देश में बढ़ रहा जल संकट! 166 बड़े जलाशयों में सिर्फ 32.38% पानी, विशेषज्ञों ने बताया अभी क्या करना होगा
Gaon Connection | Jul 15, 2026, 11:51 IST
मानसून के बावजूद देश के 166 प्रमुख जलाशयों में केवल 32.38 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है। द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट के जल विशेषज्ञ श्यामल सरकार ने कहा कि जल संकट से निपटने के लिए केवल जल भंडारण बढ़ाना नहीं, बल्कि पानी की बढ़ती माँग का प्रभावी प्रबंधन भी आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और घटती प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता के बीच वर्षा जल संचयन, पुनर्चक्रण और स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण पर ज़ोर देने की आवश्यकता बताई गई है।
भारत ‘वॉटर स्ट्रेस’ की सीमा पार कर चुका
देश में मानसून शुरू होने के बावजूद अधिकांश बड़े जलाशयों में अभी भी पर्याप्त पानी नहीं पहुँच पाया है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता का केवल 32.38 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है। यह पिछले सप्ताह के 26 प्रतिशत की तुलना में मामूली सुधार है, लेकिन अब भी आधे से अधिक जलाशय खाली हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और बढ़ती जल माँग के बीच देश की जल सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट (TERI) के जल प्रभाग के सलाहकार और जल संसाधन मंत्रालय के पूर्व सचिव श्यामल सरकार ने कहा कि भारत की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल जल उपलब्धता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में पानी की बढ़ती माँग को भी प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना होगा। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में जल संकट से निपटने के लिए आपूर्ति और माँग, दोनों पक्षों पर समान रूप से काम करना आवश्यक है।
श्यामल सरकार ने कहा कि जल भंडारण बढ़ाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। वर्तमान में देश के बड़े बाँधों में लगभग 250 अरब घन मीटर पानी संग्रहित करने की क्षमता है, जिसे सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से और बढ़ाया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में पानी की माँग लगातार उपलब्धता से अधिक बनी हुई है। उन्होंने कहा कि भारत सहित अधिकांश देशों ने अब तक जल संकट के समाधान के लिए केवल आपूर्ति बढ़ाने पर ध्यान दिया, जबकि माँग प्रबंधन की अनदेखी की गई।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1950 में भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगभग 5,000 घन मीटर थी, जो घटकर अब लगभग 1,500 घन मीटर रह गई है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार 1,700 घन मीटर से कम उपलब्धता वाले देशों को ‘जल तनावग्रस्त’ (Water Stressed) माना जाता है और भारत इस सीमा को पार कर चुका है। अब देश 1,000 घन मीटर प्रति व्यक्ति उपलब्धता वाले ‘जल अभाव’ (Water Scarcity) की स्थिति की ओर बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति को प्रतिदिन पीने के लिए केवल दो से तीन लीटर पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन दिल्ली में प्रति व्यक्ति लगभग 165 लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है, जिसका अधिकांश हिस्सा नहाने, कपड़े धोने और अन्य घरेलू कार्यों में खर्च होता है तथा उसका पुनः उपयोग या पुनर्चक्रण नहीं हो पाता। श्यामल सरकार ने इज़राइल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ 60 से 70 प्रतिशत पानी का पुनर्चक्रण कर उसे कृषि कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि भारत में इस दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है। उन्होंने बताया कि नीति आयोग के अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत में पानी की माँग उपलब्ध जल की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। इस अंतर को कम करने के लिए जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ जल भंडारण क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि करनी होगी।
श्यामल सरकार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का स्वरूप लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। कभी अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आती है तो कभी कम बारिश के कारण सूखे की स्थिति बन जाती है। पर्याप्त जल भंडारण नहीं होने से इसका असर आर्थिक विकास, पेयजल आपूर्ति और भूजल पुनर्भरण पर भी पड़ता है, क्योंकि भूजल का स्तर सतही जल से ही रिचार्ज होता है। उन्होंने बताया कि जल भंडारण बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार मिशन अमृत सरोवर के तहत प्रत्येक ज़िले में 10,000 घन मीटर क्षमता वाले 75 जलाशय विकसित करने पर काम कर रही है। इसके साथ ही राज्यों को वर्षा जल संचयन अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
श्यामल सरकार ने बरमूडा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ पेयजल के लिए कोई सतही जल स्रोत नहीं है और प्रत्येक भवन की छत से वर्षा जल एकत्र कर भूमिगत टंकियों में संग्रहित किया जाता है। भारत में भी इसी तरह की व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है, क्योंकि देश में होने वाली कुल वर्षा का केवल लगभग आठ प्रतिशत ही संग्रहित हो पाता है, जबकि शेष पानी समुद्र में बह जाता है। उन्होंने बताया कि कृषि सिंचाई योजना (कृषि सिंचाई योजना) के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें महिलाओं और बालिकाओं की भूमिका घरेलू स्तर पर जल संरक्षण में महत्वपूर्ण मानी गई है। औद्योगिक परिसरों में वर्षा जल संचयन और सिंचाई प्रणाली को अधिक दक्ष बनाने पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। वर्तमान में सिंचाई के लिए निकाले जाने वाले पानी का केवल 30 से 40 प्रतिशत ही प्रभावी रूप से उपयोग हो पाता है।
सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (CSE) की विशेषज्ञ सुष्मिता सेनगुप्ता ने पीटीआई से कहा कि शहरों को जल संकट से निपटने के लिए स्थानीय जल स्रोतों की सफाई, अपशिष्ट जल के वैज्ञानिक प्रबंधन और विकेंद्रीकृत जल प्रणालियों के पुनर्निर्माण पर तत्काल ध्यान देना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में पहले शहर तालाबों, झीलों और नदियों के आसपास बसाए जाते थे और वर्षा जल संचयन पर आधारित स्थानीय जल प्रणालियाँ ही प्रमुख स्रोत थीं। ब्रिटिश शासन के दौरान पाइपलाइन आधारित जलापूर्ति व्यवस्था शुरू होने के बाद इन पारंपरिक स्रोतों की उपेक्षा होने लगी। उन्होंने कहा कि स्थानीय जल निकायों के प्रदूषित होने और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण आज हैदराबाद को 100 से 150 किलोमीटर, दिल्ली को 100 किलोमीटर से अधिक, कावेरी आधारित जलापूर्ति को लगभग 90 से 100 किलोमीटर तथा मुंबई को लगभग 95 से 96 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है।
सुष्मिता सेनगुप्ता ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित वर्षा से जलाशय जल्दी खाली हो जाते हैं, जबकि लंबी दूरी की पाइपलाइन व्यवस्था में औसतन 40 से 50 प्रतिशत पानी रिसाव में ही नष्ट हो जाता है। उनका कहना है कि जब तक शहर स्थानीय जल स्रोतों और विकेंद्रीकृत जल प्रणालियों को पुनर्जीवित नहीं करेंगे, तब तक भविष्य में जल संकट और गहराता जाएगा।
समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट (TERI) के जल प्रभाग के सलाहकार और जल संसाधन मंत्रालय के पूर्व सचिव श्यामल सरकार ने कहा कि भारत की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल जल उपलब्धता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में पानी की बढ़ती माँग को भी प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना होगा। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में जल संकट से निपटने के लिए आपूर्ति और माँग, दोनों पक्षों पर समान रूप से काम करना आवश्यक है।
जल भंडारण बढ़ाने के साथ माँग प्रबंधन पर ज़ोर, प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में आई बड़ी गिरावट
उन्होंने बताया कि वर्ष 1950 में भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगभग 5,000 घन मीटर थी, जो घटकर अब लगभग 1,500 घन मीटर रह गई है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार 1,700 घन मीटर से कम उपलब्धता वाले देशों को ‘जल तनावग्रस्त’ (Water Stressed) माना जाता है और भारत इस सीमा को पार कर चुका है। अब देश 1,000 घन मीटर प्रति व्यक्ति उपलब्धता वाले ‘जल अभाव’ (Water Scarcity) की स्थिति की ओर बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति को प्रतिदिन पीने के लिए केवल दो से तीन लीटर पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन दिल्ली में प्रति व्यक्ति लगभग 165 लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है, जिसका अधिकांश हिस्सा नहाने, कपड़े धोने और अन्य घरेलू कार्यों में खर्च होता है तथा उसका पुनः उपयोग या पुनर्चक्रण नहीं हो पाता। श्यामल सरकार ने इज़राइल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ 60 से 70 प्रतिशत पानी का पुनर्चक्रण कर उसे कृषि कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि भारत में इस दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है। उन्होंने बताया कि नीति आयोग के अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत में पानी की माँग उपलब्ध जल की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। इस अंतर को कम करने के लिए जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ जल भंडारण क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि करनी होगी।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ी चुनौती, वर्षा जल संचयन और स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण पर ज़ोर
श्यामल सरकार ने बरमूडा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ पेयजल के लिए कोई सतही जल स्रोत नहीं है और प्रत्येक भवन की छत से वर्षा जल एकत्र कर भूमिगत टंकियों में संग्रहित किया जाता है। भारत में भी इसी तरह की व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है, क्योंकि देश में होने वाली कुल वर्षा का केवल लगभग आठ प्रतिशत ही संग्रहित हो पाता है, जबकि शेष पानी समुद्र में बह जाता है। उन्होंने बताया कि कृषि सिंचाई योजना (कृषि सिंचाई योजना) के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें महिलाओं और बालिकाओं की भूमिका घरेलू स्तर पर जल संरक्षण में महत्वपूर्ण मानी गई है। औद्योगिक परिसरों में वर्षा जल संचयन और सिंचाई प्रणाली को अधिक दक्ष बनाने पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। वर्तमान में सिंचाई के लिए निकाले जाने वाले पानी का केवल 30 से 40 प्रतिशत ही प्रभावी रूप से उपयोग हो पाता है।
सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (CSE) की विशेषज्ञ सुष्मिता सेनगुप्ता ने पीटीआई से कहा कि शहरों को जल संकट से निपटने के लिए स्थानीय जल स्रोतों की सफाई, अपशिष्ट जल के वैज्ञानिक प्रबंधन और विकेंद्रीकृत जल प्रणालियों के पुनर्निर्माण पर तत्काल ध्यान देना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में पहले शहर तालाबों, झीलों और नदियों के आसपास बसाए जाते थे और वर्षा जल संचयन पर आधारित स्थानीय जल प्रणालियाँ ही प्रमुख स्रोत थीं। ब्रिटिश शासन के दौरान पाइपलाइन आधारित जलापूर्ति व्यवस्था शुरू होने के बाद इन पारंपरिक स्रोतों की उपेक्षा होने लगी। उन्होंने कहा कि स्थानीय जल निकायों के प्रदूषित होने और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण आज हैदराबाद को 100 से 150 किलोमीटर, दिल्ली को 100 किलोमीटर से अधिक, कावेरी आधारित जलापूर्ति को लगभग 90 से 100 किलोमीटर तथा मुंबई को लगभग 95 से 96 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है।
सुष्मिता सेनगुप्ता ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित वर्षा से जलाशय जल्दी खाली हो जाते हैं, जबकि लंबी दूरी की पाइपलाइन व्यवस्था में औसतन 40 से 50 प्रतिशत पानी रिसाव में ही नष्ट हो जाता है। उनका कहना है कि जब तक शहर स्थानीय जल स्रोतों और विकेंद्रीकृत जल प्रणालियों को पुनर्जीवित नहीं करेंगे, तब तक भविष्य में जल संकट और गहराता जाएगा।