और राज्य में जैविक उत्पादों की निर्यात मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है।
खेप को त्रिपुरा के कृषि मंत्री रतन लाल नाथ, एपीडा अध्यक्ष अभिषेक देव और राज्य के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव अपुर्बा रॉय ने हरी झंडी दिखाई। कार्यक्रम में एपीडा, नाबार्ड, टीएसओएफडीए, निर्यातक, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के प्रतिनिधि और स्थानीय चावल किसान भी मौजूद रहे।
एपीडा के 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक भारत से एनपीओपी के तहत 3.68 लाख मीट्रिक टन से अधिक जैविक उत्पादों का निर्यात हुआ, जिसका कुल मूल्य करीब ₹5,394 करोड़ ($665.97 मिलियन) रहा। ऐसे में त्रिपुरा की 18 मीट्रिक टन चावल की खेप मात्रा में छोटी जरूर है, लेकिन पूर्वोत्तर के पारंपरिक उत्पादों को प्रमाणित करके वैश्विक बाजार से जोड़ने के लिहाज से इसका महत्व है।
इस निर्यात की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि त्रिपुरा का पारंपरिक चावल यूरोप पहुंच रहा है, बल्कि यह भी है कि किसानों को स्थानीय बाजार से बाहर खरीदारों तक पहुंचने का रास्ता मिल रहा है। एपीडा के मुताबिक इस खेप से जुड़े किसानों को घरेलू बाजार की तुलना में 40 प्रतिशत तक अधिक मूल्य मिलने की उम्मीद है। यह पहल पिछले महीने त्रिपुरा में आयोजित रिवर्स बायर-सेलर मीट का अगला चरण भी है, जहां संभावित विदेशी खरीदारों और स्थानीय उत्पादकों को आमने-सामने लाया गया था। यानी खरीदारों से हुई बातचीत अब वास्तविक निर्यात सौदे में बदलती दिख रही है।
चार किस्मों के चावल की यूरोप तक पहुंच
किसानों को मिल सकता है 40% तक ज्यादा दाम
इस पूरी प्रक्रिया में एफपीसी की भूमिका महत्वपूर्ण है। अलग-अलग किसानों की छोटी मात्रा को एकत्र कर एक समान गुणवत्ता, प्रमाणन और निर्यात के मानकों के अनुरूप तैयार करना आसान होता है। इससे किसानों की सीधे बड़े खरीदारों तक पहुंच बनाने की क्षमता बढ़ती है। एपीडा का कहना है कि प्रमाणन, ट्रेसबिलिटी और गुणवत्ता व्यवस्था को मजबूत करके किसानों तथा एफपीसी को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जा रहा है।
क्या है एनपीओपी, यूरोप के लिए क्यों जरूरी?
यही वजह है कि ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड जैसे बाजारों के लिए सिर्फ चावल की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, प्रमाणन और ट्रेसबिलिटी भी महत्वपूर्ण हैं। त्रिपुरा की इस खेप को इन मानकों के अनुरूप प्रमाणित किया गया है। इससे राज्य के पारंपरिक और जैविक कृषि उत्पादों को आगे दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक ले जाने की संभावनाएं भी बनती हैं।
पिछले महीने की खरीदार बैठक से निर्यात तक पहुंचा मामला
खेप को त्रिपुरा के कृषि मंत्री रतन लाल नाथ, एपीडा अध्यक्ष अभिषेक देव और राज्य के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव अपुर्बा रॉय ने हरी झंडी दिखाई। कार्यक्रम में एपीडा, नाबार्ड, टीएसओएफडीए, निर्यातक, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के प्रतिनिधि और स्थानीय चावल किसान भी मौजूद रहे।