‘बड़ा झटका आने वाला है, मुश्किल दिनों के लिए तैयार रहें', मिडिल ईस्ट युद्ध पर उदय कोटक की चेतावनी, ऐसे गाँवों में बढ़ेगी टेंशन!

Umang | May 13, 2026, 11:46 IST
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उद्योगपति उदय कोटक ने मिडिल ईस्ट के तनाव को देखते हुए भारतीयों को आर्थिक मुश्किलों के लिए तैयार रहने को कहा है। पेट्रोल-डीजल और ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से आम लोगों और कारोबारों पर दबाव बढ़ेगा। किसानों की लागत भी बढ़ेगी और खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं। सरकार पर भी सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा।
कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक और बैंकर उदय कोटक
कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक और बैंकर उदय कोटक
देश के जाने-माने उद्योगपति उदय कोटक ने मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान युद्ध के बीच भारतीयों को आने वाले कठिन आर्थिक दौर के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि आम लोगों ने अभी तक इस युद्ध का असली असर महसूस नहीं किया है लेकिन जल्द ही पेट्रोल-डीजल और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें घरों और कारोबारों पर बड़ा दबाव डाल सकती हैं। CII Annual Business Summit 2026 में बोलते हुए उदय कोटक ने कहा कि ऊर्जा की कीमतों में तेजी आने वाले समय में लोगों के बजट को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि पिछले दो महीनों से चल रहे मिडिल ईस्ट संकट का पूरा असर अभी बाजार और उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचा है।

'हमें सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए'

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लोगों से ईंधन बचाने, गैरजरूरी विदेशी यात्राओं से बचने और सोने की गैरजरूरी खरीद टालने की अपील कर चुके हैं। उदय कोटक ने कहा कि अस्थिरता के दौर में देशों को अपनी जरूरतों से ज्यादा खर्च करने से बचना चाहिए। उनके मुताबिक, “कुछ आसान कदम ऐसे होते हैं जिन्हें कोई भी देश अपना सकता है, जैसे गैरजरूरी खपत को कम करना।” उन्होंने कहा कि देशों को अपने वित्तीय प्रबंधन को उसी तरह संतुलित रखना चाहिए जैसे कोई कंपनी अपनी बैलेंस शीट संभालती है। कोटक ने चेतावनी दी कि तेल कंपनियां फिलहाल पुराने स्टॉक और इन्वेंट्री की मदद से “शॉक एब्जॉर्बर” की तरह काम कर रही हैं, जिससे आम लोगों पर तुरंत असर नहीं दिख रहा लेकिन यह राहत लंबे समय तक नहीं चल सकती। उन्होंने कहा, “हमें सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। मुश्किल समय आने का इंतजार करने के बजाय पहले से तैयारी जरूरी है।”

'झटका आने वाला है और बड़ा आने वाला है'

उदय कोटक के मुताबिक सीमित आय वाले लोगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने के साथ-साथ ट्रांसपोर्ट, खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा के सामान भी महंगे हो सकते हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “झटका आने वाला है और बड़ा आने वाला है। अभी तक उपभोक्ताओं ने असली दबाव महसूस नहीं किया है।” हालांकि उन्होंने यह भी माना कि अगर मिडिल ईस्ट का तनाव जल्द खत्म हो जाता है तो हालात सुधर सकते हैं लेकिन उन्होंने कहा, “अगर ईरान युद्ध खत्म नहीं होता, तो हममें से किसी के पास इसका साफ जवाब नहीं है।”

दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद उपभोक्ता देश है भारत

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और खासतौर पर ईरान के आसपास बढ़ते संघर्ष का असर अब केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा असर भारत की खेती, खाद की सप्लाई, डीजल की कीमतों और गांवों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह संकट लंबा चला, तो आने वाले महीनों में किसानों की लागत बढ़ सकती है और खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद उपभोक्ता देश है। यहां हर साल करीब 4 करोड़ टन यूरिया इस्तेमाल होता है। लेकिन बड़ी मात्रा में यूरिया, अमोनिया, प्राकृतिक गैस और दूसरी खाद बनाने वाली सामग्री विदेशों, खासकर खाड़ी देशों से आती है। यही वजह है कि मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ते ही भारत की चिंता भी बढ़ गई है।

बढ़ सकता है खेती का खर्च

विशेषज्ञों के मुताबिक यूरिया और दूसरी रासायनिक खाद बनाने में प्राकृतिक गैस की बड़ी भूमिका होती है। मिडिल ईस्ट में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ने से गैस और तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। इससे खाद और ईंधन दोनों महंगे हो रहे हैं। खेती पूरी तरह ऊर्जा पर निर्भर है। खेतों की सिंचाई के लिए डीजल चाहिए, ट्रैक्टर और मशीनें चलाने के लिए ईंधन चाहिए और फसल को मंडी तक पहुंचाने में भी तेल की जरूरत पड़ती है। ऐसे में अगर डीजल महंगा होता है तो खेती की पूरी लागत बढ़ जाती है।

गाँवों में क्या असर दिख सकता है?

अगर खाद और डीजल दोनों महंगे होते हैं, तो इसका सबसे बड़ा असर छोटे किसानों और गाँव के गरीब परिवारों पर पड़ सकता है। किसान अक्सर लागत बढ़ने पर खाद का इस्तेमाल कम कर देते हैं, जिससे फसल उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खाद की कमी लंबे समय तक बनी रही, तो धान, गेहूं जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इससे आगे चलकर खाने-पीने की चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं।

सरकार पर भी बढ़ेगा दबाव

भारत सरकार किसानों को सस्ती खाद देने के लिए भारी सब्सिडी देती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से सरकार का खर्च भी तेजी से बढ़ता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी खाद सब्सिडी पर सरकार का खर्च काफी बढ़ गया था। अब फिर वैसी ही स्थिति बनने का खतरा दिख रहा है। अगर सरकार किसानों को राहत देती है तो सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा और अगर कीमतें बढ़ाई जाती हैं तो किसानों की लागत बढ़ सकती है।

गाँव के बाजार और महंगाई पर असर

मिडिल ईस्ट संकट का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा। डीजल और ट्रांसपोर्ट महंगा होने से गाँवों में राशन, सब्जी, दूध और दूसरी जरूरी चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह संकट मानसून सीजन तक जारी रहा, तो खाद्य महंगाई की दूसरी बड़ी लहर देखने को मिल सकती है। इसका असर सीधे ग्रामीण परिवारों के मासिक बजट पर पड़ेगा।
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