मंडी की पहचान या किसानों की मेहनत? 'उंझा जीरा-सौंफ' जीआई टैग पर उठे सवाल
Gaon Connection | Jul 27, 2026, 15:35 IST
गुजरात के उंझा जीरा और उंझा सौंफ को जीआई टैग मिलने के बाद अंतरराज्यीय विवाद गहराया। राजस्थान के किसान सवाल उठा रहे हैं कि जब देश में सबसे अधिक जीरा उत्पादन उनके राज्य में होता है, तो पहचान केवल पड़ोसी राज्य गुजरात की मंडी के नाम पर क्यों दी गई?
'उंझा जीरा-सौंफ' जीआई टैग पर उठे सवाल
ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग किसी उत्पाद को केवल पहचान ही नहीं देता, बल्कि उसकी बाज़ार में अलग साख और आर्थिक मूल्य भी बढ़ाता है। लेकिन गुजरात के 'उंझा जीरा' और 'उंझा सौंफ' को जीआई टैग मिलने के बाद अब यह सम्मान एक नए विवाद का कारण बन गया है। राजस्थान के जीरा और सौंफ उत्पादक किसान इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं और इसे उत्पादन करने वाले किसानों के साथ न्याय का मुद्दा बता रहे हैं।
जनसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक किसानो का कहना है कि उंझा देश की सबसे बड़ी मसाला मंडियों में से एक है, लेकिन जीरा और सौंफ का बड़ा हिस्सा राजस्थान के कई जिलों में पैदा होता है। ऐसे में केवल व्यापारिक केंद्र के नाम पर जीआई टैग दिए जाने से वास्तविक उत्पादकों की पहचान और हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर गुजरात का तर्क है कि उंझा की वर्षों पुरानी व्यापारिक प्रतिष्ठा, गुणवत्ता नियंत्रण और बाज़ार पहचान ने इन मसालों को वैश्विक पहचान दिलाई है।
जीआई रजिस्ट्री के ओर से जारी प्रमाणपत्र के अनुसार, 'उंझा जीरा' के जीआई क्षेत्र में केवल मेहसाणा ही नहीं, बल्कि गुजरात के बनासकांठा, पाटन, अहमदाबाद, सुरेंद्रनगर, राजकोट, कच्छ सहित कुल 14 ज़िले शामिल किए गए हैं। विवाद की मुख्य वजह यह है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात के मेहसाणा जिले में जीरे की वास्तविक खेती का रकबा बहुत ही सीमित है। वर्ष 2024-25 में पूरे मेहसाणा ज़िले में केवल 174 हेक्टेयर में जीरे की खेती हुई और कुल उत्पादन मात्र 149 टन रहा, जबकि पूरे गुजरात राज्य में 4.76 लाख हेक्टेयर में 4.07 लाख टन जीरा पैदा हुआ था। दूसरी ओर, वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान 6.89 लाख टन जीरा उत्पादन के साथ पूरे देश में पहले स्थान पर है। इसके बावजूद, जीआई टैग गुजरात की मंडी 'उंझा' के नाम से पंजीकृत कर दिया गया है।
राजस्थान के किसानों का कहना है कि किसी कृषि उत्पाद की जीआई पहचान उसके वास्तविक 'उत्पादन क्षेत्र' (खेत की मिट्टी व जलवायु) से तय होनी चाहिए, न कि व्यापारिक मंडी से। बाड़मेर और जालौर के किसान उत्पादक संगठनों का कहना है कि उंझा मुख्य रूप से एक व्यापारिक बाज़ार है। राजस्थान की स्थानीय मंडियां होने के बावजूद उचित दाम और बड़े निर्यातकों की उपस्थिति के कारण किसान अपनी उपज उंझा मंडी में बेचने जाते हैं। किसानों को डर है कि अब इस जीआई टैग का इस्तेमाल कर व्यापारी राजस्थान के जीरे को 'गैर-जीआई' या कमतर बताकर किसानों से कम कीमत पर खरीदारी कर सकते हैं।
गुजरात सरकार और उंझा एपीएमसी ने जीआई रजिस्ट्री को सौंपे गए 1000 से अधिक पन्नों के वैज्ञानिक व ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए फैसले का बचाव किया है। उंझा एपीएमसी के प्रतिनिधियों के अनुसार, उंझा क्षेत्र जीरे और सौंफ की खेती व व्यापार का ऐतिहासिक केंद्र रहा है। यहां की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली, ग्रेडिंग, और वैश्विक निर्यात मानकों ने भारतीय जीरे को दुनिया भर में एक अलग पहचान दिलाई है। गुजरात पक्ष का मानना है कि जैसे 'गिर केसर आम' अपनी क्षेत्रीय पहचान रखता है, वैसे ही 'उंझा जीरा' की अपनी साख है। जीआई टैग से प्रमाणीकरण मजबूत होगी और नकली उत्पादों पर रोक लगेगी, जिससे निर्यात बढ़ेगा और मंडी में उपज लाने वाले सभी किसानों को अंततः बेहतर दाम मिलेंगे
जीआई टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक पहचान से जोड़ता है। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगाने, ब्रांड वैल्यू बढ़ाने और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेहतर कीमत मिलने में मदद मिलती है। हालांकि यह विवाद इस सवाल को भी सामने लाता है कि किसी कृषि उत्पाद की पहचान उसके उत्पादन क्षेत्र से जुड़नी चाहिए या उसके ऐतिहासिक व्यापारिक केंद्र से।
फिलहाल जीआई टैग जारी हो चुका है, लेकिन राजस्थान के किसान इस मुद्दे को आगे उठाने की तैयारी में हैं। आने वाले दिनों में इस पर विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के बीच चर्चा तेज़ होने की संभावना है। यह मामला केवल जीरा और सौंफ तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में अन्य कृषि उत्पादों के जीआई पंजीकरण के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
जनसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक किसानो का कहना है कि उंझा देश की सबसे बड़ी मसाला मंडियों में से एक है, लेकिन जीरा और सौंफ का बड़ा हिस्सा राजस्थान के कई जिलों में पैदा होता है। ऐसे में केवल व्यापारिक केंद्र के नाम पर जीआई टैग दिए जाने से वास्तविक उत्पादकों की पहचान और हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर गुजरात का तर्क है कि उंझा की वर्षों पुरानी व्यापारिक प्रतिष्ठा, गुणवत्ता नियंत्रण और बाज़ार पहचान ने इन मसालों को वैश्विक पहचान दिलाई है।
क्या है पूरा विवाद?
राजस्थान के किसानों की आपत्ति क्या है?
गुजरात का पक्ष क्या है?
जीआई टैग का महत्व क्या है?
फिलहाल जीआई टैग जारी हो चुका है, लेकिन राजस्थान के किसान इस मुद्दे को आगे उठाने की तैयारी में हैं। आने वाले दिनों में इस पर विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के बीच चर्चा तेज़ होने की संभावना है। यह मामला केवल जीरा और सौंफ तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में अन्य कृषि उत्पादों के जीआई पंजीकरण के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।