कैच द रेन से अमृत सरोवर तक, जल संरक्षण के प्रयासों से बदली उत्तर प्रदेश की तस्वीर
Gaon Connection | Jul 27, 2026, 18:49 IST
उत्तर प्रदेश ने जल संरक्षण के प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-6 को हासिल किया है। भूजल स्तर में सुधार हुआ है और भूजल दोहन की दर में कमी आई है। 'कैच द रेन' अभियान से वर्षा जल संचयन को बढ़ावा मिला है। अटल भूजल योजना ने ग्रामीण इलाकों में भूजल स्तर को बढ़ाया है। तालाबों, चेकडैमों और अमृत सरोवरों के निर्माण से जल उपलब्धता बढ़ी है।
जल संरक्षण के प्रयासों से बदली उत्तर प्रदेश की तस्वीर
उत्तर प्रदेश में जल संरक्षण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में बड़े स्तर पर काम हुआ है। इसका असर अब ज़मीन पर भी दिखाई देने लगा है। भूजल स्तर में सुधार, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण जैसे प्रयासों की बदौलत प्रदेश ने संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-6 (एसडीजी-6) के मानक को हासिल कर लिया है। इस लक्ष्य का उद्देश्य सभी लोगों के लिए स्वच्छ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना और जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन करना है।
प्रदेश सरकार के अनुसार, वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में भूजल दोहन की दर 71.26 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 70 प्रतिशत हो गई है। इसी के साथ प्रदेश का वार्षिक भूजल पुनर्भरण (रिचार्ज) भी बढ़ा है। वर्ष 2017 में यह 69.91 बिलियन क्यूबिक मीटर था, जो वर्ष 2025 तक बढ़कर 73.39 बिलियन क्यूबिक मीटर हो गया।
भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति के अनुसार, यह बदलाव केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों के संरक्षण और लोगों की भागीदारी जैसे कई प्रयासों का परिणाम है। प्रदेश में उन विकासखंडों की संख्या भी कम हुई है, जहाँ ज़रूरत से अधिक भूजल निकाला जा रहा था। वर्ष 2017 में ऐसे 82 विकासखंड थे, जो अब घटकर 44 रह गए हैं। वहीं सुरक्षित श्रेणी के विकासखंडों की संख्या 540 से बढ़कर 563 हो गई है। विशेषज्ञ इसे भूजल प्रबंधन की दिशा में सकारात्मक बदलाव मानते हैं।
जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए 'कैच द रेन' अभियान के तहत बड़े पैमाने पर काम किया गया। वर्ष 2021 से 2025 के बीच प्रदेश में 3.39 लाख से अधिक वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण से जुड़ी संरचनाएँ बनाई गईं। इसके अलावा 1.34 लाख पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन किया गया और 14.38 लाख जलग्रहण क्षेत्र विकास कार्य पूरे किए गए। इसी अवधि में 1.33 लाख से अधिक ऐसी संरचनाएँ भी विकसित की गईं, जिनका उद्देश्य भूजल का पुनर्भरण और दोबारा उपयोग बढ़ाना है। इन प्रयासों से बारिश के पानी को ज़मीन में पहुँचाने में मदद मिली है।
अटल भूजल योजना के तहत भी ग्रामीण इलाकों में अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं। 26 विकासखंडों की ग्राम पंचायतों में जल सुरक्षा योजना लागू की गई। एक स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, 550 ग्राम पंचायतों में से 303 पंचायतों में भूजल स्तर 0.5 मीटर से 2 मीटर तक बढ़ा है। इससे कई क्षेत्र अतिदोहित या अर्ध-संकटग्रस्त श्रेणी से निकलकर सुरक्षित श्रेणी की ओर बढ़े हैं।
सरकार ने सरकारी और अर्द्धसरकारी भवनों में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली लगाने पर भी ज़ोर दिया। प्रदेश में ऐसे 1,05,593 भवनों की पहचान की गई, जहाँ यह व्यवस्था बनाई जा सकती थी। इनमें से अब तक 35,206 भवनों पर वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित की जा चुकी है। भूगर्भ जल विभाग द्वारा लगाए गए 227 सिस्टम से हर वर्ष लगभग 4252.80 लाख लीटर भूजल रिचार्ज की क्षमता विकसित हुई है।
जल संरक्षण के लिए अलग-अलग विभागों ने भी कई काम किए हैं। लघु सिंचाई विभाग ने 6,627 चेकडैम बनाए हैं। इनकी भंडारण क्षमता लगभग 14 हजार करोड़ लीटर और भूजल रिचार्ज क्षमता करीब 10 हजार करोड़ लीटर प्रतिवर्ष है। इसके अलावा विभाग ने 1,417 तालाबों का जीर्णोद्धार किया और 6,800 से अधिक भवनों पर रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली लगाई। दूसरी ओर, ग्राम्य विकास विभाग ने लगभग 19,974 अमृत सरोवर विकसित किए, जबकि कृषि विभाग ने 37,273 खेत तालाबों का निर्माण कराया। इन संरचनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ी है और भूजल रिचार्ज में भी मदद मिली है।
जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से सफल नहीं हो सकता। इसके लिए लोगों की भागीदारी और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग की भी ज़रूरत है। उत्तर प्रदेश में भूजल दोहन में कमी और जल संरक्षण के क्षेत्र में मिली उपलब्धियाँ इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत हैं। यदि ऐसे प्रयास लगातार जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश जल संकट से निपटने के लिए और अधिक मज़बूत स्थिति में होगा।
प्रदेश सरकार के अनुसार, वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में भूजल दोहन की दर 71.26 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 70 प्रतिशत हो गई है। इसी के साथ प्रदेश का वार्षिक भूजल पुनर्भरण (रिचार्ज) भी बढ़ा है। वर्ष 2017 में यह 69.91 बिलियन क्यूबिक मीटर था, जो वर्ष 2025 तक बढ़कर 73.39 बिलियन क्यूबिक मीटर हो गया।
भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति के अनुसार, यह बदलाव केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों के संरक्षण और लोगों की भागीदारी जैसे कई प्रयासों का परिणाम है। प्रदेश में उन विकासखंडों की संख्या भी कम हुई है, जहाँ ज़रूरत से अधिक भूजल निकाला जा रहा था। वर्ष 2017 में ऐसे 82 विकासखंड थे, जो अब घटकर 44 रह गए हैं। वहीं सुरक्षित श्रेणी के विकासखंडों की संख्या 540 से बढ़कर 563 हो गई है। विशेषज्ञ इसे भूजल प्रबंधन की दिशा में सकारात्मक बदलाव मानते हैं।
'कैच द रेन' अभियान से मिला फायदा
कई गाँवों में बढ़ा भूजल स्तर
वर्षा जल संचयन को मिला बढ़ावा
तालाब, चेकडैम और अमृत सरोवर बने सहारा
जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से सफल नहीं हो सकता। इसके लिए लोगों की भागीदारी और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग की भी ज़रूरत है। उत्तर प्रदेश में भूजल दोहन में कमी और जल संरक्षण के क्षेत्र में मिली उपलब्धियाँ इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत हैं। यदि ऐसे प्रयास लगातार जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश जल संकट से निपटने के लिए और अधिक मज़बूत स्थिति में होगा।