जलते जंगल: इस साल के फायर सीजन में 450 आग की घटनाएं दर्ज, 2 की मौत, हजारों हेक्टेयर वन भूमि तबाह
Preeti Nahar | May 28, 2026, 17:26 IST
जंगल की आग अब हर साल दोहराई जाने वाली गंभीर आपदा बन चुकी है। बढ़ते तापमान, सूखे मौसम और चीड़ के जंगलों में जमा पिरूल के कारण हर वर्ष सैकड़ों वनाग्नि घटनाएं सामने आती हैं। सरकारी और केंद्रीय एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 25 वर्षों में हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है। इससे न सिर्फ जंगल और वन्यजीव प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, जल स्रोत, खेती और पहाड़ी गांवों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है।
उत्तराखंड के अल्मोड़ा के जंगलों में लगी आग की भयावह तस्वीर
उत्तराखंड देश के सबसे अधिक वन क्षेत्र वाले राज्यों में शामिल है। राज्य का करीब 71 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से ढका हुआ है। लेकिन फरवरी से जून के बीच यहाँ जंगलों में लगने वाली आग की घटनाएं तेजी से बढ़ जाती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ के मुताबिक चीड़ के जंगलों में गिरने वाली सूखी पिरूल, बढ़ता तापमान, कम बारिश और तेज हवाएं आग को तेजी से फैलाती हैं। कई मामलों में खेत साफ करने, लापरवाही या जानबूझकर लगाई गई आग भी बड़ा कारण बनती है।
पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड राज्य के करीब 58 हजार हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आ चुके हैं, जबकि 2024 में ही 1,700 हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र प्रभावित होने का दावा किया गया। हर साल सैकड़ों वनाग्नि घटनाएं न सिर्फ हजारों पेड़ों और वन्यजीवों को नुकसान पहुँचा रही हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, जल स्रोतों और पहाड़ के ग्रामीण जीवन पर भी गहरा असर डाल रही हैं।
उत्तराखंड वन विभाग की 28 मई 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, 15 फरवरी 2026 से 28 मई 2026 के बीच राज्य में कुल 450 वनाग्नि घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें गढ़वाल क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहाँ 331 आग की घटनाएं सामने आईं। कुमाऊं क्षेत्र में 83 और प्रशासनिक व वन्यजीव क्षेत्र (Admin/Wildlife) में 36 घटनाएं दर्ज हुईं। इससे पहले 1 नवंबर 2025 से 14 फरवरी 2026 के बीच भी 61 आग की घटनाएं हुई थीं। इस तरह नवंबर 2025 से मई 2026 तक कुल 511 वनाग्नि घटनाएं रिकॉर्ड की गईं।
उत्तराखंड राज्य में अल्मोड़ा जिसे के बिनसर क्षेत्र में रहने वाले पर्यावरणविद इश्वर जोशी गाँव कनेक्शन को बताते हैं, बढ़ता तापमान, सूखी पिरूल और जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गंभीर बना रहे हैं। और ये संकट सिर्फ गर्मी के कुछ महीनों का नहीं है, पूरे साल पहाड़ का इकॉसिस्टम इस आग से प्रभावित होता है। सूखते नौले, फलदार वृक्षों का जलना, खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान, जंगली जानवरों का इंसानी आबादी की तरफ बढ़ना, आग के कारण टूरिज्म सेक्टर में मंदी, फायर लाइनों पर हजारों पेड़ों को उग जाना, आग के घायलों को मुआवजा न मिलना, इलाज के लिए बड़े शहरों की ओर जाना आम आदमी की जेब पर खर्च का बढ़ता बोझ ... ये तमाम फेक्टर्स हैं जो पूरे साल पहाड़ के लोगों को झेलने पड़ रहे हैं इस आग के कारण।
ISRO और IIRS की 2025-26 की नवीनतम सैटेलाइट आधारित रिपोर्टों के अनुसार 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में कम बर्फबारी, बारिश में भारी कमी और सूखे जंगलों के कारण वनाग्नि की घटनाएं तेजी से बढ़ीं। सैटेलाइट डेटा में सबसे ज्यादा फायर क्लस्टर कुमाऊं और गढ़वाल के मध्य ऊंचाई वाले जंगलों में दिखाई दिए, जहाँ चीड़ और मिश्रित वन अधिक हैं।
इश्वर जोशी बताते हैं कि जिन फायर लाइनों को आजादी से पहले बनाया गया था। उन पर आज हजारों-लाखों पेड़ उग आए हैं बिनसर के इलाकों में। इतने सालों तक फायर लाइनों की कोई देखभाल नहीं की गई। अगर समय रहते देखभाल नहीं होगी तो आग का बढ़ना हमारे लिए कोई नई बात नहीं! सरकारी व्यवस्था को सिर्फ आग लगने के समय नहीं जागना होगा बल्कि पूरे साल वन पंचायतों के साथ मिलकर काम करना होगा, आग पर काबू पाने की तैयारी साल भर करनी होगी, नहीं तो नुकसान आने वाले सालों में अधिक बढ़ सकता है।
वन विभाग की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि आग की घटनाओं में रिजर्व फॉरेस्ट (RF) क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। फरवरी से मई 2026 के बीच अकेले 230.38 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र आग से प्रभावित हुआ, जबकि सिविल और वन पंचायत क्षेत्र में 136.95 हेक्टेयर भूमि जली। इसके अलावा 2 हेक्टेयर प्लांटेशन क्षेत्र को भी नुकसान पहुंचा। मानवीय क्षति की बात करें तो 2026 में वनाग्नि के कारण राज्य में 2 लोगों की मौत दर्ज की गई। दोनों मौतें गढ़वाल क्षेत्र में हुईं। हालांकि रिपोर्ट के अनुसार किसी व्यक्ति के घायल होने या पशुओं के मारे जाने की पुष्टि नहीं हुई है।
पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में वनाग्नि की घटनाओं और प्रभावित क्षेत्र में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में अंतर जरूर है, लेकिन तस्वीर बेहद चिंताजनक है।
वनाग्नि को लेकर उत्तराखंड सरकार और Forest Survey of India (FSI) के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। उत्तराखंड वन विभाग के आधिकारिक डेटा के अनुसार पिछले 25 वर्षों में राज्य में लगभग 58,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र आग से प्रभावित हुआ है। विभागीय रिकॉर्ड में वर्ष 2023 में 933.52 हेक्टेयर और वर्ष 2024 में 1,771.62 हेक्टेयर वन क्षेत्र में आग लगने की पुष्टि की गई।
वहीं 2026 फायर सीजन (15 फरवरी से 28 मई 2026) के दौरान राज्य में 450 वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 367.33 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह डेटा उत्तराखंड वन विभाग की आधिकारिक “डेली फायर रिपोर्ट” और PCCF कार्यालय के रिकॉर्ड पर आधारित है।
दूसरी ओर Forest Survey of India (FSI) की सैटेलाइट आधारित रिपोर्ट में नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच (सिर्फ एक साल का डाटा) उत्तराखंड में लगभग 1.80 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र आग से प्रभावित दिखाया गया है। FSI रिमोट सेंसिंग, MODIS और SNPP-VIIRS जैसे सैटेलाइट सिस्टम के जरिए “बर्न्ट एरिया” का आकलन करता है। यानी जहाँ आग के निशान दिखाई देते हैं, उसे प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। जबकि राज्य वन विभाग केवल जमीन पर सत्यापित घटनाओं और सीमित प्रभावित क्षेत्र को रिकॉर्ड करता है।
उत्तराखंड वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, 15 फरवरी से 28 मई 2026 के बीच कुल 367.33 हेक्टेयर वन क्षेत्र आग से प्रभावित हुआ। इसमें गढ़वाल में सबसे ज्यादा 271.83 हेक्टेयर क्षेत्र जला, जबकि कुमाऊं में 69.25 हेक्टेयर और प्रशासनिक/वन्यजीव क्षेत्र में 26.25 हेक्टेयर भूमि प्रभावित हुई। वहीं नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 41.66 हेक्टेयर क्षेत्र आग की चपेट में आया था। दोनों अवधियों को मिलाकर कुल प्रभावित क्षेत्र लगभग 409 हेक्टेयर से अधिक पहुँच गया।
ISRO और IIRS की सैटेलाइट रिपोर्ट के अनुसार 2024 में नैनीताल, चंपावत, अल्मोड़ा, पौड़ी और पिथौरागढ़ सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में रहे। कई जिलों में आग की घटनाएं पिछले साल के मुकाबले कई गुना तक बढ़ गईं। पिछले कुल साल के आंकड़ों को देखें-
इश्वर जोशी बताते हैं, आग के बाद जंगलों की मिट्टी अपनी नमी और उपजाऊ क्षमता खोने लगती है, जिससे पहाड़ के पारंपरिक जल स्रोत जैसे नौले और धाराएं धीरे-धीरे सूखने लगते हैं। कई इलाकों में फलदार पेड़, बागवानी और खेतों में खड़ी फसलें आग की चपेट में आ जाती हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। लगातार जलते जंगलों के कारण वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होता है, जिसके चलते जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आने लगते हैं। बिनसर के ग्रामीण इलाकों में पिछले 3 से 4 में कई बार तेंदुए का आवाजाही देखी जा रही है। जंगलों में बढ़ती आग के कारण वन्य जीवों का घर भी उजड़ रहा है जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं और ग्रामीणों में असुरक्षा का माहौल बनता जा रहा है।
वनाग्नि का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की अर्थव्यवस्था और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी गहरा असर डाल रहा है। आग और धुएं के कारण पर्यटन प्रभावित होता है, जिससे स्थानीय होटल, होमस्टे और छोटे कारोबारियों की आय पर सीधा असर पड़ता है। इलाज, यात्रा और रोजगार प्रभावित होने का बोझ सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है। यही वजह है कि वनाग्नि अब सिर्फ जंगलों की समस्या नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकट का बड़ा कारण बनती जा रही है।
वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने आग बुझाने और रोकथाम में बेहतर काम करने वाली टीमों व लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए नई पुरस्कार योजना शुरू की है। सरकार ने उत्कृष्ट कार्य करने वालों के लिए 1 लाख रुपये, 75 हजार रुपये और 51 हजार रुपये तक के इनाम तय किए हैं, ताकि स्थानीय लोग और वन सुरक्षा से जुड़े समूह जागरूक होकर प्रशासन की मदद के लिए आगे आएं। सरकार का मानना है कि जंगल की आग पर काबू पाने में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सबसे अहम भूमिका निभा सकती है।
पीटीआई से बातचीत में मुख्य वन संरक्षक एवं नोडल अधिकारी (वनाग्नि) सुशांत पटनायक ने कहा कि संसाधनों और आधुनिक तकनीक के बेहतर समन्वय से उत्तराखंड वन विभाग की आग बुझाने की क्षमता पहले के मुकाबले काफी मजबूत हुई है। उन्होंने बताया कि जमीनी स्तर पर वनाग्नि से निपटने के लिए पूरे राज्य में 1,438 क्रू स्टेशन और 40 कंट्रोल रूम सक्रिय किए गए हैं। इसके अलावा वन मुख्यालय में एक इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर भी स्थापित किया गया है। विभाग ने 5,600 फायर वॉचर्स की तैनाती भी की है, जो संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी और शुरुआती अलर्ट का काम कर रहे हैं।
सुशांत पटनायक ने कहा कि उत्तराखंड के जंगलों में सूखी चीड़ की पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में “पिरूल” कहा जाता है, अब भी वनाग्नि की सबसे बड़ी वजह बनी हुई हैं। पिछले फायर सीजन में विभाग ने करीब 5,600 टन पिरूल एकत्र किया था, जबकि इस वर्ष इसका लक्ष्य बढ़ाकर 8,500 टन कर दिया गया है, ताकि जंगलों में आग फैलने के खतरे को कम किया जा सके।
इश्वर जोशी का मानना है कि केवल आग बुझाने से समस्या हल नहीं होगी। चीड़ के जंगलों का वैज्ञानिक प्रबंधन, पिरूल के व्यावसायिक उपयोग, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जलवायु अनुकूल वन नीति पर गंभीर काम करने की जरूरत है। वरना हर साल हजारों हेक्टेयर जंगल जलते रहेंगे और हिमालयी पारिस्थितिकी पर खतरा लगातार बढ़ता जाएगा।
हर साल क्यों जलते हैं उत्तराखंड के जंगल?
नैनीताल जिले के जंगलों में में लगी आग की तस्वीर
4 महिनों में 450 आग लगने की घटनाएं दर्ज
2025-2026 के फायर सीजन में आग की घटनाएं
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के जंगलों में में लगी आग की तस्वीर
क्या हैं जंगलों में आग लगने की मुख्य वजहें?
चीड़ के पेड़ों की सूखी पत्तियां आग लगने की बड़ी बजह
रिजर्व फॉरेस्ट भी आया आग की चपेट में
हर साल कितना जंगल जल रहा है?
| वर्ष / अवधि | आग की घटनाएं | प्रभावित वन क्षेत्र |
|---|---|---|
| 2023 | — | लगभग 933 हेक्टेयर |
| 2024 | 477+ घटनाएं | लगभग 379 हेक्टेयर (अप्रैल तक) |
| नवंबर 2023 – मई 2024 | 910 घटनाएं | लगभग 1,145 हेक्टेयर |
| 2024 (FSI अनुमान) | 1,276 घटनाएं | लगभग 1,771 हेक्टेयर |
| 2026 फायर सीजन | 373+ घटनाएं | लगभग 318 हेक्टेयर |
| पिछले 25 वर्षों में | हजारों घटनाएं | लगभग 58,000 हेक्टेयर |
राज्य सरकार और केंद्रीय आंकड़ों में बड़ा अंतर
वहीं 2026 फायर सीजन (15 फरवरी से 28 मई 2026) के दौरान राज्य में 450 वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 367.33 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह डेटा उत्तराखंड वन विभाग की आधिकारिक “डेली फायर रिपोर्ट” और PCCF कार्यालय के रिकॉर्ड पर आधारित है।
दूसरी ओर Forest Survey of India (FSI) की सैटेलाइट आधारित रिपोर्ट में नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच (सिर्फ एक साल का डाटा) उत्तराखंड में लगभग 1.80 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र आग से प्रभावित दिखाया गया है। FSI रिमोट सेंसिंग, MODIS और SNPP-VIIRS जैसे सैटेलाइट सिस्टम के जरिए “बर्न्ट एरिया” का आकलन करता है। यानी जहाँ आग के निशान दिखाई देते हैं, उसे प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। जबकि राज्य वन विभाग केवल जमीन पर सत्यापित घटनाओं और सीमित प्रभावित क्षेत्र को रिकॉर्ड करता है।
409 हेक्टेयर भूमि, आग से हुई प्रभावित
साल 2025-26 में जंगलों में आग लगने की घटनाएं
ISRO और IIRS की सैटेलाइट रिपोर्ट के अनुसार 2024 में नैनीताल, चंपावत, अल्मोड़ा, पौड़ी और पिथौरागढ़ सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में रहे। कई जिलों में आग की घटनाएं पिछले साल के मुकाबले कई गुना तक बढ़ गईं। पिछले कुल साल के आंकड़ों को देखें-
| जिला | 2023 आग की घटनाएं | 2024 आग की घटनाएं |
| नैनीताल | 316 | 1715 |
| चंपावत | 145 | 1135 |
| अल्मोड़ा | 443 | 965 |
| पौड़ी गढ़वाल | 459 | 723 |
| पिथौरागढ़ | 314 | 697 |
जंगल जलने से क्या नुकसान हो रहा है?
पहाड़ों की हवा होती है प्रदूषित, बढ़ती है सांस लेने की समस्याएं
पहाड़ की अर्थव्यवस्था और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी ठप्प
सरकार क्या कदम उठा रही है?
बागेश्वर जिले में आग बुझाते वन विभाग के कर्मचारी
वन संरझक टीम के क्या हैं इतजाम?
आग पर काबू पाने के सरकारी इंतजाम
सुशांत पटनायक ने कहा कि उत्तराखंड के जंगलों में सूखी चीड़ की पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में “पिरूल” कहा जाता है, अब भी वनाग्नि की सबसे बड़ी वजह बनी हुई हैं। पिछले फायर सीजन में विभाग ने करीब 5,600 टन पिरूल एकत्र किया था, जबकि इस वर्ष इसका लक्ष्य बढ़ाकर 8,500 टन कर दिया गया है, ताकि जंगलों में आग फैलने के खतरे को कम किया जा सके।