किसानों को चेतावनी! क्या आपके खेतों की मिट्टी हो रही जहरीली, ICAR ने लाखों किसानों को सिखाया संतुलित उर्वरक उपयोग
Preeti Nahar | May 22, 2026, 18:12 IST
देशभर में मिट्टी की घटती उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का ‘खेत बचाओ अभियान’ तेजी से बड़ा जन अभियान बनता जा रहा है। इस पहल के तहत अब तक 2.712 करोड़ लोगों तक जागरूकता संदेश पहुंचाया गया है, जबकि 7.17 लाख किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य के बारे में सीधे प्रशिक्षण दिया गया है।
लाखों किसानों को सिखाया गया संतुलित उर्वरक उपयोग
लगातार रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता प्रभावित हो रही है। कई इलाकों में मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा तेजी से कम हुई है, जिससे उत्पादन क्षमता पर असर पड़ रहा है। अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में खेती की लागत और बढ़ सकती है तथा उत्पादन स्थिर होने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
क्या है ‘
देश में खेती की बढ़ती लागत, मिट्टी की घटती गुणवत्ता और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता के बीच केंद्र सरकार और कृषि वैज्ञानिक अब मिट्टी की गुणवत्ता बचाने वाले मॉडल पर जोर दे रहे हैं। इसी दिशा में का राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ बड़े स्तर पर किसानों तक पहुंच बना रहा है।
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के अनुसार इस अभियान का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक तरीके से उर्वरकों के संतुलित उपयोग, मृदा परीक्षण आधारित खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना है। सरकार का कहना है कि इससे खेती की लागत कम करने और मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद मिलेगी।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक देशभर में 12,979 से अधिक जागरूकता शिविर और सेमिनार आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों में 7.17 लाख किसानों ने सीधे भाग लिया। अभियान के तहत किसानों को बताया जा रहा है कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता लगातार प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञ किसानों को संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और जैविक विकल्प अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
अभियान के दौरान सिर्फ भाषण या जागरूकता कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि किसानों को व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया। इसके तहत 3,145 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 1.11 लाख से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा हरी खाद, जैव उर्वरक और जैविक स्रोतों के इस्तेमाल को समझाने के लिए 7,928 फील्ड डेमोंस्ट्रेशन किए गए। वैज्ञानिकों का कहना है कि खेतों में सीधे प्रदर्शन के जरिए किसान नई तकनीकों को जल्दी समझ पाते हैं।
अभियान को गाँव स्तर तक मजबूत बनाने के लिए पंचायत प्रतिनिधियों, सरपंचों और जिला परिषद सदस्यों को भी शामिल किया गया। इसके तहत 4,916 जनप्रतिनिधि सम्मेलन आयोजित किए गए। सरकार का मानना है कि स्थानीय नेतृत्व को साथ जोड़ने से किसानों तक संदेश ज्यादा प्रभावी तरीके से पहुंचता है और सामुदायिक स्तर पर बदलाव आसान होता है।
अभियान के दौरान उर्वरक डीलरों के साथ 9,609 संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन बैठकों में संतुलित उर्वरक उपयोग और जरूरत के अनुसार खाद देने पर जोर दिया गया ताकि किसान अनावश्यक रासायनिक उपयोग से बच सकें।
अभियान को सिर्फ गाँवों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि डिजिटल माध्यमों का भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया। सरकार के अनुसार सोशल मीडिया प्रचार के जरिए 2.712 करोड़ लोगों तक संदेश पहुंचाया गया।इसके अलावा 944 रेडियो वार्ताएं, 200 टीवी और डिजिटल कार्यक्रम, 53,616 स्थानों पर पोस्टर, बैनर और होर्डिंग्स के जरिए भी लोगों को जागरूक किया गया।
‘खेत बचाओ अभियान’ का मुख्य उद्देश्य किसानों को मृदा परीक्षण आधारित खेती अपनाने के लिए प्रेरित करना है। सरकार चाहती है कि किसान जरूरत के अनुसार ही उर्वरक इस्तेमाल करें और जैविक व प्राकृतिक विकल्पों को भी अपनाएं।
क्या है ‘खेत बचाओ अभियान ’?
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के अनुसार इस अभियान का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक तरीके से उर्वरकों के संतुलित उपयोग, मृदा परीक्षण आधारित खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना है। सरकार का कहना है कि इससे खेती की लागत कम करने और मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद मिलेगी।